दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Wednesday 28 May 2008

जैसा बोओगे बैसा ही काटोगे

शोभा जी की एक रचना पढ़ी,
मैं नास्तिक नहीं हूँ
इस रचना ने मेरे मन में कुछ भाव जगा दिए. यह भाव बन गए एक नई रचना.

मैं कभी मूक नहीं होता,
उपेक्षा नहीं करता किसी की,
तुम्हारी वाणी में बोलता रहता हूँ,
जब कोई मुझे पुकारता है प्रेम से,
मैं दौड़ा आता हूँ,
जब भी कभी कोई द्रोपदी या गजराज पुकारेंगे,
मैं आऊँगा।

जो तुम्हें मिलता है इस संसार में,
वह फल है तुम्हारे कर्मों का,
पिछले जन्मों में किए थे तुमने जो,
जैसा बोया है बैसा ही काट पाओगे,
यह नियम है,
जिसे तुम क्या,
मैं भी नहीं तोड़ सकता.

झांको अपने अन्दर प्रेम और विश्वास से,
मैं नजर आऊँगा तुम्हें,
मैं तुम में हूँ, तुम मुझसे हो,
जब अलग महसूस करते हो ख़ुद को,
तभी आस्था डगमगाती है तुम्हारी,
आ जाओ मेरी शरण में जैसे अर्जुन आया था,
मैं तुम्हें भय और दुःख से मुक्त कर दूँगा.

1 comment:

Udan Tashtari said...

बढ़िया है.