दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Wednesday, 31 December, 2008

विदा २००८, स्वागतम २००९

आज वर्ष २००८ का आखिरी दिन है. रात बारह बजे वर्ष २००८ सबसे विदा लेगा, और वर्ष २००९ हमारी जिंदगी में कदम रखेगा. 

शताब्दी एक्सप्रेस में स्टेशन आने से पहले एनाउंसर कहती है - अगर आप इस स्टेशन पर उतर रहे हैं तो हम आशा करते हैं कि आपकी यात्रा सुखद रही होगी. स्टेशन से गाड़ी चलने पर वह कहती है - जो लोग इस स्टेशन से ट्रेन में चढ़े हैं, हम आशा करते हैं कि उनकी यात्रा सुखद रहेगी. कुछ ऐसा ही मैं हिन्दी ब्लागजगत के सहयात्रिओं  से कहना चाहता हूँ - आशा है वर्ष २००८ आपके लिए सुखद रहा, और वर्ष २००९ आपके लिए सुखद रहेगा. 

Monday, 29 December, 2008

कौन थी पहली मिस इंडिया?

क्या आप जानते हैं कि पहली मिस इंडिया कौन थी और वह कब मिस इंडिया चुनी गई? 
फर्स्ट  मिस इंडिया थी प्रमिला  (एस्थर  अब्राहम). वह वर्ष १९४९ में मिस इंडिया चुनी गई.

वह अब ९० वर्ष की हो गई हैं.

Saturday, 27 December, 2008

कुछ महान कथन जो आपकी जिंदगी को बेहतर बना देंगे

अगर समय आपका इंतज़ार नहीं करता तो न करे, 
आप घड़ी से बेटरी निकाल कर फेंक दो और बिंदास जिंदगी जियो. 

दुनिया से यह उम्मीद करना कि वह आपसे अच्छा व्यवहार करेगी 
क्योंकि आप एक अच्छे इंसान हैं, 
यह ऐसा है जैसे शेर से यह उम्मीद करना कि 
वह आपको इसलिए नहीं खायेगा क्योंकि आप शाकाहारी हैं. 

पढ़े-लिखे लोग कहते हैं कि सुन्दरता बाहर से नहीं आंकी जाती 
और न ही इस बात से कि आप कैसे कपड़े पहने हुए हैं, 
सुन्दरता आंकी जाती है कि आप अन्दर से कैसे हैं. 
इसलिए कल बिना कपड़े पहने बाहर जाइए और देखिये 
लोग आपकी सुन्दरता की कैसे  तारीफ़ करते हैं. 

ऐसे मत चलिए जैसे आप दुनिया के राजा हैं, 
बल्कि ऐसे चलिए जैसे आपको इस बात की कोई परवाह नहीं है 
कि दुनिया पर कौन राज्य करता है. 
यह सही सोच कहलाता है ..... बिंदास बनो. 

हर स्त्री यह आशा करती है कि उसकी बेटी ऐसे आदमी से शादी करेगी 
जो उस आदमी से बेहतर होगा जिस से उसने शादी की थी, 
और बेटे को कभी ऐसी बीबी नहीं मिलेगी जो उस के पिता की बीबी से बेहतर हो.   

वह एक अच्छा आदमी था. उस ने कभी धूम्रपान नहीं किया, 
शराब नहीं पी, किसी दूसरी औरत के साथ कोई चक्कर नहीं चलाया. 
जब उस की म्रत्यु हुई तो बीमा कम्पनी ने यह कह क्लेम देने से मना कर दिया 
कि जो जिंदगी जिया ही नहीं, मर कैसे सकता है. 

एक आदमी ने अपनी पत्नी को मगरमच्छों से भरे तालाब में फेंक दिया. 
अब उस पर जानवरों पर अत्त्याचार करने का मुकदमा चल रहा है. 

आत्महत्या करने के बहुत से तरीके हैं, जहर खाना, नींद की गोलियां लेना, 
फांसी लगा लेना, ऊंची बिल्डिंग से कूद जाना, रेल पटरियों पर लेट कर जान दे देना, 
लेकिन उन्होंने इस के लिए शादी करना तय किया. 
 
केवल २० प्रतिशत लड़कों के पास दिमाग होता है, 
बाकी के पास महिला मित्र होती हैं.   

जिंदगी में जितनी भी अच्छी प्यारी चीजें हैं, वह या तो गैरकानूनी हैं, 
या कानून ने उन पर पाबंदी लगा रखी है, या बहुत महंगी हैं, 
या उनकी शादी किसी और से हो गई है. 
  
सुस्ती हमारी सबसे बड़ी दुश्मन है - नेहरू ने कहा,
हमें अपने दुश्मनों से प्यार करना चाहिये - गाँधी ने कहा,
इसलिए बहुत से लोग सुस्ती से प्यार करते हैं. 
  
दस प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं शराब पीकर गाड़ी चलाने से होती हैं. 
इसका अर्थ हुआ कि ९० प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं बना शराब पिए गाड़ी चलाने से होती हैं. 
  

Thursday, 25 December, 2008

Tuesday, 23 December, 2008

एक नेता चाहिए

मुंबई आतंकी हमलों के बाद भारत का हर नागरिक एक स्वर में बोल रहा है आतंकवाद के ख़िलाफ़ (उनको छोड़ कर जिनके ईमान में देश के लिए बफादारी नहीं). इस अप्रत्याशित एकता को संजोये रखने के लिए और इस विचारधारा को सही दिशा देने के लिए आज देश को एक नेता की जरूरत है. 

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज़ादी के बाद इस देश में कोई नेता पैदा नहीं हुआ. कहते तो बहुत हैं ख़ुद को नेता पर कहने से क्या होता है, हकीकत में तो यह सब मात्र राजनीतिबाज हैं जो राजनीति का व्यवसाय करते हैं. चुनाव में पैसा लगाते हैं और जीत जाने पर हजारों गुना नफा कमाते हैं. इनका मजहब पैसा है. इनका ईमान पैसा है. 

देश को एक ऐसा नेता चाहिए जिसका धर्म, ईमान सब कुछ देश हो, जिसके मन, वचन और कर्म में जनता की सेवा ही एकमात्र उद्देश्य हो. जो शासक नहीं सेवक हो. काश एक ऐसा नेता मिले इस देश को. 

Monday, 22 December, 2008

जनता एक हो सकती है पर नेता नहीं

यह भारत का दुर्भाग्य है कि किसी भी विपत्ति में भारत की जनता एक हो सकती है, पर नेता कभी देश हित में एक नहीं हो सकते. उनके अपने निजी स्वार्थ हैं जिन्हें वह हमेशा देश हित से ऊपर रखते हैं. 

मुंबई हमलों के बाद देश की जनता एक होकर खड़ी हो गई, हर नागरिक एक ही बात कह रहा था, आतंकवाद के ख़िलाफ़ हम सब एक हैं, आतंकवाद को हम किसी धर्म से जोड़ कर नहीं देखते. उस समय इस एक राय का ऐसा तीव्र ज्वार उठा था कि सरकार और सारे राजनीतिबाज घबडा गए थे. उसी का असर है कि इतनी जल्दी केन्द्रीय जांच एजेंसी और कानूनों को सख्त बनाना सम्भव हो सका. 

लेकिन राजनीतिबाज ज्यादा दिन तक अपनी घटिया राजनीति से दूर नहीं रह सके. अंतुले ने जनता की इस राय के ख़िलाफ़ बिगुल बजा दिया, कि मेरी पार्टी आतंकवाद को धर्म से जोड़ कर देखती है, मेरी पार्टी यह मानती है कि मुसलमानों को आतंकवाद से जोड़ना पार्टी और सरकार के अस्तित्व के लिए आवश्यक है. धीरे-धीरे और राजनीतिबाज भी अंतुले के साथ खड़े होने लगे. दिग्विजय सिंह, लालू और अब कम्युनिस्ट, कुछ ही दिनों में स्थिति पहले जैसी हो जायेगी. सोनिया और मनमोहन ने अभी तक अंतुले के ख़िलाफ़ कोई कदम नहीं उठाया, यह इस बात का सबूत है कि इस सारे मामले में यह दोनों और इनकी पार्टी कांग्रेस पूरी तरह शामिल हैं. मजबूरी में कुछ कदम उठाने पड़ रहे हैं. अंतुले के माध्यम से देश के मुसलमानों को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि कांग्रेस की सोच और नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया है. दुःख की बात यह है कि यह राजनीतिबाज यह नहीं देख रहे कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग आतंकवाद को इस्लाम से अलग देखता है और उस के ख़िलाफ़ है. यह हमेशा से उन्हें धर्म के नाम पर भड़काते रहें हैं और अब भी यही कर रहे हैं. मुंबई हमलों के बाद जो एकता देश में नजर आई थी उसे बिगाड़ने के काम  में फ़िर से लग गए हैं यह घटिया देशद्रोही राजनीतिबाज.

देश के वह नागरिक, जो सोच सकते हैं, कह सकते हैं, अपना कर्तव्य पहचानें और इन घटिया देशद्रोही राजनीतिबाजों की इन चालों को सफल न होने दें. हिन्दी ब्लागजगत एक मुहिम चलाये जिसमें अलगाववाद के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला जाय. ज्यादा से ज्यादा लेख लिखे जाय और इन लेखों पर ज्यादा से ज्यादा टिपण्णी की जाय. आइये हम सब आम आदमी मिल कर अपने देश को बाहरी और इन अंदरूनी आतंकवादियों से बचाएँ.

Saturday, 20 December, 2008

आतंकवाद, मुसलमान और कांग्रेस - मैं शर्त हार गया

मुंबई हमलों के बाद ऐसा लग रहा था जैसे सारा भारत एक हो गया है. सब भारतवासी एक स्वर में आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक जुट हो गए थे. आनन्-फानन में केन्द्रीय जांच एजेंसी और कुछ  सख्त कानून भी बन गए. मुसलमान एक स्वर में आतंकवाद और आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ने के ख़िलाफ़ खड़े हो गए. 

इस सब से मैं बहुत प्रोत्साहित था. मगर मेरा एक मित्र नहीं. उस का कहना था कि यह सब कुछ दिनों का नाटक है और जल्दी ही मुसलमानों के कुछ नेता और धर्म की राजनीति करने वाले नेता फ़िर वही पुराने राग अलापने लगेंगे. हमारे बीच शर्त लग गई. 

इन धर्म की राजनीति करने वालों ने कुछ दिनों का इंतज़ार भी नहीं किया और फ़िर शुरू हो गए. अंतुले ने बिगुल बजाया, लालू के चमचे हाँ में हाँ मिलाने लगे. मुसलमानों के नेता भी यही दोहराने लगे. कांग्रेस हमेशा की तरह मामले को टालने की कोशिश करने लगी. अंतुले को कैसे निकालें, राष्ट्र हित जरूरी है या मुसलमानों के वोट, इस दुविधा में फ़िर फंस गई कांग्रेस. फ़िर हो गई धर्म की राजनीति शुरू. अब जल्दी ही कुछ हिंदू भी इस में शामिल हो जायेंगे. मुंबई में निर्दोषों की हत्या फ़िर बेकार जायेगी. भारत पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सबूत इकट्ठे कर रहा है, पर इन घरेलू आतंकवादियों का क्या करेगा? 

नतीजा - मैं शर्त हार गया. 

Friday, 19 December, 2008

सोनिया जी, क्या आप कुछ नहीं करेंगी?

मैंने अपनी पिछली पोस्ट में लिखा था कि कांग्रेस द्वारा अंतुले के बयान से पल्ला झाड़ लेना काफ़ी नहीं है. अब तो यह लगता है कि अंतुले का बयान एक सोचे-समझे षड़यंत्र का एक हिस्सा है, जिस से पकिस्तान के सामने भारत के पक्ष को कमजोर किया जा सके. अंतुले भारत सरकार का एक मंत्री है, इसलिए उस का बयान बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. यह बयान भारत सरकार के द्वारा दिए जा रहे सबूतों की काट करता है. 
 
कांग्रेस समर्थक एक अंग्रेजी के प्रसिद्द अखबार को भी यह बयान बहुत ग़लत लगा है और आज इस अखबार ने अपने सम्पादकीय में कहा है प्रधानमंत्री को तुंरत अंतुले का इस्तीफा माँगना चाहिए. अगर ऐसा नहीं किया गया तो भारत को बहुत नुक्सान उठाना पड़ेगा. आज सारा देश आतंक के ख़िलाफ़ एक जुट है. केवल अंतुले जैसे कांग्रेसी देश के ख़िलाफ़ खड़े हैं. यह भी हो सकता है कि अंतुले ही भारत के अन्दर सीमापार से आ रहे आतंकवाद को सुबिधायें मुहैया कराता है. 

कुछ दिन पहले, एक और मंत्री सईद ने सुरक्षा परिषद् में दिए गए भाषण से नरिमान हाउस का नाम ही गायब कर दिया. अब सुरक्षा परिषद् के रिकार्ड्स में भारत का एक ऐसा भाषण दर्ज है जिस के अनुसार मुंबई में नरिमान हाउस पर कोई हमला नहीं हुआ और कोई यहूदी नहीं मारा गया. 

कितनी शर्म की बात है सोनिया जी, आपकी कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकार देश का ऐसा अहित कर रही हैं. अगर आप, आपकी पार्टी एवं सरकार इस देश से प्यार करते हैं तब अंतुले और सईद जैसे मंत्रिओं को तुंरत बर्खास्त किया जाय और उनके ख़िलाफ़ उचित कानूनी कार्यवाही की जाय. 

Thursday, 18 December, 2008

सोनिया जी, क्या इतना काफ़ी है?

अंतुले कांग्रेस की केन्द्र सरकार में अल्पसंख्यक मंत्रालय में मंत्री है. कल उस ने मुंबई में हेमंत करकरे की मौत पर जो टिपण्णी की, उस से कांग्रेस ने पल्ला झाड़ लिया. कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी ने उसे अंतुले की व्यक्तिगत राय कह कर मामले को दफनाने की कोशिश की. पर यह काफ़ी नहीं है. अंतुले ने जो बात कही है वही बात पकिस्तान के कुछ अखबारों में कही जा रही है. आज जब आतंकवाद के ख़िलाफ़ सब भारतीय एक हैं और इसे धर्म से अलग करके देखा जा रहा है, अंतुले का बयान हिन्दुओं के ख़िलाफ़ एक मोर्चा खोलना है और धर्म को फ़िर आतंकवाद से जोड़ देना है. यह बयान पाकिस्तान की बात को समर्थन देकर मजबूत करता है. बीजेपी ने सही कहा है कि अंतुले की बात से लग रहा है कि वह भारत में पकिस्तान की आईएसआई का एजेंट है.  

अंतुले के ख़िलाफ़ कार्यवाही की जानी चाहिए. उसे मंत्रिमंडल से तुंरत बर्खास्त किया जाना चाहिए, और फ़िर उस के ख़िलाफ़ कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए.

Wednesday, 17 December, 2008

चाँद बन गया माथे की बिंदी

कल रात मेरी हथेली पर,
चाँद उतर आया. 
पिछली ओला वृष्टि में टूट गई थी खपरेल,
उतर आया उसी टूटी खपरेल से,
चाँद मेरी हथेली पर.

विरह से तपता वदन,
काम से थकी दुखती हथेली,
चाँद का शीतल स्पर्श,
कंपा गया मुझे अन्दर तक,
सिहर कर मैंने करली हथेली बंद,
पर फिसल गया चाँद,
खाली रह गई बंद मुट्ठी.

मुट्ठी खोलती और चाँद को पकड़ती,
पर चाँद हर बार फिसल जाता,
उतर आया था जैसे बचपन, 
उस रात मेरी झोंपड़ी में.

अटखेलियाँ करता रहा चाँद,
सारी रात मेरे सिरहाने,
कभी बन जाता मेरे माथे की बिंदी,
कभी चूम लेता मेरे होंटो को,
कभी नाक पर सुरसुरी करता,
कभी झांकता मेरी आंखों में,
मैं सिमट जाती, करबट बदलती,
चाँद सहला देता मेरे चेहरे को,
सारे वदन को,
कब नींद आ गई पता नहीं,
सपने में देखा,
तुम आए थे चाँद बन कर. 

Sunday, 14 December, 2008

कल १३ दिसंबर था


कल का दिन हमें याद दिलाता है उन शहीदों की जिन्होनें पार्लियामेन्ट और वहां मौजूद राजनीतिबाजों की रक्षा करने में अपने प्राणों की आहुति दी थी. हम भारतवासी उन शहीदों को नमन करते हैं. 

पिछले वर्षों की भांति, इस वर्ष भी, इन शहीदों की स्मृति में जो कार्यक्रम पार्लियामेन्ट में आयोजित किया गया, उस में लोकसभा सदस्यों की मौजूदगी नगण्य थी. लानत है इन राजनीतिबाजों पर, एक बार फ़िर अपमान किया इन्होनें अपने शहीदों का, एक बार फ़िर दिखाई एहसानफ़रामोशी उनके लिए जिन्होनें इन्हें बचाने में अपनी जान दे दी. 

एक वीडियो देखिये आतंकियों द्वारा पार्लियामेन्ट पर हमले का: 


दूसरा वीडियो है इन राजनीतिबाजों द्वारा पार्लियामेन्ट पर हमले का:


मुंबई हमलों के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान को आतंकिओं की सूची दे कर कहा है कि इन्हें भारत के हवाले किया जाय ताकि उन पर देश के कानून के अनुसार मुकदमा चलाया जा सके और उनके अपराध की सजा दी जा सके. लेकिन एक आतंकी जिसे इस देश का सर्वोच्च कानून म्रत्युदंड दे चुका है, उसे यह सरकार सजा नहीं दे रही, बल्कि  उस की दामाद की तरह खातिर कि जा रही है. इन और आतंकवादी दामादों को पाकिस्तान् से लाकर इस देश का पैसा क्यों बेकार करना चाहती है यह सरकार? शर्म आनी चाहिए इस सरकार को? 


Saturday, 13 December, 2008

यही मौका है, इसका फायदा उठाओ

भारत की जनता आज आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक स्वर में बोल रही है. आज आतंकवाद के ख़िलाफ़ हर नागरिक केवल एक भारतीय है, न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान, न सिख, न ईसाई, न और किसी और वर्ग का. राजनीतिबाजों के ख़िलाफ़ जो जन मत बना उसने सब को सोचने पर मजबूर कर दिया. कुछ इस्तीफे दिए गए. कुछ सख्त बातें की गईं. कुछ सख्त कदम उठाने की प्रक्रिया शुरू हुई. लोक सभा में सब राजनीतिबाज एक स्वर में बोले. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है. 

यह एक बहुत अच्छा अवसर है, इस का पूरा फायदा उठाना चाहिए. जनता को राजनीतिबाजों पर यह दबाब बनाए रखना चाहिए. राजनीतिबाजों को दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर यह एकता दिखाते रहना चाहिए,मन, वचन और कर्म तीनों में. 

हिन्दी ब्लागजगत को भी आतंकवाद के विरुद्ध एक स्वर में लिखना चाहिए. 

Friday, 12 December, 2008

देश को शासक नहीं ट्रस्टी चाहिए

भारत में प्रजातंत्र है - प्रजा का तंत्र, प्रजा द्वारा, प्रजा के लिए. प्रजा अपने प्रतिनिधियों द्वारा इस तंत्र का प्रबंधन करती है. यह दुःख और निराशा की बात है कि यह प्रतिनिधि शासकों जैसा व्यवहार करते हैं. प्रजातंत्र में शासक और शासन की बात करना ग़लत है. ऐसा सोचना और व्यवहार करना उस से भी ज्यादा ग़लत है. हर राजनितिक पार्टी ऐसा अनुचित व्यवहार कर रही है. मीडिया भी यही कहता  है कि इस राज्य में इस पार्टी का शासन है और उस राज्य में उस पार्टी का. क्या जनता ने इन्हें शासन करने के लिए चुना था, या जनता के प्रतिनिधि बन कर राज्य का प्रबंधन करने के लिए? 

ब्रिटिश राज की गुलामी से मुक्त होने के बाद, भारत एक प्रजातान्त्रिक गणतंत्र बना. आज ६० वर्षों से अधिक बीत पाए पर प्रजातंत्र जैसी कोई बात नजर नहीं आती. प्रजा के प्रतिनिधियों में प्रजा के प्रति कोई बफदारी की भावना नहीं है. प्रजातंत्र के प्रति कोई बफदारी की भावना नहीं है. जिस राज्य के प्रबंधन की जिम्मेदारी इन प्रतिनिधियों को दी गई थी, उस राज्य को यह लोग लूट रहे हैं, खोखला कर रहे हैं. इनका हर सोच, हर काम, उनके अपने किए है. इनके व्यवहार में केवल भ्रष्टाचार और अनेतिकता ही दिखाई देते हैं. 

आज इस देश को शासक नहीं ट्रस्टी चाहियें. भरत जैसे ट्रस्टी. राम पिता की आज्ञा से बन गए थे. सारी अयोध्या उन्हें मनाने के लिए बन में गई पर वह आने के लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने यही कहा कि उनके वापस आने तक भरत अयोध्या का राज कार्य संभालें. उस समय अयोध्या में राजतन्त्र था. भरत राज्य करते, इस में कुछ भी अनुचित नहीं होता. पर भरत राजतन्त्र में भी इसके लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने स्वयं को राम के प्रतिनिधि के रूप में ही स्वीकार किया, और राम के वापस आने तक अयोध्या का प्रबंधन एक ट्रस्टी के रूप में किया. जैसे राम बन में रहे बैसे ही भरत नंदीग्राम में झोपड़ी बना कर रहे. 

राजतन्त्र में एक राजा वनवासी की तरह रहा. पर आज प्रजातांत्रिक भारत में प्रजा के प्रतिनिधि राजा की तरह रहते हैं. प्रजा की उन्हें कोई चिंता नहीं. कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है? कब हमारा देश इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से बाहर आएगा? कभी बाहर आएगा भी या नहीं? हे ईश्वर मेरे देश की रक्षा कर. जनता और जनता के प्रतिनिधियों को सदबुद्धि दे. 

Thursday, 11 December, 2008

बेईमानों की सरकार

आज भारत में जो सरकार है वह जनता ने नहीं चुनी. वह बेईमानी से इस देश पर थोपी गई है. वह बेईमानों की सरकार है. पिछले दिनों जब इस सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास पर मतदान हुआ था, कांग्रेस ने इस सरकार को बचाने के लिए जम कर बेईमानी की थी. समाजवादी पार्टी और कुछ दूसरी पार्टियों के सांसदों ने पैसे और बहुत से फायदे लिए थे इस सरकार के समर्थन में वोट डालने के लिए. एक ऐसा बेईमान नेता तो एक प्रदेश का मुख्य मंत्री बन गया. 

आज ख़बर है समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह की बेईमानी की और इस बेईमान सरकार द्वारा उसे बचाने की. सीबीआई मुलायम सिंह के ख़िलाफ़ बेईमानी से कमाए गए अंधाधुंध धन के बारे में जांच कर रही थी. अब सीबीआई ने अदालत में इस केस को बंद करने के लिए याचिका दी है. सीबीआई का कहना है कि ऐसा उस ने केन्द्र सरकार के हुक्म पर किया है. 

आज अखबार में एक और ख़बर है कि भारत भ्रष्टाचार में दुनिया का पाँच नंबर का देश है. लेकिन इस बेईमान सरकार जैसी कोई और सरकार दुनिया में शायद ही हो. सरकार को समर्थन देने वाले बेईमानों के ख़िलाफ़ जांच बंद करने का आदेश देने वाली सरकार भी शायद ही दुनिया में कोई और हो. बेईमानी से बनी और बेईमानों के समर्थन से चल रही यह सरकार भ्रष्टाचार के छेत्र में एक अजब मिसाल है.  

Wednesday, 10 December, 2008

आतंकवाद को जिहाद का नाम देना ग़लत है

विश्व में बहुत से आतंकवादी अपनी अमानवीय कार्यवाहियों को जिहाद का नाम देते हैं. उसे इस्लाम से जोड़ कर यह साबित करते हैं कि जो कुछ वह कर रहे हैं वह इस्लाम का तकाजा है. इस्लाम के बहुत से धार्मिक नेता इस का विरोध करते हैं. उनका कहना है कि इस्लाम इस तरह के कामों की इजाजत नहीं देता. मगर कहीं न कहीं, लोग इन आतंकिओं की बात का समर्थन कर देते हैं, उन्हें जिहादी मान कर, उन्हें जिहादी कह कर. 

जो कत्लेआम यह आतंकी कर रहे हैं वह जिहाद नहीं है. जिहाद तो इंसान अपने अन्दर छिपी बुराई के ख़िलाफ़ करता है. जिहाद एक तरह की तपस्या है, प्रायश्चित है. वह किसी के ख़िलाफ़ नहीं होता. वह सिर्फ़ बुराई के ख़िलाफ़ होता है. हम जब सच बोलते हैं, झूट के ख़िलाफ़ जिहाद करते हैं. हम जब प्रेम करते हैं, नफरत के ख़िलाफ़ जिहाद करते हैं. अहिंसा हिंसा के ख़िलाफ़ जिहाद है. ईमानदारी बेईमानी के ख़िलाफ़ जिहाद है. 

Sunday, 7 December, 2008

एक परिवार बनाम देश के बाकी सारे परिवार

एक तराजू लीजिये, एक पलड़े में एक परिवार रखिये और दूसरे में देश के बाकी सारे परिवार, एक परिवार का पलड़ा नीचे झुक जायेगा. कौन है यह परिवार? पिछले कुछ दिनों से जो अखवार में छप रहा है, टीवी पर दिखाया जा रहा है, उसके अनुसार यह परिवार है, गाँधी परिवार. इस परिवार में हैं चार वयस्क और कुछ बच्चे. यह परिवार अकेला देश के सारे परिवारों पर भारी पड़ता है. इस परिवार की सुरक्षा पर  जनता का जितना पैसा खर्च होता है वह देश के बाकी परिवारों पर खर्च होने वाले पैसे से कहीं ज्यादा है. 

इस परिवार की सुरक्षा करता है - स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी). देश की जनता को आतंकी हमलों से बचाने के लिए एनएसजी का गठन किया गया है. एनएसजी के बहुत से कमांडोज को जनता की सुरक्षा से हटा कर कुछ राजनीतिबाजों की सुरक्षा पर लगा दिया गया है. अब तुलना करें  एसपीजी और  एनएसजी की. वर्ष २००८ -२००९ में  एनएसजी का बजट है १५८ करोड़ रुपये. इस के मुकाबले में एसपीजी का बजट है १८० करोड़ रुपये. यानी, देश की जनता की सुरक्षा पर जितना पैसा खर्चा हो रहा है, उससे कहीं ज्यादा पैसा इस अकेले परिवार की सुरक्षा पर खर्च हो रहा है. 

कितना शर्मनाक है यह, देश के लिए, जनता के लिए, इस परिवार के लिए. 

Saturday, 6 December, 2008

निर्दोषों की लाशों पर कुर्सी की लड़ाई

आज सारा देश दुखी है, मुंबई में कितने निर्दोष आतंकियों की गोली का निशाना बन गए. उनकी कोई दुश्मनी नहीं थी आतंकियों से, आतंकी उन्हें जानते भी नहीं थे, पर फ़िर भी यह निर्दोष अपनी जान गवां बैठे. दुखी लोग इकट्ठे होकर संवेदना प्रकट कर रहे हैं. 

सारा देश आक्रोश से भरा हुआ है - 'बस बहुत हो गया'. जन आक्रोश से घबराई सरकार ने भी आक्रोशित होने का नाटक शुरू कर दिया. बयानबाजी शुरू हो गई. गलती किस की थी, किसने अपना कर्तव्य पूरा नहीं क्या? लोग अपनी गलती दूसरों पर डालने लगे, क्रिकेट बंद हो गई पर गलती उछालने का खेल चल रहा है. कुछ लोग इस दुखी समय में कुर्सी का खेल खेलते रहे. उन्होंने सोचा, कोई न कोई तो जायेगा, अगर अपना दांव लग गया तो उसकी खाली कुर्सी मेरी हो सकती है. महा सीएम ने अपनी जान लगा दी अपनी कुर्सी बचाने में, पर बची नहीं. हाई कमान समझ नहीं पा रही थी, किसे दें कुर्सी? किसकी बफदारी पर यकीन करें. योग्यता की तलाश नहीं थी. सबसे ज्यादा बफादार की तलाश थी. एक को कुर्सी मिली. दूसरे ने गालियाँ देनी शुरू कर दी. 

यह है इन की श्रद्धांजलि, उनके लिए जो इनकी सरकार की नालायकी की वजह से मारे गए. 

Thursday, 4 December, 2008

सुरक्षा में बेशर्मी और बेईमानी

जनता असुरक्षित है पर सेंकड़ों करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं कुछ राजनीतिबाजों की सुरक्षा पर. 
७००० एनएसजी जांबाजों में से १७०० जांबाज इन नेताओं की सुरक्षा में लगा दिए गए हैं. 
कितनी शर्म की बात है कि जिस एनएसजी का आतंकवाद  से निपटने के लिय गठन किया गया था, उसके जवान इन घटिया राजनीतिबाजों को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं.
कुछ दिन पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था, कि राजनीतिबाज कोई राष्ट्रीय सम्पदा नहीं है जिन्हें सुरक्षा प्रदान की जाय. 
४२२ वीआइपी की सुरक्षा में लगे हैं लगभग १०००० सुरक्षा कर्मी. इन में वह रेगुलर पुलिस वाले शामिल नहीं हैं जिन्हें उनकी अपनी ड्यूटी से हटाकर इन लोगों की सुरक्षा में लगाया जाता है. अकेले दिल्ली में १४२०० पुलिस वाले इन की सुरक्षा में लगाए गए हैं. कोई ताज्जुब नहीं कि दिल्ली की जनता बहुत ज्यादा असुरक्षित है. 
२४ घंटे वीआइपी की सुरक्षा में लगे इन सुरक्षा कर्मियों को जरूरी ट्रेनिंग भी नहीं दी जा पाती है.
इन वीआइपी में कुछ को हो सकता है खतरा रियल हो पर अधिकाँश को कोई खतरा नही है, पर यह देश के ऊपर वोझ बने हुए हैं. जनता का पैसा बरबाद करते हैं और जनता को ट्रेफिक समस्यायें पैदा करके परेशान करते हैं. लगभग २५० करोड़ रुपया खर्च होता है इस गैर-जरूरी सुरक्षा पर. ऐसे कुछ देश पर वोझ हैं - देवगोडा, अमर सिंह, राम विलास पासवान, सज्जन कुमार, बी एल जोशी, आर एल भाटिया, शरद यादव, रामेश्वर ठाकुर, ई एहमद, मुरली मनोहर जोशी, ब्रज भूषन शरण, प्रमोद तिवारी. 
वर्तमान और भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और गाँधी परिवार के सदस्यों को स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) सुरक्षा प्रदान करता है. वर्ष २००८-२००९ के लिए इस ग्रुप का बजट है - १८० करोड़ रुपए. इसके मुकाबले में, एनएसजी, जो सारे भारतवासियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए है, का वर्ष २००८-२००९ का बजट है १५८ करोड़. 
वीआइपी सुरक्षा पाँच स्तर पर दी जाती है - एसपीजी, जेड प्लस, जेड, वाई, एक्स. जेड प्लस सुरक्षा एनएसजी ब्लेक केट्स द्वारा दी जाती है जिसमें ६ पर्सनल सुरक्षा अधिकारी, २ हेड कांस्टेबल, १२ कांस्टेबल, एक एस्कोर्ट, एक पायलट वेहिकिल. ३० राजनीतिबाज ऐसे हैं जिन्हें जेड प्लस सुरक्षा मिली हुई है. इनमें हैं - आडवानी, मायावती, नरेंद्र मोदी, जयललिता, मुरली मनोहर जोशी, अमर सिंह, पासवान. ६२ को जेड, २४३ को वाई, ८१ को एक्स स्तर की सुरक्षा मिली हुई है. 
क्या कहेंगे इसे? बेईमानी और बेशर्मी, या इस से भी कुछ अधिक? 
हटाओ सुरक्षा कवच इन राजनीतिबाजों से. 
जनता को दो यह सुरक्षा कवच. 

Wednesday, 3 December, 2008

विश्वासघाती राजनीतिबाजों को देश निकाला दो

मुंबई आतंकी हमले के बाद जनता के मन में जन-प्रतिनिधियों के प्रति आक्रोश भरा हुआ है . बैसे तो हर आतंकी हमले के बाद यह आक्रोश जन्म लेता है, पर इस बार यह आक्रोश तीब्र रूप से मुखर भी हो उठा है. हर और जन-प्रतिनिधियों के प्रति अविश्वास जताया जा रहा है, उनकी भर्त्सना की जा रही है, उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा रहा है निर्दोष नागरिकों की हत्या का. यह मांग भी की जा रही कि अपनी जिम्मेदारी न निभा सकने वाले जन-प्रतिनिधियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही की जाय. इस सब से अधिकाँश जन-प्रतिनिधि बौखला उठे हैं. यह जन-प्रतिनिधि स्वयं को राजनेता कहते हैं. मेरे विचार में वह सिर्फ़ घटिया राजनीतिबाज हैं और इस देश और समाज पर एक गाली की तरह छा गए हैं. 

भारत एक प्रजातांत्रिक देश है. भारत की जनता, चुनाव प्रक्रिया द्वारा अपने प्रतिनिधि चुनती है, उन पर विश्वास करती है कि यह जन-प्रतिनिधि जनता के ट्रस्टी के रूप में देश का प्रबंध कार्य करेंगे. यह अत्यन्त अफ़सोस की बात है कि चुने जाने के बाद यह अपना जन-प्रतिनिधि का चौला उतार फेंकते हैं और स्वयं को राजनेता घोषित कर देते हैं. जनता के ट्रस्टी न रह कर जनता के राजा बन जाते हैं, उस पर राज्य करने लगते हैं. केवल अपने बारे में सोचते हैं, केवल अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित रहते हैं, जनता को बांटने के नए-नए तरीके निकालते हैं, नफरत फेलाते हैं. कुर्सी पर पारिवारिक मालिकाना हक़ तय कर देते हैं. 

पिछले दिनों में जनता का उग्र रूप देख कर इनकी सिट्टीपिट्टी  गुम  हो गई है. इनकी प्रदूषित मानसिकता नंगी होकर बाहर आ गई है. वोटों की राजनीति के साथ अब इस्तीफों की राजनीति हो रही है. जनता को मूर्ख बनाने का हर-सम्भव प्रयास किया जा रहा है. दो इस्तीफों के बाद तीसरा राजनीतिबाज अकड़ जाता है और जिम्मेदारी तय करने का सारा नाटक धरा रह जाता है. परिवार की बफादारी देश से ऊपर है, यह बात फ़िर एक बार साबित हो जाती है. 

एक राजनीतिबाज देश पर कुर्बान हुए एक शहीद और उसके परिवार का अपमान करता है, सारा देश विरोध में उठ खड़ा होता है. इस राजनीतिबाज की पार्टी इस के घटिया व्यवहार पर खेद प्रकट करती है, पर यह बेशर्म राजनीतिबाज अपनी बेशर्मी पर शर्मसार होने की बजाये ऐसे जाहिर करता है जैसे उस ने देशभक्ति का कोई महान कार्य किया है. इस पार्टी की एक सहयोगी पार्टी का नेता इस घटिया व्यवहार का समर्थन करता है और उस शहीद के पिता पर ही ऊँगली उठाने लगता है. 

एक और राजनीतिबाज महिलाओं द्वारा राजनीतिबाजों में अविश्वास प्रकट करने पर उन्हें गालियाँ देने लगता है. उसकी पार्टी की एक समर्थक संस्था उसकी भाषा को आपत्तिजनक बताती है, पर राजनीतिबाजों में अविश्वास प्रकट करने को ग़लत ठहराती है. 

जिस जनता का प्रतिनिधित्व यह घटिया राजनीतिबाज कर रहे हैं, उसी को आँखें दिखा रहे हैं, उसी को धमका रहे हैं कि खबरदार अगर हम पर अविश्वास किया तो. यह मौका है भारत की जनता के पास, इन घटिया राजनीतिबाजों को उखाड़ फेंकने का. हे मेरे देशवासियों आओ हम सब एक होकर इन विश्वासघातियों को समुन्दर में धकेल दें. यह देश हमारा है. हमारा देश एक प्रजातंत्र है. इस के प्रति हमारा यह कर्तव्य है कि इन प्रजातंत्र के दुश्मनों, इन अवांछित तत्वों को देश निकाला दे दें.  

Monday, 1 December, 2008

आतंकियों की यह हिम्मत कि खास आदमियों से पंगा ले लिया

पिछले चार दिन में मैंने जितना टीवी देखा है उतना चार महीनों में नहीं देखा. इन चार दिनों में मैंने देखा - हमेशा की तरह आम आदमियों को बेवजह मरते हुए, उनकी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार पुलिस वालों को ख़ुद मरते हुए (शायद शहीद होते हुए), गैर-मराठी एनएसजी जांबाजों द्वारा मुंबई शहर को बचाते हुए और उनके दो जांबाजों को शहीद होते हुए, भारत के ग्रह मंत्री को दवाब में नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए, महा-ग्रह मंत्री को इस जिम्मेदारी से बचते हुए और इस भयानक हत्याकांड को एक छोटी सी घटना कहते हुए, पहली बार वीआइपी होटलों और वहां जाने वाले खास लोगों पर हमला होते हुए, शायद इसलिए सोनिया और कांग्रेस/केन्द्र सरकार को डरते हुए और अचानक सख्त होने का नाटक करते हुए, और मीडिया को बहुत सी सही-ग़लत खबरें देते हुए. आपने भी यह सब देखा होगा. 

बहुत से सवाल उठते रहे मेरे मन में. अभी भी यह सवाल उठ रहे हैं. 

पहला सवाल - अगर यह हमला ताज और ओबेराय होटल पर न होकर केवल नरिमान हॉउस, प्लेटफार्म और बाज़ार  में हुआ होता तो क्या एनएसजी के जांबाज आते, सोनिया और केन्द्र सरकार सख्त होने का नाटक करते, पाटिल साहब इस्तीफा देते, फेडरल जांच एजेंसी तुरत-फुरत बन जाती, पाक सरकार से पंगा लिया जाता?

मैं ख़ुद ही पहला जवाब देता हूँ. मेरा जवाब है, "नहीं". आपका जवाब क्या है यह बाद में पूछूंगा.  

आम आदमी की तो आतंकी हमलों में मरने की आदत हो गई है. यह बात सही है कि आम आदमी पहले से ज्यादा गुस्सा  है, पर ध्यान से दखें तो यह गुस्सा भी अपने लिए नहीं, खास लोगों के लिए है - "इन आतंकियों की यह हिम्मत कि खास आदमियों की आरामगाहों पर हमला करें, उन्हें डराएँ? अरे आम आदमी को मारते रहो न, वह तो पैदा ही इस तरह मरने के लिए होता है. ब्लू लाइन उसे कुचलती है, पुलिस वाले उसे आतंकी कह कर मार देते हैं, हवालात में उसे मार दिया जाता है, महंगाई की मार से मर जाता है बेचारा, तुम भी जब-तब उसे मार देते हो". 

इस बार तुम्हारी यह हिम्मत कि खास आदमियों से भी पंगा ले लिया. उनकी तरफ़ आँख उठाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? हिन्दुस्तान का आम आदमी इस का विरोध करता है, अबकी बार जब हमला करो तो इसका ध्यान रखना कि खास आदमी की कोई तकलीफ न हो. उसके बदले में दो-चार आम आदमी ज्यादा मार लेना. 

अब आप भी बताइए. आपका जवाब क्या है?

मेरी आने वाली पोस्ट्स में ऐसे ही कुछ सवाल उठाऊँगा मैं. ख़ुद भी जवाब दूँगा और आपसे भी जवाब मांगूंगा.