दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Sunday 30 November 2008

डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है

मैं जानता हूँ कि तुम्हारे अन्दर कोई शर्म बाकी नहीं है, पर एक कहावत है, 'चुल्लू भर पानी में डूब मरो', इसलिए मैंने अपनी पोस्ट का शीर्षक यह रख दिया. बुरा मत मानना. तुम भी जानते हो और मैं भी जानता हूँ कि तुम डूब कर मरने वाले नहीं, तुम तो इस देश को डुबाने के लिए अवतरित हुए हो. 

६० घंटे तक मुंबई में मौत का तांडव चलता रहा, सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए, विदेशी मेहमान मारे गए, पुलिस के कई अफसर और जवान मारे गए, एनएसजी के दो जांबाज शहीद हो गए. तुमने क्या किया? जनता ने मुंबई को तुम्हारे हवाले किया था. तुम मुख्यमंत्री बने, उपमुख्यमंत्री बने, मेयर बने, जनता के पैसे पर ऐयाशी की, कहाँ थे तुम जब जनता के ऊपर मौत मंडरा रही थी? जब सब शांत हो गया तो तुमने प्रेस को बुलाकर कहा कि मुम्बई जैसे बड़े शहर में ऐसी छोटी घटनाएं हो जाया करती हैं. क्या मैंने ग़लत कहा कि 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '.

तुमने कहा था मुंबई महा-मानुसों का है. बाहर वाले यहाँ क्या कर रहे हैं? तुमने उन पर हमले करवाए. तुम्हारे वीर महा-सैनिकों ने उन्हें ऐसे ही मारा जैसे आतंकवादियों ने इन ६० घंटों में निर्दोषों को मारा. कहाँ थे तुम इस दौरान, और तुम्हारे महा-सैनिक? जब यह बाहर वाले अपनी जान की बाजी लगाकर तुम्हारे मुंबई को और इन निर्दोषों को बचा रहे थे, किस बिल में जा छुपे थे तुम और तुम्हारे वीर महा-सैनिक? तुमने क्यों यह फरमान नहीं जारी किया कि 'कोई बाहर वाला मुंबई और इन्हें बचाने नहीं आएगा क्योंकि यह जिम्मेदारी हमारी है'. कहाँ थे तुम और क्या हुआ तुम्हारी जिम्मेदारी का? क्या मैंने ग़लत कहा कि 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '.

तुम्हारे बारे में क्या कहूं? बस एक बार फ़िर दोहराता हूँ कि है जनता द्वारा हराए गए, पर एक परिवार की बफादारी के बदले में सारे देश पर ग्रह मंत्री के रूप में थोप दिए गए तुम, 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '. 

आप तो प्रधानमन्त्री हैं, भले ही एक परिवार द्वारा मनोनीत किए गए. प्रधानमन्त्री तो सारे देश का होता है. परिवार को एहसान का बदला दो पर देश के लिए भी कुछ करो. इस देश के प्रति और इस देश की जनता के प्रति भी आपकी कुछ जिम्मेदारी है. पाँच साल हो गए, अब चलते-चलते तो उसे निभा जाओ. मुंबई में मौत बरस रही थी, आपने देशवासियों को संबोधित किया, पर किसी को भरोसा नहीं दे पाये. यह संबोधन होना या न-होना एक बराबर रहा. क्या प्रधानमन्त्री ऐसा होना चाहिये? आज सर्व-दलीय मीटिंग कर रहे हैं आप. आज तो कुछ कर डालिए, या आपके लिए भी यही कहना होगा - 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '? 

सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए, पर आप सब वोट की राजनीति करने में लगे गुए हैं. किसी भी पार्टी के हों पर काम सब के एक जैसे हैं - जनता को, देश को, समाज को एक बस्तु की तरह बेच कर अपनी जेबें भरना. आज जनता गुस्से से जल रही है, कहीं ऐसा न हो कि यह आग बाहर आ जाए. तुम राजनीतिबाज इस देश की जरूरत हो ऐसा साबित करो, कहीं ऐसा न हो कि जनता तुम्हें गैर-जरूरी मान कर कचरे के डब्बे में फैंक दे? कुछ करो वरना 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '.

कौन जिम्मेदार है इस देश की, इस देश की जनता की सुरक्षा के लिए? अपनी जिम्मेदारी समझो, उसे पूरा करो, वरना डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है .

Saturday 29 November 2008

क्या कभी मनमोहन कह पायेंगे - मैं हूँ न!!!

मुंबई में आतंकवादियों ने हमले किए. जब इन हमलों का फैलाव और न्रशंसता सामने आए तो सरकार को लगा कि कुछ करना चाहिए. अब यह सरकार कहने के अलाबा क्या कर सकती है, तो उस ने तय किया कि प्रधानमन्त्री राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित करें. प्रधानमन्त्री ने ऐसा किया भी. लेकिन उनके संबोधन से पहले जनता के मन में जो डर और आशंकाएं थी, शासन के प्रति जो अविश्वास था,  उस में कोई परिवर्तन नहीं हुआ.  मेरे एक जानकार ने उनका भाषण सुनने के बाद कमेन्ट किया - 'He does not inspire confidence'. 

एक नेता जो जनता के मन में अपने और अपनी सरकार के प्रति विश्वास पैदा नहीं कर सकता, वह देश को आतंकवाद से क्या बचायेगा? जब-तब आतंकी आते रहेंगे और यहाँ-वहां आतंकी हमले करते रहेंगे. इस देश में नागरिक इतनी स्वतंत्रता के साथ इधर-उधर नहीं घूम सकते, जितनी आसानी से आतंकवादी घूमते हैं. सरकार के हर कदम से आतंकवादी संगठनों और आतंकवादियों के मन में इस सरकार के प्रति यह विश्वास और पक्का हो जाता है कि यह सरकार उनके ख़िलाफ़ कभी कोई सख्त कदम नहीं उठाएगी. 

सारा देश चाहता है कि आतंकवादियों के ख़िलाफ़ सख्त कार्यवाही की जाय, पर यह सरकार ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती जिस से उसे वोटों का नुक्सान हो. इस सरकार का हर सोच, हर एक्शन इस से प्रभावित है. इस सबके चलते क्या मनमोहन जी कभी यह कह पायेंगे, 'हे मेरे देशवासियों, घबराओ मत, में हूँ न?' 

Wednesday 26 November 2008

हम कितने स्वतंत्र हैं?

हम सब एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं, पर क्या हम मन, वचन और कर्म से स्वतंत्र हैं? आइये स्वतंत्रता के दार्शनिक, व्यवहारिक और साधना पक्ष का अवलोकन करें और देखें कि हम कितने स्वतंत्र हैं:

दार्शनिक पक्ष - प्रत्येक पदार्थ का अस्तित्व स्वतंत्र है. कोई किसी के अस्तित्व में हस्तक्षेप नहीं करता, इसलिए सब पदार्थ अपने-अपने मौलिक गुणों के कारण अपनी विशिष्टता बनाए हुए हैं.

व्यवहार पक्ष - मनुष्य की स्वतंत्रता अथवा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मूल्यांकन किए बिना समाज स्वस्थ नहीं रहता. सामाजिकता के महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी वैयक्तिक स्वतंत्रता का मूल्य कम नहीं आंकना चाहिए. 

साधना पक्ष - एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता मन बाधक न बने. ऐसा वही व्यक्ति कर सकता है, जो अपने विचार के सर्वोपरि सत्य नहीं मानता. अपने विचार को ही सब कुछ मानने वाला दूसरे की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप किए बिना नहीं रहता. इस हस्तक्षेपी मनोवृत्ति को बदलने के लिए स्वतंत्रता की अनुप्रेक्षा बहुत मूल्यवान है. 

यदि हम स्वतंत्रता के इन पक्षों का विचार-पूर्वक अवलोकन करें तो यह पायेंगे कि कोई बिरला ही होगा जो स्वयं को स्वतंत्र कह सके. कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में हम परतंत्र हैं. यदि हम स्वतंत्र होना चाहते हैं तब हमें दूसरों की स्वतंत्रता में बाधक होना बंद करना होगा.   

(लोकतंत्र - नया व्यक्ति नया-समाज से साभार) 

Tuesday 25 November 2008

सौ दिन में आतंकवाद समाप्त

मनोनीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने कहा है कि एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स बनाकर वह १००  दिन में आतंकवाद और नक्सलवाद समाप्त कर देंगे. उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलवाद आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक है. यह बात उन्होंने पहले भी कही थी पर किया कुछ नहीं था. क्या इस बार भी वह सिर्फ़ कहने की आदत के कारण कहने के लिए कह रहे हैं? आडवाणी जी ने उनकी इस बात का मजाक उड़ा दिया और कहा कि १०० दिन में मनमोहन जी की सिर्फ़ कहने वाली सरकार को ही समाप्त कर देना चाहिए. 

हम आडवानी जी से अपील करते हैं कि वह इस तरह मनमोहन जी की बात का मजाक न उड़ाएं. हो सकता है इस बार वह बाकई कुछ करना चाहते हों - 'शायद उनका आखिरी हो यह सितम, हर सितम यह सोच कर हम सह गए'. हम सोनिया जी से भी अपील करते हैं कि इस बार वह मनमोहन जी कुछ कर ही लेने दें. 

Monday 24 November 2008

भारत का नेतृत्व कैसा हो?

अगले वर्ष लोक सभा के चुनाव होंगे. भारतीयों के सामने फ़िर एक अवसर है एक योग्य नेतृत्व चुनने का. यह नेतृत्व कैसा हो, इस बारे मैं आडवाणी जी ने हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरशीप समिट में क्या कहा:
"भारत को एक ऐसे मजबूत नेतृत्व और एक ऐसी सुदृढ़ सरकार की जरूरत है जिसमें वर्तमान संकट पर काबू पाने और दीर्घकालिक लक्ष्यों को कृतसंकल्प होकर हासिल करने की एक सुस्पष्ट दृष्टि रखने की क्षमता हो। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैं यह मानता हूं कि वर्तमान संकट यद्यपि आहत कर रहा है लेकिन यह भारत के लिए लम्बी छलांग लगाने हेतु अद्वितीय अवसर भी उपलब्ध करा रहा है। हम वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था में हो रहे असाधारण परिवर्तनों के परिप्रेक्ष्य में भारत के पुनर्जागरण का मौका भी हासिल कर सकते हैं। यह नेतृत्व की वर्तमान पीढ़ी और हमारे नागरिक समाज पर निर्भर करता है कि वे राष्ट्र को आगे बढ़ने के लिए बौध्दिक और नीतिगत आधार प्रदान करें जिससे एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण हो जो एक गौरवशाली और प्राचीन राष्ट्र की छवि के अनुरूप हो और जो बहुसंख्यक भारतीयों की सामाजिक तथा आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा करे।"

Friday 21 November 2008

आडवाणी जी ने सही मुद्दा उठाया है, कांग्रेस को हिन्दुओं से माफ़ी मांगनी चाहिए

प्रधानमंत्री जी ने आडवाणी जी को फोन करके कहा कि वह मालेगांव बम धमाकों में हो रही जांच का विवरण उनसे बांटना चाहते हैं. बहुत दिनों से, एक योजनावद्ध तरीके से, हिन्दुओं और हिंदू धर्म को बदनाम करने की साजिश चल रही है. यह कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति का एक हिस्सा है - हिन्दुओं को बदनाम करो तो मुसलमान खुश होंगे और उनके वोट मिलेंगे. जब बीजेपी ने इसका विरोध किया तो प्रधानमंत्री को लगा कि अब बात करनी ही चाहिए,  वरना मामला हाथ से निकल जायेगा. मुसलमानों को खुश करने के चक्कर में हिंदू नाराज हो रहे हैं. कहीं सत्ता हाथ से न निकल जाय. 

बीजेपी हमेशा से यह कहती रही है कि आतंकवादिओं का कोई धर्म नहीं होता. आतंकवादी सिर्फ़ आतंकवादी होता है. वह एक अपराधी है और उस के साथ एक अपराधी की तरह ही व्यवहार होना चाहिए. केन्द्र और महा सरकार, एटीएस और खरीदे हुए मीडिया द्वारा मालेगांव जांच की आड़ में हिन्दुओं के विरुद्ध जो दुष्प्रचार किया जा रहा है,  उस से हिन्दुओं की भावनाएं आहत हुई हैं (उन हिन्दुओं की नहीं जो जन्म से तो हिंदू हैं पर इस जन्म में हिंदू विरोधी हैं). हिन्दुओं ने कभी आतंकवाद के साथ मुस्लिम या सिख शब्द नहीं लगाए, पर इन लोगों ने हिंदू आतंकवाद का ग़लत  ढोल पीटना शुरू किया. बीजेपी की चुप्पी हिन्दुओं को अखर रही थी. जब यह दुश्प्रचार हद से बाहर होने लगा तो आडवाणी जी ने आतंकवाद के साथ हिंदू शब्द जोड़ने पर आपत्ति की. पानीपत में हिंदू संत इकठ्ठा हुए और अपना विरोध प्रकट किया. साध्वी प्रज्ञा ने कोर्ट में अपने ऊपर हो रहे मानसिक और शारीरिक अत्त्याचार के बारे में हलफनामा दाखिल किया. हिन्दुओं को इस से बहुत दुःख पहुँचा. आडवाणी जी ने इस पर एक बयान दिया और इस की घोर भर्त्सना की. इस से घबरा कर प्रधानमंत्री जी ने आडवाणी जी को फोन किया. 

इस बातचीत  के दौरान आडवाणी जी ने प्रधानमंत्री से कहा - 'आपने नासिक कोर्ट में साध्वी प्रज्ञा द्वारा दाखिल हलफनामे को पढ़ा होगा जिस में उन्होंने ख़ुद को १६ दिनों तक गैरकानूनी हिरासत में रखने और अपने ऊपर किए गए अमानवीय अत्त्याचार के बारे में अदालत को बताया है. मैंने जब इसे पढ़ा तो बहुत दुखी हुआ. मुझे विश्वास है कि आप भी बहुत दुखी हुए होंगे.'

आडवाणी जी ने यह खुलासा किया कि उनका विरोध साध्वी द्वारा लगाए गए आरोपों तक सीमित है और वह बम धमाकों में की जा रही जांच पर टिपण्णी नहीं कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि इस पूरे विषय पर वह चुप थे, लेकिन इस हलफनामे ने उन्हें अपनी चुप्पी तोड़ने पर विवश कर दिया. उन्होंने प्रधानमंत्री से मालेगांव केस को हिंदू आतंकवाद कहने पर भी विरोध जताया. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह कहना ग़लत है कि बीजेपी ने आतंकवाद पर अपनी नीति बदली है क्योंकि इस केस में पकड़े गए लोग हिंदू हैं. बीजेपी की नीति हमेशा से यही रही है  कि आतंकवादिओं का कोई धर्म नहीं होता. आतंकवादी सिर्फ़ आतंकवादी होता है. वह एक अपराधी है और उस के साथ एक अपराधी की तरह ही व्यवहार होना चाहिए. 

मैं आडवाणी जी को वधाई देता हूँ कि उन्होंने इस मुद्दे को इतने सही और स्पष्ट तरीके से उठाया है. कांग्रेस को अपनी स्थिति साफ़ करनी चाहिए और हिन्दुओं से माफ़ी मांगनी चाहिए. अदालत को साध्वी के मानवीय अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए. यातनाएं देने वाले अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही होनी चाहिए. सत्य क्या है इस के लिए इन अधिकारियों का नार्को टेस्ट होना चाहिए. 

Thursday 20 November 2008

अल्पसंख्यक : बहुसंख्यक

शब्दार्थ की द्रष्टि से अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक - दोनों शब्द सार्थक हैं किंतु राजनीतिक सन्दर्भ में दोनों त्रुटिपूर्ण हैं. राजनीति के छेत्र में इन शब्दों का सदुपयोग कम हुआ है, अधिकांशतः दुरूपयोग हुआ है. उत्तेजना फैलाने और हिंसा भड़काने में ये शब्द बाहक बने हैं. 

राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक नागरिकता की द्रष्टि से समान होता है. जब हम अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का प्रयोग करते हैं, तब राष्ट्र को गौण, जातीयता और प्रांतीयता को प्रधान बना देते हैं. मुसलमान इस्लाम के अनुयाई हैं. हिन्दुस्तान में इस्लाम के अनुयाई अल्पसंख्या में हैं और उसे न मानने वाले अधिक संख्या में. इस अल्प्संखयकता  और बहुसंख्यकता का आधार धर्म-सम्प्रदाय है, राष्ट्रीयता नहीं. राष्ट्रीयता की द्रष्टि से न कोई अल्पसंख्यक है और न कोई कोई बहुसंख्यक. अल्पसंख्यक को वही अधिकार प्राप्त हैं जो बहुसंख्यक को है, और बहुसंख्यक को वही अधिकार प्राप्त हैं जो अल्पसंख्यक को है. धार्मिक विश्वासके आधार पर जैन और बोद्ध भी अल्पसंख्यक हैं. वैदिक धर्म भी अनेक सम्प्रदायों में विभक्त है. बहुसंख्यक कौन है, यह निष्कर्ष निकालना सरल नहीं है. 

राष्ट्रीय मंच पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का प्रयोग न हो, यह राष्ट्र के हित में है. 

(लोकतंत्र : नया व्यक्ति नया समाज से साभार) 

Wednesday 19 November 2008

मुफ्त हज यात्रा - क्या इस्लाम इस की इजाजत देता है?

पिछले दिनों अखबार में एक ख़बर पढ़ी - हज पेनल की पाँच सितारा मांगें. केन्द्रीय हज कमेटी के १०० अधिकारी अपने परिवार के सदस्यों के साथ मुफ्त हज यात्रा पर चले गए हैं या जाने वाले हैं. यह लोग मुफ्त में हज यात्रा कर के पुन्य कमाएंगे, और सरकार को ८ करोड़ का चूना लगेगा. हकीकत में तो यह चूना जनता को लगेगा क्योंकि सरकार के पास तो जनता का ही पैसा है. 

हज कमेटी ने रियाध और जेद्दाह में भारतीय मिशनों को पत्र लिख कर मांग की कि इन अधिकारिओं और उनके परिवारों को अलग से पाँच सितारा सुविधाएं मुहैया कराई जाएँ. भारतीय मिशनों ने तुंरत नई दिल्ली सरकार से सलाह मांगी, क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री की और से यह हिदायतें दी गई हैं कि वह खर्च में कटौती करें. सरकार ने क्या सलाह दी, ख़बर में इसका कोई जिक्र नहीं है. जाहिर है हरी झंडी दिखाई गई होगी. 

आपने मोहम्मद ओवाईस का नाम तो सुना होगा. यह सज्जन हज कमेटी के सीईओ हैं. इन्होने मांग की कि अधिकारिओं और उनके परिवारों के रूतवे के अनुसार उन्हें अलग से पाँच सितारा रहने की जगह दी जाय जिसमे रसोई और गुसलखाने अलग से हों. अब किनसे अलग रहने की बात हो रही है यहाँ? जाहिर है उन आम मुसलामानों से जो अपने पैसे से हज यात्रा कर रहे हैं. यह अधिकारी इन आम मुसलमानों को सुविधा से यात्रा करवाने के लिए जाते हैं. इस साल इन्होनें पाँच सितारा सुवुधायें मिलें  इस की मांग की है. यह एक धर्म-निरपेक्ष राज्य की पहचान है. 

अब सवाल यह उठता है कि क्या इस्लाम मुफ्त में (यानि दूसरों के पैसे से) हज करने की इजाजत देता है? मैंने कहीं पढ़ा था कि किराए पर जो सब्सिडी दी जाती है वह भी इस्लाम के अनुसार नहीं है. इस तरह की हज यात्रा से कोई पुन्य नहीं मिलता. लेकिन जहाँ फायदा हो रहा हो वहां ऐसा क्यों सोचा जाय या माना जाय? 

Tuesday 18 November 2008

निशाचर कौन हैं?

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा  I
जे लम्पट परधन परदारा II
मानहीं मातु पिता नहीं देवा I 
साधुन्ह सन करबावहीं सेवा II
जिन्ह के यह आचरन भवानी I
ते जानहु निसिचर सब प्रानी II

"दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गए हैं. जो दूसरों की सम्पत्ति और स्त्रियों पर बुरी द्रष्टि रखते हैं; माता, पिता और देवता को जो समादर नहीं देते तथा साधुओं से सेवा लेते हैं. है, है पार्वती, जिनके ऐसे आचरण हैं, वे सबके-सब व्यक्ति निशाचर हैं." 

निशाचरों के सींग नहीं होते, न ही उनके बड़े-बड़े दांत होते हैं, न ही रंग काला होता है, और न ही वह देखने में भयंकर होते हैं. जिस भी व्यक्ति का आचरण भ्रष्ट है वह निशाचर है. आज समाज में निशाचरों की संख्या बहुत बढ़ गई है. पर-स्त्री पर वासना की द्रष्टि डालने वाले यह निशाचर आपको हर गली-रास्ते पर मिल जायेंगे. दूसरों का धन चुराने वाले निशाचर किसी भी समय हमला कर सकते हैं. माता-पिता की सेवा तो दूर, उनकी हत्या तक कर रहे हैं यह निशाचर. गुरु जनों से सेवा कराने में इन्हें लज्जा नहीं आती. यह निशाचर हर वर्ग में हैं, हर जाति में हैं, हर सम्प्रदाय में हैं, अशिक्षित और शिक्षित दोनों वर्गों में हैं, शासक और शासित में हैं, गुरु और शिष्य में हैं, समाज का कोई भी वर्ग ऐसा नहीं बचा है जहाँ यह निशाचर निवास नहीं करते. 

समाज में कृतज्ञता की भावना ही व्यक्ति को एक-दूसरे के लिए त्याग, वलिदान और सेवा की प्रेरणा देती है. निशाचर कृतज्ञता की किसी भी भावना को अस्वीकार करता है. दूसरे अर्थों में यह भी कहा जा सकता है कि निशाचर में देने की नहीं केवल लेने की भावना होती है. 

हमें इस निशाचरी प्रवृत्ति से बचना चाहिए. 

Monday 17 November 2008

लो जी मधुशाला भी इस्लाम के ख़िलाफ़ है

आप में से बहुत लोगों ने मधुशाला पढ़ी होगी. मैंने पढ़ी है और मुशायरों में सुना भी है. आज से ७३ वर्ष पहले डा. हरिवंश राय बच्चन ने यह किताब लिखी थी. अब एक मुसलमान धार्मिक नेता ने यह फतवा दिया है कि यह किताब इस्लाम के ख़िलाफ़ है. अब आगे वह क्या करेंगे - क्या इस किताब पर पाबंदी लगाने की मांग करेंगे? मौका अच्छा है, केन्द्र में कांग्रेस की सरकार है, और कांग्रेस की मालकिन डा. बच्चन के बेटे अमिताभ बच्चन को नापसंद करती है. माग फ़ौरन मांग ली जायेगी. हो सकता है बच्चन को नसरीना की तरह हिन्दुस्तान से बाहर जाने को कहा जाए. 

Sunday 16 November 2008

अडवाणी जी, ऐसी वेबसाईट का क्या फायदा?

अखबार में देखा कि आपने अपनी व्यक्तिगत वेबसाईट का उदघाटन किया है. अच्छा लगा. सोचा कि अब आपसे सीधे बात चीत कर सकेंगे. आपकी नीतियों, आपके कार्यक्रमों पर अपनों राय दे सकेंगे. आपको अपनी अपेक्षाओं के बारे में बता सकेंगे. तुंरत पहुंचे आप की वेबसाईट पर. रजिस्ट्रेशन किया. रजिस्ट्रेशन कन्फर्म हुआ. फ़िर आपकी एक पोस्ट पर अपनी राय दी. एक नई पोस्ट भी लिखी, आंतरिक सुरक्षा पर. संदेश आया कि मोडरेटर मेरी राय पर विचार करेंगे और फ़िर उसे छापेंगे. 

आज एक हफ्ता हो गया, आपके मोडरेटर साहब पता नहीं कहाँ गुम हो गए हैं? रोज आपकी साईट पर जाता हूँ और निराश लौटता हूँ. जनता की एक भी पोस्ट नहीं छापी गई है वहां. आज अखबार में देखा कि दिल्ली के मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार मल्होत्रा जी ने भी अपनी व्यक्तिगत साईट बना दी है. क्या उस साईट का भी यही हाल होगा?

क्यों बनाई आपने यह वेबसाईट? अडवाणी जी, ऐसी वेबसाईट से क्या फायदा? 

Saturday 15 November 2008

समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति कैसे हों?

ईश्वर ने जिसे प्रतिष्ठा दी हो, समाज ने जिसे अधिकार दिया हो, उसे सर्व-साधारण के लिए हर समय जागना चाहिए. 

जब पैर में काँटा चुभता है तब मष्तिष्क विश्राम नहीं कर पाता है. इसी तरह साधारण से साधारण जन के कष्ट में होने पर समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति तब तक न सोयें जब तक उनका कष्ट दूर न हो जाए. 

जो समाज का दुःख स्वयं ले लेते हैं, वह नीलकंठ बन कर पूजे जाते हैं. जो समाज का सुख छीनते हैं वह राहू की तरह दुर्दशा को प्राप्त होते हैं. 

Friday 14 November 2008

चंद्रयान मिशन सफल, वधाईयां

चन्द्रयान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के एक अभियान व यान का नाम है। चंद्रयान चंद्रमा की तरफ कूच करने वाला भारत का पहला अंतरिक्ष यान है। इस अभियान के अन्तर्गत एक मानवरहित यान को २२ अक्तूबर, २००८ को चन्द्रमा पर भेजा गया है। यह यान पोलर सेटलाईट लांच वेहिकल (पी एस एल वी) के एक परिवर्तित संस्करण वाले राकेट की सहायता से प्रक्षेपित किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र 'इसरो' के चार चरणों वाले ३१६ टन वजनी और ४४.४ मीटर लंबा अंतरिक्ष यान चंद्रयान प्रथम के साथ ही ११ और उपकरण एपीएसएलवी-सी११ से प्रक्षेपित किए गए जिनमें से पाँच भारत के हैं और छह अमरीका और यूरोपीय देशों के।इसे चन्द्रमा तक पहुँचने में ५ दिन लगेंगे पर चन्द्रमा की कक्षा में स्थापित करने में 15 दिनों का समय लग जाएगा । इस परियोजना में इसरो ने पहली बार १० उपग्रह एक साथ प्रक्षेपित किए हैं।

चंद्रयान-प्रथम चांद पर पहुंच कर वहां एक उपग्रह स्थापित करेगा। चंद्रमा से १०० किमी ऊपर ५२५ किग्रा का एक उपग्रह ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया जाएगा। यह उपग्रह अपने रिमोट सेंसिंग (दूर संवेदी) उपकरणों के जरिये चंद्रमा की ऊपरी सतह के चित्र खींचेगा । चंद्रमा पर जाने वाला यह यान घरेलू ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण वाहन से भेजा जाएगा। चंद्रयान-प्रथम मिशन से अत्याधुनिक वैज्ञानिक शोध के नए रास्ते खुलने की आशा जताई जा रही है। स्वदेश निर्मित प्रक्षेपण वाहन और अंतरिक्षयान क्षमताओं के कारण भारत महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष योजनाओं को अंजाम देने में सक्षम है। इससे भविष्य में चन्द्रमा और मंगल ग्रह पर मानव-सहित विमान भेजने के लिये रास्ता खुलेगा। भारतीय अंतरिक्षयान प्रक्षेपण के अनुक्रम में यह २७वाँ उपक्रम है।

कैसे और कब हुआ यह सब:

    * बुधवार २२ अक्तूबर २००८ को छह बजकर २१ मिनट पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से चंद्रयान प्रथम छोड़ा गया। इसको छोड़े जाने के लिए उल्टी गिनती सोमवार सुबह चार बजे ही शुरू हो गई थी। मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों में मौसम को लेकर थोड़ी चिंता थी, लेकिन सब ठीक-ठाक रहा। आसमान में कुछ बादल जरूर थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी और बिजली भी नहीं चमक रही थी। इससे चंद्रयान के प्रक्षेपण में कोई दिक्कत नहीं आयी। इसके सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत दुनिया का छठा देश बन गया है, जिसने चांद के लिए अपना अभियान भेजा है। इस महान क्षण के मौके पर वैज्ञानिकों का हजूम 'इसरो' के मुखिया जी माधवन नायर 'इसरो' के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन के साथ मौजूद थे। इन लोगों ने रुकी हुई सांसों के साथ चंद्रयान प्रथम की यात्रा पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लगातार नजर रखी और एक महान इतिहास के गवाह बने।
    * चंद्रयान के ध्रुवीय प्रक्षेपण अंतरिक्ष वाहन पीएसएलवी सी-११ ने सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से रवाना होने के १९ मिनट बाद ट्रांसफर कक्षा में प्रवेश किया। ११ पेलोड के साथ रवाना हुआ चंद्रयान पृथ्वी के सबसे नजदीकी बिन्दु (२५० किलोमीटर) और सबसे दूरस्थ बिन्दु (२३, ००० किलोमीटर) के बीच स्थित ट्रांसफर कक्षा में पहुंच गया। दीर्घवृताकार कक्ष से २५५ किमी पेरिजी और २२ हजार ८६० किमी एपोजी तक उठाया गया था।
    * गुरुवार २३ अक्तूबर को दूसरे चरण में अंतरिक्ष यान के लिक्विड इंजिन को १८ मिनट तक दागकर इसे ३७ हजार ९०० किमी एपोजी और ३०५ किमी पेरिजी तक उठाया गया।
    * शनिवार २५ अक्तूबर को तीसरे चरण के बाद कक्ष की ऊंचाई बढ़ाकर एपोजी को दोगुना अर्थात ७४ हजार किमी तक सफलतापूर्वक अगली कक्षा में पहुंचा दिया गया। इसके साथ ही यह ३६ हजार किमी से दूर की कक्षा में जाने वाला देश का पहला अंतरिक्ष यान बन गया। 
    * सोमवार २७ अक्तूबर को चंद्रयान-१ ने सुबह सात बज कर आठ मिनट पर कक्षा बदलनी शुरू की। इसके लिए यान के ४४० न्यूटन द्रव इंजन को साढ़े नौ मिनट के लिए चलाया गया। इससे चंद्रयान-१ अब पृथ्वी से काफी ऊंचाई वाले दीर्घवृत्ताकार कक्ष में पहुंच गया है। इस कक्ष की पृथ्वी से अधिकतम दूरी १६४,६०० किमी और निकटतम दूरी ३४८ किमी है। 
    * बुधवार २९ अक्तूबर को चौथी बार इसे उसकी कक्षा में ऊपर उठाने का काम किया। इस तरह यह अपनी मंजिल के थोड़ा और करीब पहुंच गया है। सुबह सात बजकर ३८ मिनट पर इस प्रक्रिया को अंजाम दिया गया। इस दौरान ४४० न्यूटन के तरल इंजन को लगभग तीन मिनट तक दागा गया। इसके साथ ही चंद्रयान-१ और अधिक अंडाकार कक्षा में प्रवेश कर गया। जहां इसका एपोजी [धरती से दूरस्थ बिंदु] दो लाख ६७ हजार किमी और पेरिजी [धरती से नजदीकी बिंदु] ४६५ किमी है। इस प्रकार चंद्रयान-1 अपनी कक्षा में चंद्रमा की आधी दूरी तय कर चुका है। इस कक्षा में यान को धरती का एक चक्कर लगाने में करीब छह दिन लगते हैं। इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमान नेटवर्क और अंतरिक्ष यान नियंत्रण केंद्र, ब्यालालु स्थित भारतीय दूरस्थ अंतरिक्ष नेटवर्क एंटीना की मदद से चंद्रयान-1 पर लगातार नजर रखी जा रही है। इसरो ने कहा कि यान की सभी व्यवस्थाएं सामान्य ढंग से काम कर रही हैं। धरती से तीन लाख ८४ हजार किमी दूर चंद्रमा के पास भेजने के लिए अंतरिक्ष यान को अभी एक बार और उसकी कक्षा में ऊपर उठाया जाएगा।
    * शनिवार 8 नवम्बर को चन्द्रयान भारतीय समय अनुसार करीब 5 बजे सबसे मुश्किल दौर से गुजरते हुए चन्दमाँ की कक्षा में स्थापित हो गया। अब यह चांद की कक्षा में न्यूनतम 504 और अधिकतम 7502 किमी दूर की अंडाकार कक्षा में परिक्रमा करगा। अगले तीने-चार दिनों में यह दूरी कम होती रहेगी।
     * आज शुक्रवार, १४ नवम्बर को एम्आईपी (मून इम्पेक्ट प्रोब) चंद्रयान से अलग हुआ और सायं ०८.३१ बजे चाँद की सतह पर उतर गया. यह प्रोब तिरंगे के रंग में रंगा गया है. इस सफलता से भारत विश्व के ऐसा तीसरा देश बन गया है जिनका राष्ट्रीय ध्वज चाँद की सतह पर मौजूद है. प्रोब से सिग्नलस आने प्रारम्भ हो गए हैं. 

आज के दिन भारत के लिए एक एतिहासिक दिन है. सभी भारतीयों को ढेर सारी वधाईयां. 



(विकी से साभार)

Wednesday 12 November 2008

गुरु नानक देव जी के जन्म दिन पर लख-लख वधाईयां

गुरू नानक देव सिखों के प्रथम गुरू थे । गुरु नानक देवजी का प्रकाश (जन्म) 15 अप्रैल 1469 ई. (वैशाख सुदी 3, संवत्‌ 1526 विक्रमी) में तलवंडी रायभोय नामक स्थान पर हुआ। सुविधा की दृष्टि से गुरु नानक का प्रकाश उत्सव कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है। तलवंडी अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। तलवंडी पाकिस्तान के लाहौर जिले से 30 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।

Tuesday 11 November 2008

वंदे मातरम्

वंदे मातरम्!
सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्,
शस्यश्यामलाम्, मातरम्!
शुभ्रज्योत्सनाम् पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्,
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्,
सुखदाम् वरदाम्, मातरम्!
वंदे मातरम्!॥


I bow to thee, Mother,
richly-watered, richly-fruited, 
cool with the winds of the south,
dark with the crops of the harvests, the Mother! 
Her nights rejoicing in the glory of the
moonlight, 
her lands clothed beautifully with her trees in flowering bloom,
sweet of laughter, sweet 
of speech, 
the Mother, giver of boons, 
giver of bliss.

Monday 10 November 2008

चेतावनी दी ईश्वर ने

कल रात सपने में ईश्वर आए. मैंने उन्हें प्रणाम किया, उन्होंने आशीर्वाद दिया, 'सुखी रहो और सबसे प्रेम करो'.

उन्होंने कहा, 'तुम ब्लाग लिखते हो, आज वह लिखना जो मैं तुम्हें अभी कहने जा रहा हूँ'.
मैंने कहा, 'जैसी आपकी आज्ञा'. 
वह बोलते रहे, मैं लिखता रहा.

"तुम जो करते हो वह तुम्हारे एकाउंट में जमा हो जाता है, तुम प्रेम करते हो तो प्रेम,नफरत करते हो तो नफरत. जितना प्रेम तुम्हारे एकाउंट में होगा उतना लोग तुमसे प्रेम करेंगे. इसी तरह जितनी नफरत तुम्हारे एकाउंट में होगी उतना लोग तुमसे नफरत करेंगे. अगर तुमने किसी की हत्या कर दी तो बदले में कोई तुम्हारी हत्या करेगा. जितनी बार तुम हत्या करोगे उतनी ही बार तुम्हारी हत्या होगी. जितनी बार तुम किसी की मदद करोगे उतनी ही बार लोग तुम्हारी मदद करेंगे. 

तुम जिस दुनिया में रहते हो, अपराध करके उस दुनिया के कानून से बच सकते हो, पर मेरे कानून से नहीं बचोगे. तुम्हारा जरा सा अपराध भी मुझसे छिपा नहीं रहता. तुम मन में किसी के बारे में बुरा सोचते हो, किसी के बारे में बुरा कहते हो, किसी का बुरा करते हो, यह सब अपराध हैं और इन सब अपराधों की सजा मिलेगी. मेरा नाम लेकर तुम जो अपराध करते हो, वह सबसे बड़ा अपराध है. उसकी सजा भी बहुत भयंकर है. 

संभल जाओ, मैं बार-बार समझाने नहीं आऊंगा."

ईश्वर की आज्ञानुसार मैंने यह सब ब्लाग पर लिख दिया, अब आप जानो और आपका ईश्वर जाने. 

Sunday 9 November 2008

यूपी में कांग्रेस की सरकार

बहुत कोशिशों के बाद भी कांग्रेस यूपी में अपनी सरकार नहीं बना पा रही है. यह कांग्रेस और उसकी मालकिन के लिए बहुत हो निराशा की बात है. कुछ लोग इसे शर्म की बात भी कहते हैं. जिन्होनें ने भारत के प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति मनोनीत किए वह यूपी के मुख्यमंत्री को मनोनीत नहीं कर सकीं. मुझे कांग्रेस से सहानुभूति है, इस लिए मैंने एक्स्ट्रा समय निकाल कर इस पर बहुत सोच-विचार किया. इस सोच-विचार का परिणाम यह निकला कि मुझे दो रास्ते नजर आए जिन पर चल कर कांग्रेस यूपी में अपनी सरकार बना सकती है. 

पहला रास्ता - कांग्रेस मायावती को प्रधान मंत्री बना दे, और बदले में मायावती मनमोहन सिंह को यूपी का मुख्य मंत्री बना दे. 

दूसरा रास्ता - कांग्रेस यूपी को दो हिस्सों में बाँट दे, एक हिस्से में रायबरेली और अमेठी, तथा दूसरे हिस्से में बाकी बचा यूपी. दूसरे हिस्से का नाम मायावती प्रदेश रख दिया जाय और मायावती को उसका आजीवन मुख्य मंत्री बना दिया जाय. पहले हिस्से का नाम यूपी रहने दिया जाय. वहां पहले से ही परिवार जीता हुआ है. कांग्रेस अपनी सरकार बना ले. 

Wednesday 5 November 2008

मुस्लिम कौम के लिए पहली जिम्मेदारी किस की है?

अपने मुसलमान भाईयों और बहनों से मैं एक सवाल पूछना चाहता हूँ - मुस्लिम कौम के लिए पहली जिम्मेदारी किस की है - मुसलमानों की, या भारतीय समाज की, या भारत सरकार की, या दूसरे धर्मों के लोगों की? क्या आप इस बात से इन्कार करेंगे अगर मैं यह कहूं कि मुस्लिम कौम के लिए पहली जिम्मेदारी मुसलमानों की है? क्या मुसलमान अपनी यह जिम्मेदारी ईमानदारी से निभा रहे हैं? 

कहा जाता है कि अधिकांश मुसलमान गरीब हैं, गन्दी बस्तियों में रहते हैं, बीमार हैं, अशिक्षित हैं, राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल नहीं हैं. यह भी कहा जाता है कि सरकार ने उन के लिए कुछ नहीं किया. यह भी आरोप लगाया जाता है कि भारत में मुसलमानों का शोषण हो रहा है. धर्म के नाम पर उनके साथ ज्यादती की जा रही है. इन आरोपों में कितना सच है और कितना झूट, यह बहस का विषय हो सकता है. पर मेरी इस पोस्ट का विषय यह नहीं है. 

ऐसे मुसलमानों की संख्या भी बहुत ज्यादा है जो पैसे वाले हैं. मुस्लिम धार्मिक संस्थानों के पास भी बहुत पैसा है. दुनिया के दूसरे मुल्कों से भी पैसा आता है. अगर यह पैसा इन मुसलमानों की जन्दगी का स्तर सुधारने में खर्च किया जाय तो कोई कारण नहीं है कि भारत के सारे मुसलमान एक अच्छी और इज्जतदार जिंदगी न गुजार सकें. पर ऐसा नहीं होता. यह पैसा बारूद खरीदने, बम धमाके करने और निर्दोष नागरिकों की जान लेने में खर्च किया जाता है. जो मुसलमान इस देश के लिए और अपनी कौम के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं वह उसका उल्टा कर रहे हैं. बम विस्फोट करने से, निर्दोष लोगों को मारने से, मुसलमानों की स्थिति कैसे सुधर जायगी? मुसलमान भी दूसरे आम इंसानों की तरह है, उन्हें भी जरूरत है एक खुशनुमां जिन्दगी की, पर कुछ मुसलमान ख़ुद ही उनसे यह जिंदगी छीन रहे हैं. झूठे, बेबुनियाद आरोप लगाकर उनके दिल में हिन्दुओं से डर पैदा कर रहे हैं, ताकि वह हिन्दुओं के नजदीक न आ सकें और इस देश की मुख्य धारा में शामिल न हो सकें. क्योंकि जब तक वह डरते रहेंगे तभी तक उन का नाजायज इस्तेमाल किया जा सकेगा. 

मैं अगर यह कहूं कि कुछ मुसलमान  ही मुसलिम कौम के दुश्मन बने हुए हैं तो यह  किसी तरह ग़लत नहीं होगा. मुस्लिम कौम के लिए पहली जिम्मेदारी मुसलमानों की है, सब मुसलमान यह जिम्मेदारी पूरी करें. हिन्दुओं पर भरोसा करें. दोस्ती का एक हाथ बढ़ायें हिन्दुओं की तरफ़, हिंदू उन्हें गले से लगा लेंगे. हिंदू हाथ फैलाए खड़े हैं, मेरे  मुसलमान भाइयों और बहनों आप एक कदम आगे तो बढ़ाइये. 

Tuesday 4 November 2008

आजादी

जब कहा तिलक ने आज़ादी,
है जन्म सिद्ध अधिकार मेरा,
तब शामिल था उस कहने में,
कर्तव्य मेरा, कर्तव्य तेरा.

क्या मिलना था, क्या मिल पाया,
क्या देना था, क्या दे पाये,
आओ भारत मां के बच्चों,
कुछ लेखा-जोखा हो जाय.

आज़ादी मर कर जीने की,
आज़ादी जी कर मरने की,
आज़ादी कुछ भी कहने की,
आज़ादी कुछ भी करने की,
आज़ादी कुछ न करने की,
आज़ादी ऊंचा उठने की,
आज़ादी नीचा गिरने की.

क्या मिली है पूरी आजादी?
या अभी लड़ाई जारी है?
अधिकार माँगना सीख लिया,
कर्तव्य निभाना बाकी है.

नफरत छोड़ो और प्रेम करो,
सब हैं समान, सब हैं भाई,
कर्तव्य निभाओ सुख पाओ,
यह बात कृष्ण ने समझाई. 

Sunday 2 November 2008

धर्मयुद्ध और जिहाद

अभी-अभी एक लेख पढ़ा सन्डे टाइम्स में. लेखक हैं इश्तियाक दानिश, हमदर्द यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. लेख का विषय  है, धर्मयुद्ध और जिहाद. आप सबसे निवेदन है, इस लेख को जरूर पढ़ें और अपनी राय दें.

 
अमन-पसंद लोगों को यह लेख जरूर पसंद आएगा.


 

Saturday 1 November 2008

आओ एक दूसरे का दर्द महसूस करें

युसूफ किरमानी ने अपने ब्लाग 'हम सब की बात' पर एक पोस्ट डाली है जिसका शीर्षक है 'मुशीरुल हसन की आवाज सुनो'. मैंने अपनी राय दर्ज करा दी, फ़िर सोचा कि अगर मैं इस मुद्दे पर पोस्ट लिखता तो उसे क्या शीर्षक देता?   सोचा और फ़िर यह पोस्ट यहाँ इस ब्लाग पर दाल दी. शीर्षक रखा - 'आओ एक दूसरे का दर्द महसूस करें'. 

मुशीरुल हसन साहब ने जामिया में एक समारोह आयोजित किया और उस में शबाना आजमी और नसीरुद्दीन शाह को डाक्टर की उपाधि से सम्मानित किया. इस समारोह में उन्होंने एक भाषण दिया जिसके बारे में किरमानी साहब ने लिखा कि मुशीरुल हसन की आवाज सुनो. हसन साहब ने हमें आमंत्रित ही नहीं किया, वरना हम भी उन की आवाज सुन लेते और जामिया का दर्द महसूस कर लेते. इतने बड़े विश्वविद्यालय के इतने बड़े वाइस चांसलर की आवाज सुनने का मौका निकल गया. खैर कोई बात नहीं, उन्होंने जो कहा वह अखबार में तो पढ़ ही लिया. अखबार ने जो और जैसा लिखा है उस से उनकी बातें काफ़ी हद तक सही लगीं, पर यह नहीं समझ में आया कि वह अपने दर्द के लिए किसे जिम्मेदार मानते हैं और यह सब किस से कह रहे हैं, सरकार से, पुलिस से, राजनीतिक दलों से, जामिया के और देश के दुखी मुसलमान समुदाय से या हिंदू समुदाय से, और उन से क्या चाहते हैं?

उन्होंने शबाना आजमी को डाक्टर बना दिया. अगर शबाना को यह सम्मान उनके समाज और देश को दिए गए किसी महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है तो बहुत अच्छी बात है. लेकिन अगर उन्हें इस लिए सम्मानित किया गया कि कुछ दिन पहले उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को मुसलमानों के ख़िलाफ़ बताया था, तो मेरे जैसे आम समझ वाले हिन्दुस्तानी को दुःख होगा. अखबार ने लिखा है कि हसन साहब ने हुसैन को भी यह सम्मान दिया था, जिन्होनें हिंदू देवी-देवताओं के नग्न चित्र बनाये थे. अगर यह सही है तो इस बात से हमें दुःख हुआ. 

अब एक मुद्दा यह बना कि हम तो जामिया के दर्द को महसूस कर रहे हैं, पर क्या हसन साहब और जामिया हमारे दर्द को महसूस करेंगे जो उन्होंने शबाना और हुसैन को इस तरह सम्मानित करके हमें दिया है? दूसरी बात, हिन्दुओं को भी दुःख होता है जब उनके परिवार, रिश्तेदारी और मित्रों में कोई बम धमाकों में जान गंवाता है. क्या हसन साहब और जामिया हिन्दुओं के इस दर्द को महसूस करते हैं? 

दर्द तो सब को होता है. हम दूसरों से कहें कि हमारा दर्द महसूस करो पर हम ख़ुद दूसरों का दर्द महसूस न करें तो बात कैसे बनेगी? आइये सब एक दूसरे का दर्द महसूस करें और उसे दूर करने के उपाय खोजें और उन पर अमल करें.