दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Thursday, 12 August, 2010

आजादी की सालगिरह !!!

डरी-डरी, सहमी-सहमी सी,
सालगिरह आजादी की,
जश्न मनेगा लाल किले पर,
आगे-पीछे, दायें-बांयें, ऊपर-नीचे,
खोजी आँखें, खोजी कुत्ते,
अन्दर दुश्मन, बाहर दुश्मन,
कुर्सी से आजाद नहीं जो,
भाषण देंगे आजादी पर,
नपा तुला हर शब्द कहेंगे,
वोट बेंक की तिकड़म-विकड़म,
कोई भी आजाद नहीं है,
क्या जनता और क्या सरकार,
छोड़ो यार मंगाओ बोतल,
आओ गलत करें गम अपना,
खा गई रविवार की छुट्टी,
आजादी की सालगिरह यह.

Friday, 18 June, 2010

क्या आप इसे पार्क कहेंगे?

पार्क यानी उपवन, उद्यान, क्रीड़ावन.
पार्क यानि जमीन का एक हिस्सा उसकी प्राकृतिक अवस्था में
सम्भाल कर रखना; या शहर के बीच जमीन का एक हिस्सा जिसे मनोरंजन के लिए प्रयोग किया जाय.
अब देखिये यह स्लाईड शो - जमीन के इस हिस्से को दिल्ली विकास प्राधिकरण पार्क कहता है. यह फोटो मैंने डीडीए के पश्चिम पूरी स्थित डिस्ट्रिक्ट पार्क में खींचे हैं.


क्या आप इसे पार्क कहेंगे?

Thursday, 18 March, 2010

साझा धन खेल और मजदूरों का शोषण

समिति की रिपोर्ट आई,
हमारी गर्दन शर्म से झुक गई,
युद्ध स्तर पर चलता निर्माण कार्य,
मजदूरों से युद्ध करते खेल आयोजक,
न्यूनतम वेतन नहीं,
ओवरटाइम का कोई पैसा नहीं,
केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार,
मजदूरों का कर रही हैं शोषण,
अमानवीय परिस्थित्तियों में वाध्य काम करने को,
गरीब बेसहारा मजदूर,
शीला, सोनिया, मनमोहन,
गर्व से तान कर गर्दनें,
बैठे तैयार फीते काटने को,
देश शर्मशार हुआ,
क्या अदालत देगी सजा मुजरिमों को?

विदेशी आते रहे, मुआयना करते रहे,
आयोजकों को तमगे देते रहे,
शोषित मजदूरों की चिंता किसी ने नहीं की,
'फर्स्ट वर्ल्ड' पानी पियेंगे मेहमान,
'सात सितारा' मूत्रालय में करेंगे मूत्रदान,
साझा धन खेलों की शान,
मजदूर होते हैं जानवर समान.

Wednesday, 17 March, 2010

नेता का जन्म दिन और गरीब के बच्चे की मौत

अरे तुम रोटी खा रहे हो,
हमारी नेता का जन्म दिन है भूल गए,
उनका जन्म दिन तो अक्सर आता है बाबू,
कई दिन बाद रोटी मिली है आज,
भूखे हैं बच्चे, खाने दो न,
पिछले जन्म दिन में भी,
छीन ले गए थे तुम सारी मजदूरी,
नेता को हार बना कर पहना दी थी,
हफ्ता भर भूखे रहे थे सब,
क्या मिला तुम्हें?
क्या मिला नेता को?
रामधन का बेटा मर गया था भूख से.
क्या इस बार मेरे बच्चों को मारोगे?

Friday, 26 February, 2010

होली आई, होली आई

होली आई, होली आई,
रंग बिरंगी होली आई,

किशिता की तैयारी पूरी,
सिया की तैयारी पूरी,
नया रंग और नई पिचकारी,
गुब्बारे और लाल गुलाल,
होली आई, होली आई.

दही बड़े, आलू की चाट,
कचरी, पापड़ और समोसे,
सबने मिलकर दादी के संग,
मावे की गुझिया बनबाई,
गन्ने और गेहूं की बालें,
होली आई, होली आई,

लकड़ी उपले घास फूस से,
चौराहे पर बनी होलिका,
नफरत और बुराई को सब,
आओ मिल कर साथ जलाएं,
नाचे गांए ख़ुशी मनाएं,
होली आई, होली आई,

Monday, 22 February, 2010

क्या जलाओगे इस होली पर?

वर्मा जी ने पत्रकारिता शुरू की,
पहला प्रोजेक्ट होली पर,
लोगों से एक सवाल पुछा,
क्या जलाओगे इस होली पर?
जो जवाब मिले देखिये,
आतकंवादी - लोगों के बीच प्रेम,
सास - छोटे बेटे की बहू,
राजनीतिबाज - जनता का धन,
अध्यापक - बच्चों का भविष्य,
पत्नी - पति का बटुआ,
पति - पत्नी के गले का हार,
वकील - क्लाइंट के घर की ख़ुशी,
मैं - लोगों के बीच नफरत.

Wednesday, 27 January, 2010

मंहगाई है जनता का भाग्य !!!

आखिरकार वह वक्त आ ही गया,
सरकार ने माना मंहगाई है,
कवायद शुरू हो गई,
मंहगाई कम करने की नहीं,
इल्जाम लगाने की एक दूसरे पर,
विरोधी पक्ष ने बात पकड़ ली,
तो फिर सब मिल गए,
मंहगाई की बात फिर गए भूल,
जनता का भाग्य जब यही है,
तब सरकार क्या करे?

Sunday, 24 January, 2010

फिर आ गई छब्बीस जनवरी

फिर आ गई छब्बीस जनवरी,
फिर निकलेगी राज मार्ग पर,
जो परेड हर साल निकलती,
थके ऊंघते नेता दर्शक,
मजबूरी में आना पड़ता,
राष्ट्रीय कर्तव्य हमारा,
हर साल दिखावा करना पड़ता,
थकी थकी राष्ट्रपति महोदया,
हाथ उठाओ, हाथ गिराओ,
प्रथम नागरिक के जीवन में,
सबसे कठिन यही एक दिन है.

मेरी कालोनी के अन्दर,
झंडा फहराया जाएगा,
पिछले वर्षों की भांति ही,
गिने चुने दो चार लोग ही,
झंडा फहराने आयेंगे,
राष्ट्रीय कर्तव्य हमारा,
छोड़ो यार मनाओ छुट्टी,
मेरे न जाने से भैया,
कोई फर्क नहीं पड़ने वाला,
झंडा फहराते शर्माजी,
गान गाते हैं वर्माजी,
छोड़ो यार मनाओ छुट्टी.

Tuesday, 12 January, 2010

सरकार विज्ञापन क्यों देती है?

शर्मा जी ने पूछा,
सरकार विज्ञापन क्यों देती है?
करोड़ों रूपए खर्च कर देती है,
किसे फायदा होता है इस से?
सरकार को या जनता को?
वर्मा जी ने समझाया,
फायदा न सरकार को न जनता को,
विज्ञापन में जो लिखा है,
और वह क्यों लिखा है,
सरकार और जनता दोनों जानते हैं,
फायदा होता है नेताओं और बाबुओं को,
मीडिया को, उनके एजेंटों को,
जनता का पैसा सरकार का है,
सरकार खर्च करती है,
या समझिये बाँट देती है,
सबको मिलता है उनका हिस्सा,
मेडम का फोटो छप जाता है,
उन की चमचागिरी हो जाती है,
यह असली फायदा है,
हल्दी लगे न फिटकरी,
रंग चोखा आ जाता है.

Friday, 8 January, 2010

सरकार, निगम और मानवता

कुछ दिन पहले एक सत्य प्रस्तुत किया था,
दिल्ली बनेगी दुल्हन,
उजाड़ दिया था बसेरा ग़रीबों का,
दिल्ली सरकार और नगर निगम ने,
छीन ली थी टूटी फूटी छत,
ग़रीबों के सर से,
गरीब रोते रहे, बिलखते रहे,
किसी का दिल नहीं पसीजा,
न सरकार में, न निगम में,
अदालत ने हुकुम दिया,
तब सरकार और निगम में,
हरकत शुरू हुई,
न सरकार, न निगम,
किसी में नहीं है मानवता,
बात हाँ जरूर करते हैं,
आम आदमी की.

Sunday, 3 January, 2010

उनकी तरक्की पर देश है शर्मसार

मिलिए उन पुलिस वालों से,
रुकावटें डालीं जिन्होनें न्याय के रास्ते में,
जान वूझ कर बरती लापरवाही,
अपना कर्तव्य निभाने में,
दुरूपयोग किया कानून का,
करने को मदद अपराधी पुलिस वाले की,
बदले में मिली तरक्की और सम्मान,
एक कर रहा है जांच सुप्रीम कोर्ट के लिए,
गुजरात के दंगों की,
दूसरा सदस्य है मानवाधिकार आयोग का,
कैसी विडंबना है यह?
जिसने किया मासूम रुचिका के मानवीय अधिकारों का उल्लंघन,
बना बैठा है मानवाधिकार आयोग का सदस्य,
कैसी है यह सरकार?
कैसी है यह न्याय व्यवस्था?
जो सजा देने की जगह,
देती है तरक्की ऐसे लोगों को.