दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Tuesday 29 April 2008

पादरी होता चर्च में

एक गाँव में रहता था एक पादरी,
सीधा, सरल, म्रदुभाशी, पर किताबी तौर पर अनपढ़,
चर्च ने बनाया एक कानून,
पादरी होंगे कम से कम दसवीं पास,
कानून गाँव में पहुँचा और पादरी की नौकरी चली गई.

रोया, गिड़गिड़ाया, दुहाई दी पर बड़े पादरी नहीं माने,
सारी जिन्दगी गुजार दी अच्छा बनने में,
क्या मिला अच्छा बन कर?
करूँगा अब सारे बुरे काम,
शुरू करूँगा सिगरेट से,
सारा गाँव घूम आया सिगरेट नहीं मिली,
सोचा लोग शहर से लाते होंगे,
मैं ही क्यों न खोल लूँ दुकान गाँव में?
दुकान खोली और व्यापार चल निकला,
पास के गाँव में भी खोल ली दुकान,
बेंक में अकाउंट खुल गया,
नया मेनेजर बेंक में आया,
पादरी को मिलने बुलाया,
आप सिर्फ़ पैसा जमा करते हैं निकालते नहीं,
सुना है शिक्षित भी नहीं है आप,
पर गजब के बिजिनेसमेन हैं आप,
अगर पढ़े लिखे होते तो?
पादरी होता चर्च में.

तीन करोड़ का थप्पड़

क्रिकेट कभी भद्र्लोगों का खेल माना जाता था. अब वह अभद्र्लोगों का खेल हो गया है. पहले गाली-गलौज और अब थप्पड़. लोग इसे कुछ भी कहें, पर इससे एक फायदा हुआ है. इस अनुभव के साथ क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद अब क्रिकेटर्स आसानी से राजनीति में जा सकते हैं. राजनीतिबाज अभद्र और क्रिकेटी अभद्र, खूब मजे से गुजरेगी जब मिल बैठेंगे दो चोटी के अभद्र.

भज्जी ने श्रीशांत को थप्पड़ ज़ड़ दिया. श्रीशांत फूट-फूट कर रोये. टी वी चैनल्स ने फूट-फूट कर रोते श्रीशांत को इतना ज्यादा दिखाया की सारा देश रोने लगा. बी सी सी आई और आई पी एल भी रोने लगे. सब भज्जी को रुलाने की बात करने लगे. फारूख इंजिनियर साहब ने आखिरकार भज्जी को रुला ही दिया. तीन करोड़ का झटका दिया भज्जी को. भज्जी इस अभद्रता के मैदान से महान बन कर निकले. तीन करोड़ का झटका खाने के बाद मुस्कुराये, श्रीशांत से हाथ मिलाया. सब को धन्यवाद कहा, और आशा प्रकट की कि भविष्य में भी उन्हें इस प्रकार का सहयोग मिलता रहेगा. यानी तीन करोड़ के झटके और भी लगाए जाते रहेंगे.

अभी तक तो नेहरू-गाँधी परिवार के लोग ही महान होते थे. सोनिया गाँधी ने पी एम् की कुर्सी ठुकरा दी. राहुल को युवराज कहा जाना पसंद नहीं है. प्रियंका जेल में अपने पिता के कातिल से गले मिलने गईं. अब भज्जी ने भी महानता के रास्ते पर कदम रख दिया है. तीन करोड़ का झटका खाकर मुस्कुराना और इस के लिए सबका धन्यवाद करना एक अब्बल दर्जे की महानता है. मुझे डर है कि भज्जी कहीं राहुल की पारिवारिक महानता के लिए खतरा न बन जायें.

यह तो रही थप्पड़ और महानता की बात. क्रिकेट में रिकार्ड का बहुत महत्त्व है. जरा देखें तो कहीं इस महान अभद्रता के प्रकरण ने कोई रिकार्ड तो नहीं बना दिया? तीन करोड़ का थप्पड़. कहीं यह रिकार्ड तो नहीं बन गया? क्रिकेट के रिकार्दियों को रिसर्च करनी चाहिए. अब तक क्रिकेट के इतिहास में कितने थप्पड़ लगे हैं और सब से महंगा थप्पड़ किस ने किस को और कब मारा? यदि यह पहला थप्पड़ है तब भज्जी इस महान परम्परा की शुरुआत के लिए एक पद्म पुरूस्कार के अधिकारी तो हो ही जाते हैं.

Friday 25 April 2008

स्वान्तः सुखाय सुरेश गाथा

मेरे कहने की और उनके न सुनने की आदत बहुत पुरानी है.
मैं अपनी आदत से बाज न आया और वह अपनी आदत से बाज न आए.
अब तो आदत से बाज न आने की आदत सी हो गई है.
इंटरनेट के आने से एक और मौका मिला अपनी बात कहने का.
जो मन में आया लिख दिया.
कंप्युटर स्क्रीन पर उसे छपा हुआ देख भी लिया.
अब वह उसे पढ़ें या न पढ़ें उनकी मर्जी,
अपना तो काम हो गया.
स्वान्तः सुखाय सुरेश गाथा.

Thursday 24 April 2008

सरकार है कहाँ?

कहते हैं दिल्ली में एक सरकार है,
एक क्या कई सरकार हैं,
मनमोहन सिंह की सरकार,
शीला दीक्षित की सरकार,
पर वह सरकार है कहाँ?
क्या आप ने उसे देखा है?

एक मनमोहन सिंह की दिल्ली,
एक आम आदमी की दिल्ली,
एक में विजली पानी नहीं जाते,
एक में विजली पानी नहीं आते,
एक साफ हैं दूसरी गन्दी,
एक हरी भरी है दूसरी बंजर,
एक मैं ट्रेफिक न के बराबर है,
दूसरी में हमेशा जाम लगे रहते हैं,
एक में खतरे की बातें होती हैं,
दूसरी में खतरा ही खतरा है.
दोनों कितनी अलग हैं?
आप किस दिल्ली में रहते हैं?

गर्मियाँ आईं विजली चली गई,
जितनी आती थी अब उतनी भी नहीं,
विजली नहीं तो पानी भी नहीं,
इन्वर्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं,
क्या करें कुछ समझ नहीं आता,
आप के पास हैं कोई समाधान?

दिल्ली में एक नया आतंक फ़ैल गया है,
बी आर टी ने जनता की नींद उड़ा दी है,
तुगलकी सरकार पूरी तरह फेल हो गई है,
पहले तो सारा क्रेडिट ख़ुद ले रही थी,
अब अधिकारियों पर दोष लगा रही है.

लोगों ने ट्रेफिक जाम लगाया,
लोगों ने ट्रेफिक जाम हटाया,
पुलिस चेक पोस्ट पर बैठी रही,
गाड़ियों को रोकती रही,
जेब गरम करती रही.
सरकार कहाँ है, पता नहीं.

महंगाई ने लोगो की कमर तोड़ दी,
पर रोज विज्ञापन छपते हैं अखबारों में,
विज्ञापनों में छपते हैं फोटो,
मनमोहन सिंह के, सोनिया के,
शीला के, उनके मंत्रियों के,
जनता के पैसे से, जनता के दिल पर,
करती है वार, यह सरकार,
इन विज्ञापनों से.

Wednesday 23 April 2008

सड़कों पर दौड़ते दानव

कभी आप दिल्ली से यू पी में मुरादाबाद तक गए हों तब आप ने इन दानवों को सड़कों पर दौड़ते देखा होगा I वहाँ की स्थानीय भाषा में इन्हें 'जुगाड़ू' कहा जाता है I अच्छा जुगाड़ किया है लोगों ने I चार पहिये, लकड़ी-लोहे का ढांचा, पुराना डीजल इंजन, स्टीयरिंग व्हील और कुछ मोटरगाड़ियों में काम आने वाले कल-पुर्जे, जुगाड़ू तैयार, दौड़ाइए सड़कों पर.














न तो फेक्टरी चाहिए, न मेंयुफेक्चारिंग लाइसेंस, न किसी रजिस्ट्रेशन की जरूरत, न कोई ड्राइविंग लाइसेंस I देश का कानून टूटता है तो टूटने दीजिये I आपको तो बस लोकल पुलिस और प्रशाशन का ख्याल करना है I भारत का कानून भारतीय संबिधान में नहीं लिखा है, वह तो लोकल पुलिस और प्रशाशन की जेब में रहता है. उनकी जेब गरम तो कानून आप के लिए नरम I पैसे दो, कानून खरीदो और अपनी जेब में डाल लो I एक चौक पर एक पुलिस वाला एक जुगाड़ू में बैठ कर एक बस का चालान कर रहा था, बस का ड्राईबर कभी अपनी बस को देखता, कभी जुगारू को और कभी पुलिस वाले को.

यह जुगाड़ू एक मल्टी-पर्पज मोटर वेहिकल है, इस में आप मॉल ढोहिये, जानबर ढोहिये, ख़ुद भी ढो जाइये. कोका कोला कम्पनी इन में कोका कोला ढोती है. मैं गंगा मेले वाले दिन ट्रेफिक जाम में फंस गया. एक भैंस एक जुगारु में सफर कर रही थी. लगभग दस तीर्थ यात्री आए और भैस से बिना पूछे जुगारु में चढ़ गए. भैंस को बुरा लगा पर क्या कर सकती थी. उसने एक ठंडी साँस ली और जुगाली करने लगी.







मैंने एक जुगारु वाले से पूछा, 'कितने में बन जाता है यह'. उसने बताया, करीब अस्सी हजार में. मैंने सोचा
लोग टाटा को बिना मतलब ही क्रेडिट दे रहे हैं सस्ती कार के लिए. टाटा अपनी कार की कीमत एक लाख रूपये बता रहे हैं. यहाँ एक मल्टी-पर्पज मोटर वेहिकल अस्सी हजार में मिल रही है.

मजे की बात यह है की लोकल पब्लिक को इस सब से कोई परेशानी नहीं है. एक-दो लोगों से बात हुई तो उन्होंने कहा की इन सब से बहुत आराम हो गया है. कही भी रुकवा लो, कहीं भी बैठ जाओ, कुछ भी सामान ले जाओ, मैंने कहा और कानून? उन्होंने कहा कानून और हंसने लगे. पुलिस इस देश का कानून है और उसे कोई ऐतज़ार नहीं है. मैंने इस बारे उस इलाके में मशहूर अखबारों को लिखा, फोटो भी भेजी, पर उन्होंने कोई नोटिस नहीं लिया. या हो सकता है उन्होंने कुछ छानबीन भी की हो, और पुलिस वालों की तरह उनकी जेब भी गरम हो गई हो.

यह एक बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है की एक आम भारतीय नागरिक के मन में अब भारतीय कानून के लिए कोई इज्ज़त नहीं रह गई है. केन्द्र / प्रदेश सरकार और कानून बनाने वाली पार्लियामेन्ट का कोई मतलब नहीं है उनके लिए. उनके लिए सरकार, कानून सब कुछ केवल लोकल पुलिस और प्रशासन है. लोग धड़ल्ले से कानून तौड़ते हैं. लोकल पुलिस और प्रशासन दूसरी और देखता है. सब खुश है, किसी को कोई परेशानी नहीं, हम जैसे कुछ चिठ्ठाकार लिखते रहते हैं.

Saturday 19 April 2008

भूल गई माँ, मुझको मुझसे नहीं मिलाया.

आज सुबह जब दर्पण में मैं ख़ुद को देख रहा था,
दर्पण बोला, 'हेलो अजनबी',
चौंक गया मैं,
जीवन की संध्या बेला में,
यह कैसा अद्भुत संबोधन?
सोचा बहुत याद न आया,
मैं हूँ कौन कहाँ से आया?
पहला परिचय हुआ पिता से,
दादा दादी, भइया बहना,
परिचय घर के बाहर निकला,
उन का नाती, उन का बेटा,
बीत गया यह सारा जीवन,
इनका उनका कहते कहते,
जीवन की संघ्या बेला में,
दर्पण ने यह प्रश्न उठाया,
क्या अपना परिचय बतलाऊँ,
कैसे आज तुम्हें समझाऊँ,
भूल गई माँ, मुझको मुझसे नहीं मिलाया.

सरबजीत की रिहाई

भारत सरकार ने फ़िर एक बार सरबजीत को माफ़ी देने के लिए पाकिस्तान सरकार से अपील की है. पाकिस्तान में अब एक नई सरकार है. सरबजीत को माफ़ी देने से पाकिस्तान की नई सरकार की भारत में और विश्व में साख बढ़ेगी कम नहीं होगी. भारत के साथ सबंध और अच्छे करने का यह एक अच्छा मौका है नई सरकार के सामने. इसे गंवाना नहीं चाहिए.

भारत की जनता हर पल ईश्वर से यही प्रार्थना कर रही है कि सरबजीत को रिहा कर दिया जाए. सरबजीत के परिवार को पाकिस्तान जाने के लिए वीसा मिल गया है. यह एक आशापूर्ण कदम है. जब सरबजीत की बेटियां, पत्नी और बहन पाकिस्तान सरकार से सीधे प्रार्थना करेंगी तब यह उम्मीद की जा सकती है कि नतीजा आशाजनक निकलेगा. चुनाव के बाद पाकिस्तान में बहुत कुछ बदल गया होगा. नए माहौल में नई पाकिस्तान सरकार को सरबजीत के हक में फ़ैसला करना अब शायद उतना मुश्किल नहीं होगा.

सरबजीत अपने परिवार से जल्दी ही मिल पायेगा. ईश्वर से यही प्रार्थना है कि यह मुलाकात आखिरी न हो. वह अपने परिवार के साथ भारत अपने घर आ सके और आगे का जीवन अपने परिवार के साथ सुख के साथ बिताये.

अशान्तिपूर्ण प्रदर्शन और भारतीय प्रजातंत्र

अशान्तिपूर्ण प्रदर्शन क्या भारतीय प्रजातंत्र की पहचान बन चुके है?

भारतीय प्रजातंत्र में आम जनता के शांतिपूर्ण आग्रह का कोई असर होना बहुत पहले ही समाप्त हो चुका है. पर क्या अब महान और अत्यन्त शक्तिशाली राजनीतिबाजों को भी अपनी बात में असर लाने के लिए अशान्तिपूर्ण आग्रह ही करना होगा. राहुल गाँधी ने अपनी बात कहने के लिए अशान्तिपूर्ण आग्रह का सहारा लिया. वह अपने साथ लगभग १५० लोगों की भीढ़ लेकर झाँसी के डिप्टी कमिश्नर के घर में घुस गए और दो घंटे तक किसी को कोई काम नहीं करने दिया. यह आक्रामक तरीका उन्होंने क्यों अपनाया यह वह और उनकी पार्टी बेहतर जानते हैं, पर मेरी राय में उन्होंने अपनी बात कहने के लिए एक आदर्श स्थापित करने का मौका गवां दिया. यह एक अत्यन्त निराशाजनक बात है. एक व्यक्ति जिसे भारत के प्रधानमंत्री के रूप में विज्ञापित किया जा रहा है उस का इस तरह उत्तेजित भीढ़ को लेकर एक सरकारी अधिकारी के घर में जबरन घुस जाना एक शर्म की बात है.

कुछ कहूं में आप से राहुल जी? में एक वरिष्ट नागरिक हूँ. पंडित नेहरू से मनमोहन सिंह तक बहुत से प्रधानमंत्री देखे हैं मेने. भाई आप नए नेता बन रहे है, कुछ तो नई बात कीजिये. इस गुंडई राजनीति में कुछ तो शालीनता लाइए. आप के परिवार को हमेशा महान होने की संज्ञा दी जाती है, कुछ तो महानता दिखाइए. आप को इस तरह की हरकतें करना शोभा नहीं देता. जो लोग आप के कार्यक्रम निधारित करते हैं और उन का रूप तय करते हैं, उन को समझाइए. उनसे कहिये की आप अपनी बात पूरी शालीनता से कहेंगे. आप के सामने अभी पूरी जिन्दगी पड़ी है. प्रधानमंत्री की कुर्सी कहीं भागी नहीं जा रही.

यदि आपने अपनी कार्य प्रणाली नहीं बदली तो वह दिन दूर नहीं जब आप का आग्रह हिंसापूर्ण हो जायेगा और न जाने कितने जान माल का नुकसान होगा. आपका कोई प्रदर्शन सफल रहा या असफल रहा यह अगर इसी बात से जाना जाता है कि प्रदर्शन के दौरान कितनी हिंसा हुई, कितने ज्यादा जान माल का नुकसान हुआ तो फ़िर आप में और सड़कछाप राजनीतिबाजों में क्या फर्क रहेगा.

Thursday 17 April 2008

प्रजातंत्र के अवांछित चेहरे

देश के बाहर प्रेसिडेंट प्रतिभा पाटिल ने लगभग खाली ब्राजील सेनेट को संबोधित किया. देश के अन्दर महंगाई पर हुई चर्चा में दोनों लोक सभा और राज्य सभा लगभग खाली रहीं. उधर ब्राजील सरकार और भारतीय दूतावास के अधिकारी सफाई देने की कोशिश कर रहे हैं. इधर भारत की जनता के प्रतिनिधि जनता को शर्मिंदा कर सीना ताने घूम रहे हैं. उधर पाटिल लातिन अमेरिकन देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए १२ दिन की यात्रा पर हैं. इधर महंगाई से परेशान जनता इस उम्मीद में है कि सरकार कुछ करेगी पर जिन लोगों को उसने लोक सभा में भेजा है वह तो जनता को सिर्फ़ शर्मिंदा ही कर पा रहे हैं.

पुलिस जनता के जान और माल की रक्षा के लिए है. दिल्ली पुलिस न तो जान की रक्षा कर पा रही है और न ही माल की. आम जनता को ख़ुद पुलिस से डर लगता है. निरीह नागरिकों पर पुलिस के अत्याचार के किस्से रोज अखबारों में छपते हैं. यह समझ ही नहीं आता की पुलिस का यह महकमा बनाया क्यों गया है. रोज पुलिस को नए अधिकार दिए जाते हैं ताकि पुलिस और मुस्तेदी से आम जनता पर अत्याचार कर सके. कोई पुलिसवाला आदि किसी जेबकतरे को पकड़ लेता है तो पुलिस कमिश्नर उसे ईनाम देता है. अगर पुलिस की लापरवाही से किसी नागरिक की जान चली जाती है तो उसे कुछ नहीं कहा जाता. आज के अखबार में एक ख़बर छपी है, अगर कोई नागरिक पुलिसवाले से बहस करेगा तो उस पर तगड़ा जुर्माना किया जाएगा. आखिरकार भारत की पुलिस किसी वी आई पी से कम तो नहीं है.

सरकार रेल चलाती है. सरकार विजली और पानी बेचती है, शहर की साफ सफ़ाई की जिम्मेदारी सरकार की है. पुलिस की बात तो हम ऊपर कर ही चुके हैं. इन और अनेक सरकारी महकमों से जनता संतुष्ट नहीं है. पर कोई कुछ न कह सकता है, न कुछ कर सकता है. सरकार जैसे मर्जी काम करेगी, जब मन चाहेगा सरकार कीमतें बढ़ा देगी और निरीह जनता को यह अन्याय स्वीकार करना होगा. नागरिक पानी मानेंगे तो सरकार लाठी चलवा देगी. विजली मानेंगे तो गोली चलवा देगी. आम आदमी की सरकार का हर काम आम आदमी के ख़िलाफ़ है. फ़िर भी भारत एक मजबूत प्रजातंत्र है. बैसे एक तरह से देखा जाए तो यह सही है - प्रजा के ख़िलाफ़ तंत्र बाकई बहुत मजबूत है.

और भी बहुत से अवांछित चेहरे होंगे प्रजातंत्र के. कुछ आप भी तो दिखाइए.

मक्खनी सतह पर दलित नेता

वह नेता हैं दलितों के,
जब से नेता बने संघर्षरत हैं,
दलितों के उत्थान के लिए,
ऊंची जाति, नीची जाति,
नीची जाति में ऊंची-नीची जाति,
हर दलित बन गया एक अलग जाति,
यह महान योगदान है उनका,
भारतीय समाज को, राष्ट्र को.

वह ख़ुद भी दलित हैं,
शुरुआत उन्होंने ख़ुद से की,
खूब उत्थान किया अपना,
अब भी कर रहे हैं, करते रहेंगे,
'मक्खनी सतह' का नाम मिला उन्हें,
मक्खन खाया और चिल्लाया,
दलितों को यह दो, दलितों को वह दो,
पर अपनी जेब से उन्होंने,
किसी दलित को कुछ नहीं दिया.

एक ऐसे दलित नेता भी हैं,
जिन्होनें दलितों से ही उपहार लेकर,
अपनी तिजौरी मैं भर लिया,
जिस दलित के सर पर छत नहीं,
उस ने नेताजी को महल उपहार में दिया,
वाह रे भारत के दलित,
और वाह रे दलितों के नेता.

क्या उन्हें दिखाई नहीं देता या .....

आज के अखबार मैं मुख्य प्रष्ठ पर न्यूज डाईज़ेसट मैं सात ख़बरों का सारांश है. इन सातों में से पाँच खबरें लूट-मार से संबंधित हैं. अखबार के अन्दर भी लूट-मार वाली और बहुत सी खबरें हैं. पूरे अखबार मैं तलाश करने पर भी कोई ऐसी ख़बर नहीं मिली जिसमें किसी अच्छी घटना का जिक्र हो. क्या अखबारवालों को अच्छी घटनाएं दिखाई नहीं देती या अच्छी घटनाएं घट्नी बंद हो गई हैं?

हम समाज में रहते हैं और समाज में अच्छा बुरा सब घटता है. हमारे आसपास ही अक्सर कुछ अच्छा घट जाया करता है. जो अच्छा हमें दिखाई देता है वह अखबारवालों को भी दिखाई देता होगा. तब वह उसे छापते क्यों नहीं? क्या अच्छी घटनाओं की कोई न्यूज वेल्यू नहीं है? क्या अखबार सिर्फ़ न्यूज वेल्यू के लिए हैं? या जनता अच्छी ख़बरों के बारे में जानना नहीं चाहती. यह जो कुछ भी हो रहा है वह अच्छा नहीं हो रहा है. बचपन में हमें सिखाया गया था की साहित्य समाज का दर्पण होता है. पर अब पता चला की इस दर्पण में केवल लूट-मार की घटनाएं ही दिखाई देती हैं.

मीडिया प्रजातंत्र का एक शक्तिशाली अंग है. अगर मीडिया कमजोर होगा या वह समाज के नकारात्मक रूप को ही दिखायेगा तब इस से समाज और जनता का नुकसान ही होगा.

Wednesday 16 April 2008

स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो

यह पंक्ति आर्य समाज हवन के बाद यज्ञ देव की आरती मैं से ली गई है. आज के समाज मैं जहाँ निजी स्वार्थ ने प्रेम का गला घोंट दिया है, यह पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण हो गई है. मनुष्य स्वभाव से थोड़ा बहुत स्वार्थी होता है. पर उसे निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरों का नुकसान नहीं करना चाहिए. निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए लोग कुछ भी ग़लत काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं. स्वार्थ पूरा न होने पर उनके मन मैं विरोधावास पैदा होता है. वह दूसरों को उस के लिए जिम्मेदार ठहराने लगते हैं. मन में बढ़ती नफरत हिंसा को जन्म देती है. आज भारतीय समाज इस हिंसा से टूट रहा है. भाई भाई का, बेटा बाप का, पड़ोसी पड़ोसी का, मित्र मित्र का, पति पत्नी का शत्रु बन गए हैं.

स्वार्थ अपने आप में बुरा नहीं हटा. स्वार्थ वही बुरा होता है जिससे किसी दूसरे का बुरा होता हो. अपना स्वार्थ पूरा हो जाने पर यदि मनुष्य उस का लाभ दूसरों को भी मिल जाने देता है तब वह स्वार्थ एक पुन्य बन जाता है. उदाहरण के तौर पर हम राजा भागीरथ का नाम ले सकते हैं. राजा भागीरथ ने गंगा जी को प्रथ्वी पर लाने के लिए कठिन तपस्या की. इसमें उनका अपना निजी स्वार्थ था - उन के पूर्वजों की मुक्ति. जब उन की स्वार्थसिद्धि हो गई और गंगा जी वापस स्वर्ग को जाने लगीं तब उन्होंने राजा से कहा - राजन मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ. जो चाहो वर मांग लो. राजा भागीरथ ने कहा - माँ आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की. ऐसी ही कृपा आप सब प्राणियों पर करती रहो. माँ ने कहा इस के लिए तो मुझे प्रथ्वी पर ही रुकना होगा. आज भी गंगा जी प्रथ्वी पर निवास करती हैं और करोड़ों लोगों पर कृपा करती हैं. आज भी राजा भागीरथ इस महान कार्य के लिय याद किए जाते हैं. कोई उनकी निजी स्वार्थसिद्धि की बात नहीं करता.

इस पंक्ति में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं की वह हमारे निजी और संकुचित स्वार्थ भाव को मिटाकर उसे दूसरों के लिए कल्याणकारी बनाएं. जब हम दूसरों के कल्याण के लिए सोचेंगे या कार्य करेंगे तब हमारा प्रेम और गहरा और विस्तृत होता जाएगा. समाज मैं सब प्रेम से मिल कर रहेंगे. हिंसा समाप्त हो जायेगी. स्वर्ग प्रथ्वी पर उतर आएगा. आइये प्रभु से प्रार्थना करें - स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो.

क्या वह यह भी नहीं जानते?

उन्होंने पूंछा,
क्या रामसेतु पूजा की जगह है?
मेरे मन मैं सवाल उठा,
क्या वह यह भी नहीं जानते?
राम से ज़ुड़ी हर जगह,
पूजा की जगह है.

क्या वह यह भी नहीं जानते?
राम से बड़ा है,
राम का नाम,
जिसे उल्टा जप कर,
बाल्मीकि हो गए थे राम.
क्या वह यह भी नहीं जानते?
बंदर और भालुओं ने,
बना दिया पुल समुन्द्र पर,
लिख कर पत्थरों पर राम का नाम,
उतर गए सब सागर पार,
करते जय जय जय श्री राम.

क्या वह यह भी नहीं जानते?
राम की अपनी एक मर्यादा है,
ऐसे सवाल उठा कर,
वह भंग करते हैं उनकी मर्यादा,
इस धर्म निरपेक्ष समाज में,
एक राम ही हैं धर्म निरपेक्ष,
क्या वह यह भी नहीं जानते?
Image:Adams Bridge aerial.jpg

चमचागिरी की भर्त्सना या लगे रहो मुन्ना (अर्जुन) भाई

राहुल गाँधी को प्रधान मंत्री बनाने के अर्जुन सिंह के सुझाब को कांग्रेस आलाकमान ने चमचागिरी कहकर उस की भर्त्सना की है. यह भी कहा गया है कि ऊपर कोई जगह खाली नहीं है. जो कुछ हुआ और कहा गया वह कुछ अजीब लगता है. कांग्रेस हमेशा से चमचों की पार्टी रही है. मनमोहन जी की मंत्री परिषद् में ऐसे अनेक निकम्मे चेहरे हैं जो केवल परिवार की चमचागिरी के कारण वहाँ हैं. काबलियत यदि देखी जाती तो अब तक वह चेहरे भूतकाल का हिस्सा बन चुके होते. राष्ट्रपति चुनाव में भी इस चमचागिरी का ही बोलबाला रहा. राजनीति का धंधा करने वालों के एक नहीं अनेक चेहरे हैं. किस चेहरे से वह क्या कहते हैं इस का अनुमान लगाना अब मुश्किल नहीं रहा.

सीधी सी बात है. सब कुछ परिवार की छबि चमकाने के लिए हो रहा है. प्रियंका जेल मैं अपने पिता की कातिल से मिलने जाती हैं. कितनी महान हैं वह! मनमोहन जी राहुल से मंत्री बनने के लिए विनम्र प्रार्थना करते हैं और जबाब उनकी माता जी देती हैं. राहुल जी कितने महान हैं! मायावती के चलाये सारे तीर एक ही बार में बेकार कर दिए गए. अर्जुन की भर्त्सना के तीर ने आगे के लिए एक ब्रह्माश्त्र की रचना कर दी. महान परिवार और ज्यादा महान हो गया.

अगले चुनाव में कांग्रेस यदि जीती तब कोई भी प्रधान मंत्री बने, अर्जुन का मंत्री पद पक्का हो गया है. लगे रहो मुन्ना (अर्जुन) भाई. अब ऐसी चमचागिरी के प्रदर्शन और भी होंगें. देखते जाइये.

Monday 14 April 2008

मनमोहन ने पीठ ठोंकी शीला की

कुछ दिन पहले एक उद्घाटन समारोह में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित की पीठ खूब थपथपाई. उनके अनुसार दिल्ली भारत का सब से साफ-सुथरा, हरा-भरा और अति सुंदर शहर है. इसके लिए उन्होंने धन्यवाद किया शीला दीक्षित का क्योंकि शीला जी ने ऐसा दिल्ली शहर उन्हें रहने के लिए दिया है. मैंने यह ख़बर पढ़ी तो पहले लगा कि यह कोई चुटकुला है. फ़िर सोचा प्रधान मंत्री कभी कभी ऐसी बातें करते तो हैं पर एक सार्वजनिक समारोह मैं एक चुटकुला तो नहीं सुनायेंगे. फ़िर सोचा सही तो है. प्रधान मंत्री जिस दिल्ली में रहते हैं वह तो वास्तव में साफ-सुथरा, हरा-भरा और अति सुंदर शहर है. वह कभी मेरी दिल्ली में तो आए नहीं.

फ़िर सोचा कि हो सकता है पिछले कुछ घंटों में मेरी दिल्ली भी शीला जी की मेहरबानी से हरी-भरी, साफ-सुथरी और अति सुंदर हो गई हो. तुरंत मैं घर से बाहर निकला और मेन रोड पर पहुँचा. कुछ नया नजर नहीं आया. जो है वह आप भी देखिये.






























लेकिन यह तो वास्तव में एक चुटकुला ही हो गया. दिल्ली की मुख्य मंत्री और भारत के प्रधान मंत्री उस दिल्ली को जानते ही नहीं जहाँ मेरे जैसे आम आदमी रहते हैं, और इन की सरकार यह कहती है की वह आम आदमी की सरकार है.

Sunday 13 April 2008

नकारात्मक मानसिकता

'हिन्दू' शब्द से संबंधित किसी भी विचारधारा की खिलाफत करना एक फैशन हो गया है. अपने आप को महान साबित करने का यह एक आसान तरीका बन गया है. मुसलमान और इसाईओं द्वारा हिन्दू धर्म को बुरा भला कहना उन के धर्म का एक हिस्सा मान कर उन की तारीफ़ की जाती है. जब हिन्दू धर्म के लोग ही हिन्दू धर्म पर आघात करते हैं तब उन्हें तरक्कीशुदा कहा जाता है. किसी ने अगर हिन्दी भाषा और हिन्दू राष्ट्र की बात कर दी तब तो भारत, भारत का संबिधान, भारत की छबि सब खतरे मैं पड़ जाती हैं. सब चिल्लाने लगते हैं. यहाँ तक की सीमापार वफादारी रखने वाले भी राष्ट्रिय अस्मिता की बात करने लगते हैं.

मेरे विचार में यह नकारात्मक मानसिकता का एक रूप है. हिन्दू होना कोई अपराध नहीं है. हिन्दू को राष्ट्रवादी होना कोई अपराध नहीं है. बल्कि राष्ट्रवादी न होना एक अपराध है. दूसरी बात यह है कि कोई राष्ट्र हिन्दू या मुसलमान या सिख या इसाई नहीं होता. यदि कोई हिन्दू राष्ट्र की बात करता है तो उसे हिन्दू राष्ट्रवाद का नाम देना ग़लत है. ऐसा ज्यादातर वह लोग करते हैं जिनकी वफादारी सिर्फ़ सत्ता से है और जो सत्ता के लिए कुछ भी ग़लत कर सकते हैं या वह लोग जिन की वफादारी सीमापार से ज़ुड़ी है. यह भारत का दुर्भाग्य है कि आज ऐसे लोग ही सत्ता में हैं. राष्ट्रवादियों का अपमान करना राष्ट्र का अपमान करना है. यह ऐसा अपराध है जिसे माँ भारती कभी माफ़ नहीं करेगी.

भारत के निर्माण के लिए इस नकारात्मक मानसिकता को बदलना होगा.

Saturday 12 April 2008

सत्ता का नशा

कीमतें आसमान छू रही हैं,
कमर तोड़ दी है महंगाई ने,
पार्टी हाई कमान घबरा गई है,
विरोधी पक्ष खूंखार हो रहा है,
पर जब उनसे पूंछा गया,
तो नमक छिड़क दिया उन्होंने जख्मों पर,
तरक्की करती अर्थव्यवस्था मैं,
कीमतें तो बढ़ेंगी ही,
और कोई खास तो नहीं बढ़ी हैं कीमतें,
व्यर्थ ही चिल्ला रहे हैं.

लगता है सत्ता का नशा,
सर चढ़ गया है.
कुछ दिन पहले जो तारीफ़ हुई थी,
प्रधान मंत्री के मुखारविंद से,
उसने और सर चढ़ा दिया लगता है,
प्याज पर बदल गई थी सरकार,
यहाँ तो हर चीज पहुँच के बाहर हो गई है,
आम जनता का आक्रोश,
और उन का घमंड,
देखें कौन जीतता है?

भारतीय संविधान और संवेधानिक संस्थाए

भारतीय संविधान मैं जितनी संवेधानिक संस्थाएं हैं उनमें सबसे अधिक अधिकार विधायिका को दिए गए हैं. यह एक बिडम्बना ही है की इस संस्था के सदस्यों के लिए कोई भी शेक्षणिक, चारित्रिक, व्यावहारिक योग्यता का प्रावधान नहीं किया गया. अन्य सभी संस्थाओं के लिए योग्यता की लम्बी लिस्ट बनाईं गई है. इस का कारण शायद यह है कि संविधान की रचना ख़ुद विधायिका ने की. 'अँधा बांटे रेबड़ी अपने अपनों को दे' कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो गई है यहाँ.

केवल एक अनपढ़ ही नहीं, एक अपराधी भी विधायिका का सदस्य बन सकता है. जो स्वयम कानून का सम्मान नहीं करता वह विधायिका का सदस्य बन कर कानून बनाने का अधिकारी हो जाता है. जो आज जेल मैं है वह कल छूटकर मंत्री बन सकता है. जिस कानून को समझने के लिए कई डिग्रियाँ लेनी पड़ती हैं उसे बनाने का अधिकार जिन्हें दिया गया है उन में अंगूठा-टेक भी हो सकते हैं. विधायिका का सदस्य बनते ही आज का अपराधी कल का मान्यवर हो जाता है. कल तक पुलिस जिसकी पिटाई करती थी आज उस के विधायिका का सदस्य बन जाने पर उसे सुरक्षा प्रदान करती है. आज तक जो बस मैं सफर करता था, विधायिका का सदस्य बनते ही कई कारों का मालिक बन जाता है. उसके चारों और पैसा ही पैसा नज़र आता है. मतलब यह कि विधायिका का सदस्य बनते ही व्यक्ति अपने आप मैं एक महान शक्तिशाली शासक बन जाता है, जिसे कोई छू भी नहीं सकता. पर जो किसी को भी कुछ भी कह या कर सकता है. जिस जनता के वोट से उसे यह अधिकार मिलते हैं उस जनता का वह राजा बन जाता है और उस पर निष्कंटक शासन करता है.

विधायिका और दूसरी संवेधानिक संस्थायों के बीच मैं जो खींचतान चल रही है वह अत्यन्त शर्मनाक है. क्या भारतीय संविधान एक अभिशाप बन गया है? क्या इन समस्याओं का कोई निदान नहीं है? चुनाव आयोग और न्यायपालिका कोशिश कर के भी इन पर लगाम नहीं लगा पा रही हैं. बल्कि उन पर ही चोट की जा रही है. भारतीय संविधान ने वोट की ताकत पर जो यह शक्तिशाली और निष्कंटक विधायिका बनाई है वह कहीं भारतीय प्रजातंत्र का ही गला न घोट दे, अब यह डर भी लगने लगा है.

जाति ईश्वर का विधान नहीं है

भारतीय समाज में जति हमेशा से चर्चा का विषय रही है और आगे भी रहेगी. जति क्या है और सामाजिक जीवन मैं उसका क्या महत्त्व है? मैं हमेशा से यह विश्वास करता हूँ कि जाति एक सामाजिक व्यवस्था है, उस का किसी धर्म या परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं है. मनुष्य एक परिवार मैं जन्म लेता है. उस परिवार का एक धर्म होता है. यह धर्म उस मनुष्य की पहचान होती है. यह धर्म उस के साथ इस संसार मैं आता है और उस के साथ इस संसार से जाता है. मनुष्य की और जितनी पहचान हैं वह सब इस संसार मैं आकर उस के साथ जुड़ती हैं. जाति भी मनुष्य की एक ऐसी पहचान है जो ईश्वर ने उसे नहीं दी पर समाज ने उस के साथ जोड़ दी.

जाति मनुष्य के कर्म की और इंगित करती है. उसे जन्म से जोड़ना ग़लत है. हम जाति शब्द की जगह कोई और शब्द भी प्रयोग कर सकते हैं. जाति के नाम पर जो ग़लत बातें हो रही हैं उन के लिए धर्म को दोषी ठहराना ग़लत है. धर्म का जाति से कुछ लेना देना नहीं है. जातिगत व्यवस्था मैं कोई बुराई नहीं है. बुराई है जाति को आधार बनाकर दूसरों से अपने को ऊंचा साबित करना. जाति को धर्म से जोड़ कर समाज को वर्गों मैं विभाजित करना, उन वर्गों को आपस मैं लड़वाना और इस सब को ईश्वर का विधान बताना, यह ग़लत है.

जाति को लोगों ने पहले भी अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए प्रयोग किया है और आज भी कर रहें हैं. समस्या वहीं की वहीं है, सिर्फ़ लोगों के रोल बदल गए हैं. पहले तथाकथित ऊंची जाति वाले जाति के बीच मैं धर्म और भगवान् को लाकर अपनी स्वार्थसिद्धि करते थे, और अब तथाकथित नीची जाति वाले आरक्षण के आधार पर अपनी स्वार्थसिद्धि कर रहे हैं. रोज नए वर्ग बन रहें हैं. आरक्षण पा सकें इस के लिए आन्दोलन हो रहे हैं. दलित राष्ट्रपति बन कर भी दलित ही रहता है. जो पहले जाति को जन्म से ज़ोड़ने के ख़िलाफ़ थे अब वही लोग जाति से जन्म को जोड़ रहे हैं. और जो लोग जाति से जन्म को जोड़ते रहे हैं वह अब जाति से जन्म को जोड़ने के ख़िलाफ़ हैं. इसलिए किस को दोष दिया जाए?

जितने बिता प्रेम में पाए उतने क्षंण हो गए अमर हैं

जितनी उस की व्यथा मौन है,
उतना मेरा प्रेम मुखर है.

प्रथम प्रेम की मीठी यादें,
अब तक भूल नहीं पाया मैं,
ऐसा क्या हो गया बीच में,
कि हो गया पराया अब मैं,
जितना दूर गई वह मुझसे,
उतना मन खींच रहा उधर है.

कैसे मैं विश्वास दिलाऊं,
प्रेम बांटने से बढ़ता है,
मन का मौन मुखर हो उठता,
दर्द बताने से घटता है,
जितना आप छुपाया अन्दर,
उतना खोया जो बाहर है.

जीवन एक अनबूझ पहेली,
बूझ बूझ कर हार गए सब,
मृत्यु खड़ी हो जाए आ कर,
द्वार किसी के न जाने कब?
जितने बिता प्रेम में पाए,
उतने क्षंण हो गए अमर हैं.

Friday 11 April 2008

ग़लत रास्ते पर एक और कदम

आज ख़बर पढ़ी अखबार मैं,
ओबीसी २७ प्रतिशत,
कोटे के हक़दार बनेंगे,
ऊंचे शिक्षा संस्थानों में,
वह प्रवेश अब पा जायेंगे,
योग्यता के मापदंड,
उन पर लागू नहीं हो पाएंगे.

ग़लत रास्ते पर एक और कदम,
आगे बढ़ गए हम,
कब मानेंगे अपनी गलती,
और रुकेंगे आगे बढ़ना,
वापस आकर फ़िर सोचेंगे,
और खोजेंगे नया रास्ता.

वोटों की राजनीति खेलना,
नए नए वर्गों मैं बाँट कर,
जनता मैं नफरत फैलाना,
जाति का चक्रव्यूह बना कर,
आरक्षण का वाण चलाकर,
जनता को अन्दर ले जा कर.
अभिमन्यु सा मार गिराना,
वोट बना कर इंसानों को,
मत पेटी मैं बंद कराना,
पिछले छह दशकों मैं हमनें,
मात्र यही सीखा है भाई.