दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Saturday, 12 April, 2008

जितने बिता प्रेम में पाए उतने क्षंण हो गए अमर हैं

जितनी उस की व्यथा मौन है,
उतना मेरा प्रेम मुखर है.

प्रथम प्रेम की मीठी यादें,
अब तक भूल नहीं पाया मैं,
ऐसा क्या हो गया बीच में,
कि हो गया पराया अब मैं,
जितना दूर गई वह मुझसे,
उतना मन खींच रहा उधर है.

कैसे मैं विश्वास दिलाऊं,
प्रेम बांटने से बढ़ता है,
मन का मौन मुखर हो उठता,
दर्द बताने से घटता है,
जितना आप छुपाया अन्दर,
उतना खोया जो बाहर है.

जीवन एक अनबूझ पहेली,
बूझ बूझ कर हार गए सब,
मृत्यु खड़ी हो जाए आ कर,
द्वार किसी के न जाने कब?
जितने बिता प्रेम में पाए,
उतने क्षंण हो गए अमर हैं.

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