दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Saturday 3 May 2008

अढ़तीस साल पहले का वह प्यार भरा दिन

समय कितनी जल्दी गुजर जाता है. प्यार में तो और भी जल्दी गुजर जाता है. लगता है कल ही की तो बात है. विवाह के पवित्र बन्धन में बंधे थे हम. अपने आप में नारी और पुरूष दोनों अपूर्ण होते हैं. विवाह के माध्यम से दोनों मिलते हैं और एक पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण होता है. जितना प्यार उतनी पूर्णता. मिलन जितना पगता गया प्यार उतना ही प्रगाढ़ होता गया. जीवन के अभाव मिल कर झेले और सुविधाओं का मिल कर उपभोग किया. कोई शिकायत नहीं बस प्यार ही प्यार. नौकरी में थे इस लिए संयुक्त परिवार से अलग रहे पर जड़ें वहीं जमी रही. आज बच्चों के साथ मिल कर हवन किया और ईश्वर से प्रार्थना की कि जो कृपा हम पर अब तक बनी रही है, आगे भी बनी रहे. इतने वर्षों बाद आज मन हो आया कुछ लिखने का.

नारी और पुरूष का पहला कर्तव्य है स्रष्टि चक्र को आगे बढ़ाना. ईश्वर की कृपा से हम ने यह कर्तव्य पूरा किया. दो पुत्र दिए हम ने समाज को. पुत्री की कमी हमेशा महसूस हुई. दोनों पुत्रों के विवाह से वह कमी भी पूरी हो गई. दो पुत्रियां आ गई घर में. फ़िर आईं दो पोतियाँ. मन और घर का हर कोना भर गया. हमारा अपना संयुक्त परिवार है. परस्पर प्यार, सम्मान और मिल जुल कर रहने की भावना यही हमारा धन है. समाज को जो दे सकते थे दिया, और जो दे सकते हैं देते रहेंगे.

आज समाज में जो नफरत और हिंसा फ़ैल रही है उस से मन दुखता है. संयुक्त परिवारों को टूटते देख मन में कसक होती है. इंसान का जरा सी बात पर हिंसक हो उठना और दूसरों के जान-माल की हानि कर देना, अक्सर मन में डर पैदा करता है. मंदिरों में भीढ़ बढ़ रही है पर इंसान ईश्वर से दूर जा रहा है. हमारी पीढ़ी ने बहुत कुछ बहुत तेजी से बदलते देखा है. आज हवन के बाद की प्रार्थना की कुछ पंक्तियाँ हिम्मत बंधा गईं.

स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो,

भावना मिट जाए मन से पाप अत्याचार की,

वायु जल सर्वत्र हों शुभ गंध को धारण किए.

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