दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Friday 31 October 2008

आसाम में जो निर्दोष मारे गए उन्हें अश्रुपूर्ण श्रधांजलि

आज सुबह अखबार में पढ़ा कि गुवाहाटी में इंसानियत के दुश्मनों ने बम धमाके किए, जिन में ६६ निर्दोष नागरिक मारे गए. मन दुखी हो गया. आइये उन की आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें. 

Thursday 30 October 2008

भाई दूज मनाइए कम्पूटर पर

पहले तो आप सब को भाई दूज पर शुभकामनाएं. 
फ़िर देखिये एक विडियो. 

फ़िर देखिये एक फिल्मी गीत


Wednesday 29 October 2008

एक आंसू बहाओ उन के लिए

आज हमारे देश में हर तरफ़ गरीबी और बीमारी दिखाई देती है, पर हम अपना अधिकाँश समय और सामर्थ्य आपस में लड़ने में व्यर्थ गवां देते हैं. क्या कभी हमने अपने गरीब और बीमार देशवासियों दर्द महसूस किया है? क्या कभी  हमने उनके लिए एक आंसू बहाया है? 

स्वामी विवेकानंद ने कहा था 

"क्या तुम तैयार हो अपनी मात्रभूमि के लिए हर बलिदान करने को? अगर हाँ, तब तुम इस देश को गरीबी और बीमारी से मुक्ति दिला सकते हो. क्या तुम जानते हो कि हमारे करोड़ों देशवासी भूखे और बीमार हैं? क्या तुम उन का दर्द महसूस  करते हो? क्या कभी तुम उन के लिए एक आंसू बहाते हो?" 


On the photo, Vivekananda has written in Bengali, and in English: 
“One infinite pure and holy—beyond thought beyond qualities I bow down to thee” - Swami Vivekananda

Monday 27 October 2008

प्रकाश का त्यौहार दीवाली मंगलमय हो आपके लिए

दो विडियो पेश कर रहा हूँ आपके लिए. 



पटाखे चलाइये,
अपने अन्दर सोये इंसान को जगाने के लिए,
दिए जलाइये,
अपने अन्दर गहराते अन्धकार को मिटाने के लिए.



प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से. 

आप सबको दीवाली की शुभकामनाएं. 

क्या आमिर अली आतंकवादी है?

मीडिया ने उसे आतंकवादी कहा. उसे 'मानव बम' नाम दिया. लेकिन यह सब हुआ इसलिए कि मीडिया के पास पूरी जानकारी नहीं थी, और न ही मीडिया ने कोई जानकारी इकठ्ठा करने की कोशिश की. बस तुंरत आमिर पर अपना फ़ैसला सुना दिया. 
 
आमिर एक डाक्टर था, लन्दन में रहता था, अपने परिवार से मिलने भारत आता है. एअरपोर्ट पर एक मवाली दिखने वाला एक अफसर उसके सामान की चार बार तलाशी लेता है और कुछ न मिलने पर बहुत निराश होता है. आमिर उस से पूछता है कि अगर उस का नाम अमर होता तो क्या वह इतनी बार उस की भी तलाशी लेता? मवाली अफसर और मवाली नजर आने लगता है.

आमिर एअरपोर्ट से बाहर आता है. फ़िर उसके साथ शुरू होता एक दिल देहला देने वाला चक्कर - कैसे शिक्षित मुसलमान आतंकवादी बनाए जाते हैं? कौम के नाम पर उसे आतंकवादी बनने पर मजबूर किया जाता है. उस के परिवार का अपहरण कर लिया गया है, उसे धमकी दी जाती है कि अगर उस ने उनके कहने के अनुसार काम नहीं किया तो उन्हें मार डाला जायेगा. मां के दिल का सकून, तीन बहनों और एक भाई का प्यारा भाई, आमिर मजबूर हो जाता है उन की बात मानने को. 

उसे एक सूटकेस किसी को पहुंचाने का काम सौंपा जाता है. बस में बैठ जाने पर उसे पता चलता है कि सूटकेस मैं बम है. उसे बताया जाता है कि पाँच मिनट में बम फट जायेगा, इस लिए वह तुंरत बस से उतर जाय. वह बस से उतर जाता है, पर बस में से एक बच्चा उसे देख कर मुस्कुराता है और हाथ हिलाता है. आमिर फ़िर बस में चढ़ जाता है, सूटकेस उठाता है और बस से उतर कर खुली जगह की तरफ़ भागता है. उधर कुछ मजदूर सड़क पर गड्ढा खोद रहे हैं. वह चिल्लाता है, 'सूटकेस में बम है, जल्दी से भाग जाओ'. सब दूर भाग जाते हैं. आमिर के हाथों में सूटकेस है, जिसमें बम है, बम फटता है, आमिर मर जाता है. 

मीडिया को बस इतना मालूम था. उन्होंने उसे मानव बम कहा. यह भी कहा कि वह बम लेकर बस से उतर गया और खाली जगह की तरफ़ भागा,पर इसका कारण उन के अनुसार यह था कि आमिर आखिरी वक्त पर डर गया. अगर बम बस में फट जाता तो सैकड़ों लोग मारे जाते. आमिर ने अपनी जान दे दी पर आतंकवादियों की नापाक साजिश को कामयाब नहीं होने दिया. उसने अपनी जान दे कर सैकड़ों लोगों की जान बच ली. 

क्या आप आमिर को आतंकवादी कहेंगे? मैं तो नहीं कहूँगा. आमिर मेरा हीरो है. मैं उसे सलाम करता हूँ. ऐसे बहुत से आमिर होंगे इस देश में, जिन्हें आतंकवादी बनाने की कोशिशें की जा रही हैं. बहुत से बन भी गए होंगे. पर यह आमिर नहीं बना. आज देश को ऐसे आमिरों की जरूरत है. 

नोट - आप सोच रहे होंगे कि यह क्या कहानी लिखी है मैंने. यह कहानी मैंने नहीं लिखी. मैंने इसे देखा टीवी पर. अगर आप भी देखना चाहते हैं तो उस फ़िल्म का नाम है 'आमिर'.  

Sunday 26 October 2008

अर्थव्यवस्था की अर्थी

चार अर्थशास्त्री,
जिन्हें सब कहते थे महान,
मनमोहन, चिदंबरम,
एहलुबालिया, सुब्बाराव.
सौंपी थी इनके हाथों में, 
अर्थव्यवस्था की बाग़ डोर,
इतने साल दिखाते रहे सब्ज बाग़,
अब नजर आ रहे हैं,
कन्धों पर उठाये,
अर्थव्यवस्था की अर्थी . 

Friday 24 October 2008

मेरे हिंदू भाइयों जरा ध्यान दीजिये

एक हिंदू मन, बचन, कर्म से अहिंसक होता है. मन, बचन और कर्म तीनों प्रकार की हिंसा का दंड ईश्वर देता है. मानव निर्मित कानून मन की हिंसा का कोई दंड नहीं दे पाता. कुछ हद तक बचन की हिंसा और कर्म की हिंसा का दंड देने की सामर्थ्य कानून में है. पर कानून इस सामर्थ्य का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाता. नागरिक, पुलिस, वकील और जज चारों  ईमानदार होंगे और कानून का पूरा सम्मान करेंगे तभी इस सामर्थ्य का पूरा इस्तेमाल हो पायेगा. ऐसा हो नहीं पाता और अपनी गलती का आरोप लोग कानून पर थोप देते हैं. 

ईश्वर का कानून भंग करने की सजा हर हालत में मिलती है, वहां कोई गलती नहीं होती. ईश्वर की अदालत सब से बड़ी अदालत है. कोई भी हिंसा करने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि हो सकता है मानव निर्मित कानून से बच जाएँ, पर ईश्वर के कानून से नहीं बच पायेंगे. ईश्वर की अदालत में मन, बचन और कर्म द्वारा की गई किसी भी प्रकार की हिंसा की सजा मिलेगी. कृष्ण का साथ भी यधिष्ठिर को बचन की हिंसा की सजा पाने से नहीं बचा पाया. इस लिए ईश्वर के कानून से डरिये, भले ही समाज में आपकी स्थिति आपको यहाँ के कानून से बचा ले. 

कुछ लोग ईश्वर के नाम पर हिंसा करते हैं. यह तो और भी बड़ा अपराध है, इस की तो सजा  भी बहुत भयंकर होगी. जो लोग सोचते हैं कि इस तरह की हिंसा करके वह जन्नत में मजे करेंगे, तो वह बहुत बड़ी गलफहमी में हैं. यह जीवन ईश्वर की देन है. किसी से उस का जीवन छीन लेना ईश्वर के प्रति एक घोर अपराध है. ईश्वर की अदालत में इस अपराध की कोई छमा नहीं है. आपको ऐसे बहुत हिंदू मिल जायेंगे जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते, बल्कि उसे गालियाँ भी देते हैं. ईश्वर इन्हें भी प्यार करता है. पर वह किसी भी प्रकार की हिंसा को छमा नहीं करता. रात-दिन उसकी पूजा करने वाला व्यक्ति भी अगर हिंसा करेगा तो उसे सजा मिलेगी. राजा दशरथ से गलती से हिंसा हो गई और उनके वाण से श्रवन कुमार मारा गया. बाद में ईश्वर ने उन का पुत्र बन कर जन्म लिया, पर दशरथ उस हिंसा की सजा पाने से नहीं बचे. जरा सोचिये अगर दशरथ नहीं बच पाये तब आप हिंसा करके कैसे बचेंगे?  

आज समाज में हिंसा की बहुतायत हो गई हे. लोग मन, बचन और कर्म तीनों से हिंसा करने में लगे हैं. मन से किसी के बारे में सही नहीं सोचते, बचन से किसी के बारे में सही नहीं कहते, कर्म से तो बस किसी भी की जान ऐसे ले लेते हैं जैसे किसी कीड़े को मार रहे हैं. हिंदू धर्म में तो कीड़े को मारना भी हिंसा है. हिंसा का कोई स्थान नहीं है हिंदू धर्म में. अगर कोई हिंदू हिंसा करता है, चाहे कोई भी कारण हो, वह ईश्वर के प्रति अपराध कर रहा है. ईश्वर हर जीवधारी के अन्तर में विराजमान है. किसी जीवधारी पर हिंसा कर के एक हिंदू ईश्वर पर हिंसा कर रहा है. आत्मरक्षा  के लिए भी पूरी कोशिश यही करनी चाहिए कि किसी की जान न लेनी पड़े, जब कोई और रास्ता न बचे तभी किसी की जान लेना सही माना जा सकता है. पिछले दिनों एक महिला ने एक कामांध व्यक्ति का सर काट दिया. वह बहुत समय तक कोशिश करती रही कि यह दुराचारी उस के ख़िलाफ़ हिंसा बंद कर दे पर वह नहीं माना. इस महिला के सामने कोई रास्ता नहीं बचा. इस लिए उस दुराचारी की जान ले लेना सही है. मेरा पूरा विश्वास है कि यहाँ का कानून और ईश्वर का कानून दोनों इस महिला को निरपराध मानेंगे. 

मैं हिंदू हूँ, इस लिए मुझे तकलीफ होती है जब कोई हिंदू हिंसा करता है. कारण चाहे कोई भी हो, हिंदू को हिंसा करने से बचना चाहिए. मुसलमान और ईसाई अगर हिंसा करते हैं तो वह अपने ईश्वर को जवाब देंगे. इस देश का कानून उन्हें सजा देगा. हिंसा का जवाब हिंसा नहीं है. मैं यह मानता हूँ कि हिन्दुओं की इस भावना को उन की कमजोरी माना  जाता है. कोई भी बिना किसी डर के हिन्दुओं पर आक्रमण कर देता है. जब हिंदू इस हिंसा का जवाब हिंसा से दे देता तो सब तरफ़ से गालियाँ पड़ने लगती हैं. लेकिन हिन्दुओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा धर्म हमें सब इंसानों से प्रेम करना, उनका और उनके धर्म का आदर करना सिखाता है. नफरत का हमारे धर्म में कोई स्थान नहीं है. हमारे लिए तो हर चलता-फिरता इंसान एक मन्दिर है, जिसके अन्तर में ईश्वर विराजता है. हम कैसे किसी  इंसान के अन्तर में विराजमान ईश्वर पर आक्रमण कर सकते हैं या उसे मार सकते हैं? 

इसलिए मेरे हिंदू भाइयों, अपने गुस्से पर नियंत्रण करो, अपने सोच पर नफरत को हावी मत होने दो, हमारे धर्म पर तो हर समय, हर तरफ़ से आक्रमण होते रहे हैं. अभी भी हो रहे हैं. यह आक्रमण बाहर से भी हो रहे हैं और अन्दर से भी. पर हमें संयम नहीं खोना चाहिए. यह हमारा देश है. हमें कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिस से इस देश की अखंडता और प्रभुसत्ता को कोई नुक्सान पहुंचे. जो इस देश को अपना नहीं समझते उन्हें बेनकाब करना चाहिए और देश के कानून के हवाले करना चाहिए. 

प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से. 

Thursday 23 October 2008

प्लीज़, छुट्टी पर चले जाओ

है बुद्धिजीवी,
बहुत दिनों से तुम छुट्टी पर नहीं गए,
प्लीज़ अब चले जाओ न,
हिमालय की कंदराओं में, 
मुझे कुछ काम पूरे करने हैं,
जो पेंडिंग पड़े हैं न जाने कब से.

पड़ोस की कालोनी में,
अब्दुल को ईद की मुबारकवाद देनी है,
पीटर के घर जाना है,
कहने 'हेप्पी क्रिसमस',
रहमान कर पायेगा अपना वादा पूरा,
दीवाली पर मेरे घर आने का,
अवतार सिंह के साथ जाना है,
गुरु पर्व पर गुरुद्वारे से प्रसाद लेने.

सिमरन को कर दिया था बम ने अनाथ,
एक मां की गोद सूनी कर दी एक और बम ने,
एक बहन हर वर्ष राखी खरीदती है,
और दिन भर रोती रहती है,
क्योंकि एक बम ने छीन लिया उस का भाई,
एक भाई ने बिठाना था बहन को डोली में,
बम ने बदल दी डोली एक अर्थी में, 
इनके और इन जैसे न कितने,
सबके पास जाना है,
दो शब्द सहानूभूति के कहने.
 
है बुद्धिजीवी,
अब तो चले जाओ छुट्टी पर. 

Wednesday 22 October 2008

अनैतिक विकास

नफरत का जहर फ़ैल रहा है,
प्रेम का अमृत सूख रहा है,
भूख इतनी बढ़ गई है,
आदमी आदमी को खा रहा है,
मानवता पशुता की और अग्रसर है,
अनैतिक विकास कहें या,
नैतिक विनाश? 

Tuesday 21 October 2008

एक कविता रेनू सूद की

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Monday 20 October 2008

अनुत्तरित प्रश्न

बढ़ रहा है, 
गुस्सा आदमी का,
या छोटी हो रही है,
हद बर्दाश्त की?
भटक रहा है,
स्वार्थ के अंधेरों में,
या लौट रहा है,
क्या कहते हैं,
बैक टू स्कुँयर वन? 

Sunday 19 October 2008

खोज

हम दो दोस्त,
निकले थे खोजने,
वह भगवान् को,
मैं इंसान को,
उसकी खोज पूरी हुई,
वह लौट आया,
मैं अभी भी खोज रहा हूँ,
इंसान को. 

Saturday 18 October 2008

भगवान् और इंसान

भगवान् को मैंने कभी देखा नहीं,
बस उस के बारे में सुना है,
जो सुना है उस पर यकीन किया है,
कभी नाउम्मीद नहीं किया उसने.

इंसान को मैंने देखा है,
पहचाना है, जाना है, 
पर अक्सर किया है उसने,
नाउम्मीद.
 

कभी पोप से मिला तो पूछूंगा

बेटा - पिता जी कुछ लोग अपने धर्म को बड़ा और दूसरे धर्म को छोटा क्यों कहते हैं? 

पिता - पता नहीं बेटा. 
बेटा - कुछ लोग अपने ईश्वर को बड़ा और दूसरों के ईश्वर को छोटा क्यों कहते हैं? 
पिता - पता नहीं बेटा. 
बेटा - क्या जैसे एक आदमी दूसरे से बड़ा होता है, उसी तरह धर्म और ईश्वर भी एक दूसरे से बड़े होते हैं? 
पिता - पता नहीं बेटा.
बेटा - पिता जी आप को बाकई नहीं पता या आप बताना नहीं चाहते?
पिता - बेटा ईश्वर एक है, वह बड़ा या छोटा हो ही नहीं सकता. जो लोग ईश्वर में भेद-भाव करते हैं वह ईश्वर को समझ ही नहीं पाये. ईश्वर की नजर में सब इंसान एक है. इस लिए, कोई इंसान भी दूसरे से बड़ा या छोटा नहीं हो सकता. 
बेटा - शायद उन का धर्म यही सिखाता हो. 
पिता - पता नहीं बेटा. 
बेटा - पिता जी फ़िर यही. 
पिता - बेटा, धर्म इंसान ने बनाये हैं. शायद कुछ लोगों ने ख़ुद को दूसरों से बड़ा साबित करने के लिए, अपने धर्म को दूसरे धर्मों से बड़ा कह दिया. और फ़िर अपने धर्म को बड़ा साबित करने के लिए अपना ईश्वर भी अलग कर लिया और उस ईश्वर को भी बड़ा कहना शुरू कर दिया. 
बेटा - अजीब बात है न यह?
पिता - हाँ बेटा, अजीब बात तो है. एक बात बताओ, तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो?
बेटा - कल मैं अपने एक दोस्त पीटर के घर गया था, उसके पिता जी ने मुझ से कहा, 'तुम्हारे धर्म के लोग ईसाइयों को मार रहे हैं'. 
पिता - क्या तुमने उन से पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं? 
बेटा - पूछा था. उन्होंने कहा कि उन का धर्म हमारे धर्म से बड़ा है. उन का ईश्वर भी हमारे ईश्वर से बड़ा है. हमारे धर्म के कुछ लोग उन के धर्म में जा कर बड़ा बनना चाहते हैं, पर हमारे धर्म के कुछ और लोग यह पसंद नहीं करते और उन के धर्म के लोगों को मारते हैं. 
पिता - फ़िर तुम ने क्या कहा?
बेटा - मैंने उन्हें वही कहा जो आपने मुझे हमारे धर्म के बारे मैं बताया है. मगर उन्होंने यह बात नहीं मानी और हमारे धर्म की हँसी उड़ाने लगे. हमारे देवी-देवताओं की भी हँसी उड़ाने लगे. फ़िर मैं वहां से चला आया. मुझे बड़ा अजीब लगा इस लिए मैंने फ़िर आपसे यह सब पूछा. 
पिता - तुमने उन के धर्म की हसीं तो नहीं उड़ाई.  
बेटा - नहीं पिता जी. 
पिता - यह तुमने बहुत अच्छा किया. जो लोग ईसाइओं को मार रहे हैं अच्छा नहीं कर रहे, पर शायद वह अपने धर्म की हँसी उड़ाना बर्दाश्त नहीं कर सके.
बेटा - क्या ईश्वर उन से नाराज होगा? 
पिता - हाँ बेटा, जरूर नाराज होगा. वह कभी पसंद नहीं करेगा कि कोई इंसान दूसरे इंसान को मारे. 
बेटा - मैं समझ गया पिता जी. एक बात और बताइये. भारत की एक ईसाई नन को पोप ने संत बनाया. सब कह रहे हैं कि इस से भारत का सम्मान बढ़ा. पोप ने ईसाइयों को मारने वालों की निंदा की, पर उन ईसायिओं को कुछ नहीं कहा जो हमारे धर्म  का मजाक उड़ाते हैं. 
पिता - इस का जवाब तो पोप ही देंगे बेटा. 
बेटा - ठीक हे पिता जी. मैं कभी उन से मिलूंगा तो पूछूंगा. 

Friday 17 October 2008

रास्ते अलग हो सकते हैं पर मंजिल तो एक ही है

किसी भी मंजिल तक पहुँचने के लिए एक से अधिक रास्ते होते है. लोग अलग-अलग रास्तों से चल कर मंजिल तक पहुँचते हैं. मंजिल सब का स्वागत करती है. किस ने कौन सा रास्ता चुना, इस आधार पर कोई भेद-भाव नहीं करती. इसी प्रकार ईश्वर तक पहुँचने के बहुत से रास्ते हैं. लोग अपने-अपने विश्वास के आधार पर अलग-अलग रास्तों से ईश्वर तक पहुँचते हैं. ईश्वर सब को समान रूप से स्वीकार करता है. वह किसी से नहीं पूछता कि तुम कौन से रास्ते से आए हो? 

लेकिन कुछ लोग इसी बात पर आपस में उलझ पड़ते हैं कि कौन सा रास्ता ठीक है? वह कहते हैं कि उनके धर्म मैं बताया  गया रास्ता ही सही है बाकी सारे रास्ते ग़लत हैं. चलिए आपकी ही सही मान लेते हैं. आप अपने सही रास्ते से ईश्वर तक पहुँच जाइए. अगर दूसरों के रास्ते ग़लत हैं, वह ईश्वर तक नहीं पहुंचेंगे, इधर-उधर भटकते रहेंगे. आप क्यों परेशान होते हैं? आप क्यों उन के पूजा के तरीकों में टांग अड़ाते हैं? 

एक हिंदू मूर्ति पूजा करता है. यह ग़लत हे या सही है, यह उसके और ईश्वर के बीच की बात है. किसी मुसलमान को इस पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए? मुसलमान मूर्ति पूजा को ग़लत मानते हैं तो मानें. कोई हिंदू इस बात पर आपत्ति नहीं उठाता. मुसलमान या ईसाई किस तरह पूजा करते हैं इस से किसी हिंदू को आपत्ति नहीं होती. मुसलमान या ईसाई अपने तरह से पूजा करें और हिन्दुओं को अपने तरह से करने दें. 

पिछले दिनों में हिन्दुओं के धार्मिक जलूसों औ उत्सवों पर जो आक्रमण किए गए वह किसी तरह से सही नहीं कहे जा सकते. यह असहिष्णुता सांप्रदायिक दंगों को जन्म देती है और फ़िर उसके लिए हिन्दुओं को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है. मुस्लिम और ईसाई समुदायों को इस असहिष्णुता से बचना चाहिए. मुझे अपने कार्यकाल की एक बात याद रही है. मेरा एक मुसलमान साथी एक फेक्ट्री में निरीक्षण के लिए गया. वहां फेक्ट्री के मालिक के दफ्तर में एक छोटा मन्दिर था जिसमे कुछ मूर्तियाँ थीं. इस बन्दे ने इस बात पर आपत्ति उठा दी और कहा कि मन्दिर वहां से हटाया जाय. बबाल मच गया. हमारे दफ्तर से कई सीनियर अफसरों को जाना पड़ा तब जाके कहीं मामला सुलझा. ताज्जुब    की बात यह है कि इस भले आदमी ने अपनी गलती नहीं मानी और यही कहता रहा कि फेक्ट्री के मालिक ने दफ्तर में मन्दिर बना कर ग़लत काम किया और फ़िर फेक्ट्री में काम कर रहे हिन्दुओं ने उसे मारने की कोशिश की. 

हिंदू आदतन शान्ति पसंद  कौम हैं, जब मुसलमान या ईसाई उन के धार्मिक मामलों में दखलंदाजी करने लगते हैं, उनके धर्म और देवी-देवताओं का मजाक बनाने लगते हैं, फ़िर भी हिंदू काफ़ी हद तक बर्दाश्त करते हैं, पर जब यह दखलंदाजी और मजाक बर्दाश्त के बाहर हो जाता है तब वह जवाब देते हैं, और फ़िर पोप तक चिल्लाने लगते हैं. सब को मुसलामानों और ईसाइओं की पिटाई नजर आती है, पर जो ग़लत हरकतें इन लोगों ने कीं वह नहीं नजर आतीं. मुझे लगता है कि जब तक मुसलमान और ईसाई अपनी यह हरकतें बंद नहीं करेंगे तब तक भारतीय समाज में स्थाई शान्ति नहीं आएगी. मुसलमान और ईसाई अपने अल्पसंख्यक होने का नाजायज फायदा उठा रहे हैं, इस पर रोक लगनी चाहिए. 

Wednesday 15 October 2008

एकता की तो ......!!!

एक-एक करके पहलवान उठते गए और एकता की ऐसी-तेसी करते गए. कुछ उठे नहीं तो अपने साथ लाये पर्चे बाँट दिए जिन में पहले से ही एकता की ऐसी-तेसी कर रखी थी. कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट छापी थी:
राष्ट्रिय एकता परिषद्, जोड़ या तोड़???
http://kavya-kunj.blogspot.com/2008/10/blog-post_12.html 
राष्ट्रिय एकता परिषद् की मीटिंग में वही हुआ जो मैंने कहा था. एकता की ऐसी-तेसी कर दी सबने.

अब जरा सोचिये, यह लोग राष्ट्र के हित में ख़ुद एक नहीं हो सकते, जनता को क्या एकता के सूत्र में बांधेंगे? जनता का कितना पैसा फूंक दिया इन्होनें इस मीटिंग में पर नतीजा, एक विशाल जीरो. सच पूछिए तो जीरो भी नहीं, बल्कि उस से कहीं नीचे. क्या सिर्फ़ एक-दूसरे को गालियाँ देने के लिए बुलाई गई थी यह मीटिंग? अगर ऐसा था तो गालियाँ देना तो इन का रोज का काम है, उस के लिए सबको एक जगह इकट्ठे करने की क्या जरूरत थी? इतनी गालियाँ रोज देते हैं यह लोग कि मीडिया को इन गालिओं को रिपोर्ट करने के लिए ओवरटाइम करना पड़ता है. 

सबने बस अपनी कहानी सुनाई, दूसरे की किसी ने नहीं सुनी. क्या कभी ऐसा होता है कि केवल एक पक्ष की ही गलती होती है? क्या कभी केवल एक पक्ष का ही नुक्सान होता है? अगर मसले को सुलझाना है तो दोनों पक्षों को आत्म-मंथन करना होगा. अपनी गलती महसूस करनी होगी. दूसरे पक्ष को विश्वास दिलाना होगा. पर यहाँ तो सरकारें भी एक पक्षीय हो गई हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि राष्ट्रीय एकता परिषद् की मीटिंग में एकता की बात तो किसी ने की ही नहीं. केवल वोटों की राजनीति की बातें. मीटिंग में कुछ ऐसे भी थे जो एक्टिव राजनीतिबाज नहीं हैं पर यह तो मंजे हुए राजनीतिबाजों से भी आगे निकल गए. 

बचपन में हम लड़ पड़ते थे तो समझदार बुजुर्ग समझोता करवाते थे. हम सब अपनी गलती मानते थे और दुबारा वह गलती न करने का वादा करते थे. दूसरे पक्ष को अपनी संजीदगी का विश्वास दिलाते थे. पर अब तो लगता है कि इस देश में कोई समझदार बुजुर्ग रहा ही नहीं. कुछ लोग नासमझी कर रहे हैं. उन्हें समझाने की जगह यह लोग ख़ुद उनसे बड़ी नासमझी कर रहे हैं. नासमझी क्या कहें, अपनी गोटी फिट कर रहे हैं. अल्पसंख्यकों के नेता चर्च और मस्जिद में भड़काऊ भाषण दे रहे हैं.  अब मामला सुलझेगा तो कैसे? एक ही तरीका है. आम आदमी जो इन झगड़ों का शिकार है उसे ही अपने बचाव के लिए दूसरे पक्ष के आम आदमी से मिल जुल कर झगड़े निपटाने होंगे. कितना भी आपस में झगड़े कर लें, आम आदमी ही आम आदमी के काम आता है. 

Tuesday 14 October 2008

ब्लाग 'मोहल्ला' - हिंदू और हिंदू धर्म को गालियाँ

जब मैं पहली बार मोहल्ले पर गया था तो मुझे इस ब्लाग के सूत्रधार से एक बैचारिक स्नेह सा हो गया था. पर अब तो उस ने मेरे उस स्नेह की धज्जियाँ उड़ा दी हैं. अब तो इस सूत्रधार का काम केवल हिन्दुओं और उन के धर्म को गाली देना ही रह गया है. एक और ब्लाग्कारा ने अपने ब्लाग पर लिखा था कि कुछ हिन्दुओं का काम ही पानी पीकर मुसलामानों को कोसना है. अब वह इस ब्लाग के सूत्रधार से मिल कर ख़ुद पानी पीकर हिन्दुओं को कोसा करती हैं.

पिछले कुछ दिनों से इस ब्लाग पर जो भी लेख छपता है उस में केवल हिन्दुओ और उनके धर्म को गालियाँ दी जाती हें। मैंने इस बात पर ऐतज़ार दर्ज किया। आज जब में इस ब्लाग पर गया तो मैंने पाया कि मेरी कोई टिपण्णी इस ब्लाग पर छप नहीं पा रही है। कारण मैं नहीं जानता। हो सकता है ब्लाग सूत्रधार ने कोई बंदिश लगा दी हो। ब्लाग के नए लेख में पुलिस की बर्बरता को भी मजहबी जामा पहना कर हिन्दुओं और हिंदू धर्म की निंदा की गई है। मेरी टिपण्णी है -

"पुलिस क्या है, यह सब जानते हैं. पुलिस द्बारा नागरिकों पर क्या अत्त्याचार किए जाते हैं, यह भी सब जानते हैं. इन अत्त्याचारों में से वह चुन कर लाना जो मुसलमानों से सम्बंधित हैं तो इस ब्लाग और इस के सूत्रधार को क्या कहें? पुलिस का इन अत्त्याचारों के पीछे एक ही मकसद होता है, पैसा. हर मामले में जिस पार्टी की और से पुलिस को ज्यादा फायदा मिलता है, वह उस की तरफ़ रहती है. इस बारे में पुलिस किसी का धर्म नहीं देखती. वह देखती है केवल पैसा. अब इस अत्त्याचार को मजहबी जामा पहना दिया जाना तो बहुत ग़लत बात है. ऐसे ब्लाग लेख समाज में वैमनस्य को और हवा देते हैं. नेता तो यह करते ही हैं, पिछले कुछ दिनों से कुछ ब्लागकार भी यह करने लगे हैं. मोहल्ला इस का एक जीता-जागता उदहारण है.

इस ब्लाग के सूत्रधार और हिन्दुओं और उन के धर्म के लिए गाली-गलौज की भाषा प्रयोग करने बालों से मैं यही पूछना चाहूँगा कि ऐसा करके वह किस का फायदा कर रहे हैं? क्या वह ब्लाग रचना इस लिए करते हैं कि समाज में नफरत का और ज्यादा प्रचार करें? नफरत से कभी किसी को कुछ नहीं मिला, और न ही इन्हें कुछ मिलेगा। इंसानियत को मजहबी जामा पहनाने से केवल नुकसान होगा फायदा नहीं. मुद्दों को एक तरफा नजर से देखने से मुद्दे सुलझते नहीं और उलझ जाते हैं. प्रेम की बात करो, नफरत की बात मत करो. प्रेम से आप किसी का दिल जीत सकते हैं, नफरत से नहीं. इस लिए हिन्दी ब्लाग जगत के ब्लाग्कारों, प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से."

अब तो मोहल्ले पर केवल गाली-गलौज ही नजर आती है। एक अच्छे ब्लाग का यह पतन दुःख का कारण है।

Sunday 12 October 2008

राष्ट्रिय एकता परिषद्, जोड़ या तोड़???

नाम से तो यह लगता है कि यह परिषद् राष्ट्रीय एकता के लिए काम करती है, पर हकीकत में यह एक राजनीतिक अखाड़ा है जिस में अलग-अलग पार्टियों के पहलवान एक दूसरे पर गालियों का प्रहार करते हैं और अपने-अपने वोट बेंक को यह दिखाते हैं कि देखो 'वोट जी' हम आपके लिए किस तरह युद्ध कर रहे हैं, मेहरबानी करके हमें ही वोट देना. कल सोमवार को इस परिषद् की मीटिंग होगी, पर गाली-गलौज का एजेंडा पहले ही तय हो गया है. कांग्रेस को शायद लगा कि उस के पास गालीबाजों की कमी है तो उस ने एक चैम्पियन गालीबाज को इस परिषद् में मनोनीत कर दिया. अब देखियेगा इस गालीबाज का कमाल.

इस परिषद् को काम तो जोड़ने का करना चाहिए पर यह काम करती है तोड़ने का. आतंकवाद, मजहबी दंगे, और ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिन पर इस परिषद् को बैठकर, ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए और इस समस्याओं का हल तलाशना चाहिए. पर यह सारे पहलवान करंगे आग में घी डालने का काम. शुरुआत करेंगे मनोनीत प्रधान मंत्री जी. सामने का मोर्चा संभालेंगे विपक्ष के नेता. बाकी सारे पहलवान अपनी-अपनी तरफ़ से आग में आहुतियाँ देंगे. एक दूसरे पर इल्जाम लगायेंगे. दूसरों को 'नफरत के सौदागर' और ख़ुद को 'मोहब्बत का मसीहा' साबित करेंगे. पुलिस और सुरक्षा एजेंसिओं को खूब गालियाँ देंगे. अगर नफरत नापने का कोई यंत्र होता तो बैठक से पहले और बैठक के बाद में नफरत कई गुना ज्यादा हो गई है यह साबित होता.

मजेदार बात यह है कि इन सबको और जनता को भी यह पता है कि किस पहलवान ने क्या दांव लगाना है, किस ने किस पर क्या इल्जाम लगाना है, किसने किस को क्या गाली देनी है. सब के भाषण पहले से तैयार हैं, हर हालत में इन्होनें अपने-अपने भाषण सुना देने है. मुकाबला होगा कौन कितना ज्यादा चिल्लाता है. 'एकता' की अर्थी जलाएंगे और 'विभाजन' को और मजबूत करेंगे यह लोग अपने भाषणों से. बेचारे असहाय 'वोट जी' को लगेगा कि इस परिषद् का नाम 'राष्ट्रिय एकता परिषद्' से बदल कर 'राष्ट्रिय एकता-विध्वंस परिषद्' रख देना चाहिए.

Friday 10 October 2008

कांग्रेस का देश के साथ क्रूर मजाक

अमर सिंह ने कांग्रेस को धमकी दी और कांग्रेस ने घुटने टेक दिए. बुरी आदत आसानी से नहीं जाती. कांग्रेस को करात के सामने घुटने टेकने की ऐसी आदत हो गई है कि अमर सिंह के कुछ कहते ही उस के घुटने जमीन पर टिक गए, और अमर सिंह को नेशनल इंटीग्रेशन काउन्सिल का सदस्य बना दिया. यह आदमी क्या इंटीग्रेशन करेगा? ऊपर से नीचे तक जो आदमी तोड़-फोड़ का एक्सपर्ट है उस से अब मिलन करवाया जायेगा. क्या मजाक है? पर कांग्रेस तो इस देश के साथ ऐसे मजाक करती ही रहती है. आजादी के पहले से मजाक का यह सिलसिला चल रहा है. पहला मजाक किया तो देश के दो हिस्से हो गए. तब से कांग्रेस कोई न कोई मजाक करती आ रही है. आज का मजाक है अमर सिंह को एनआईसी का सदस्य बनाना.

Thursday 9 October 2008

आज की कुछ खबरें

कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कहा कि सरकार के पास बजरंग दल पर पाबंदी लगाने के लिए सारे सबूत हैं. पर कल हुई मंत्री-परिषद् की बैठक में सरकार ने यह निर्णय नहीं लिया. क्यों? क्या प्रवक्ता ने झूट बोला, या कांग्रेस असलियत में ईसायिओं और मुसलमानों की हिफाज़त नहीं करना चाहती, या महाराष्ट्र और आसाम में ख़ुद उसकी पोजीसन कच्ची हो रही है, या कोई और कारण है?

वह बहुत मजे से अपनी जिंदगी गुजार रहा था. १९ लाख रुपए सालाना मिलते थे उसे. पर पुलिस ने उसे आतंकवादी होने के इल्जाम में गिरफ्तार किया. उसकी मां ने कहा वह निर्दोष है. इसमें कोई खास बात नहीं क्योंकि हर मां अपने बेटे को निर्दोष कहेगी. पर एक ख़ास बात कही उस की मां ने उस से, जब वह उस से मिलने गई - "तूने जिहाद का मतलब मुझसे क्यों नहीं पुछा? इस्लाम इस बारे में क्या कहता है, यह तुझे मुझ से पूछना था. मैं तुझे सही बात बताती." क्या यह हर गिरफ्तार मुस्लिम नौजवान के साथ नहीं हो रहा है? मैंने अक्सर यह कहा है कि अगर तुम अपने बच्चों को सही बात नहीं सिखाओगे तो कोई और उन्हें ग़लत बात सिखा देगा.

प्रधान मंत्री ने कहा कि ईसायिओं पर हुए हमलों से भारत का नाम सारे विश्व में बदनाम हुआ है, यह एक राष्ट्रिय शर्म की बात है. मैं यह नहीं समझ पाता कि बदनामी और शर्म किसी एक या दूसरे मजहब के साथ क्यों जोड़ दी जाती है? क्या इंसानियत धर्म देख कर जागती है? मरने वाला अगर इस धर्म का था तो बहुत बुरी बात हुई, और अगर वह दूसरे धर्म का था तो कोई बात नहीं. यह कैसा सोच है? जब कश्मीर में पंडितों का कत्लेआम हो रहा था तब यह इंसानियत क्यों नहीं जागी, तब भारत की बदनामी क्यों नहीं हुई, तब यह राष्ट्रिय शर्म की बात क्यों नहीं बनी? दिल्ली और दूसरे शहरों में बम धमाकों में जब लोग मरे तो यह इंसानियत क्यों नहीं जागी, तब भारत की बदनामी क्यों नहीं हुई, तब यह राष्ट्रिय शर्म की बात क्यों नहीं बनी? लेकिन जब दिल्ली में पुलिस मुट्भेड़ में कुछ लोग मारे गए या गिरफ्तार किए गए तब अचानक ही इंसानियत जाग उठी. शर्मा जी की मौत पर इंसानियत तो नहीं जगी, हाँ कुछ लोग हैवानियत की हदें पार कर गए. क्या क्या नहीं इन लोगों ने? क्या क्या इल्जाम नहीं लगाए इन लोगों ने? धर्म के नाम पर हैवानियत का यह नंगा नाच क्या भारत की बदनामी नहीं करता? क्या यह राष्ट्रीय शर्म की बात नहीं है?

भारत में घुसे बंगलादेशी नागरिकों ने भारतीय नागरिकों पर हमला किया. यह तो अजीब ही बात हो गई. जिन्हें इस देश की जमीन से खदेड़ दिया जाना चाहिए था, वह यहाँ बस गए हैं, और ऐसे बसे हैं कि यहाँ के निवासियों पर हमला करने की हिम्मत भी रखते हैं. कुछ दिन पहले दिल्ली के तैमूर नगर इलाके में ऐसे ही गैरकानूनी बंगलादेशी घुसपैठियों ने दिल्ली पुलिस की जम कर पिटाई की.

कामरेड सोमनाथ जी ने विदेश का दौरा रद्द कर दिया क्योंकि वहां की सरकार ने कहा कि उन की तलाशी ली जायेगी. इस से पहले कुछ सरकारों ने भारतीय मंत्रियों की तलाशी ली थी, जॉर्ज फर्नांडिस और प्रणब मुखेर्जी ऐसे कुछ मंत्री हैं. कैसी भारत सरकार है यह? यहाँ कोई बाहर से आता है तो उस की तलाशी तो दूर उस के लिए लाल कालीन विछाया जाता है. क्या इन तलाशियों से भारत की बदनामी नहीं होती?क्या यह राष्ट्रीय शर्म की बात नहीं है? यह बेशर्म सरकारें और यह बेशर्म नेता.

Sunday 5 October 2008

एक सवाल. आप ने क्या हासिल किया???

एक सवाल आप सब से. हो सकता है इन में से कोई भी सवाल आप पर लागू न होता हो. ऐसी स्थिति में आप इन सवालों को नकार दीजियेगा.

आप की कार से एक साईकिल, स्कूटर या कार टकरा गई. आप को बहुत गुस्सा आ गया. आप ने साइकिल सवार, स्कूटर/कार ड्राइवर पर हमला कर दिया, उसे धायल कर दिया या मार डाला. आप ने क्या हासिल किया?

आप के पड़ोसी ने स्कूटर पार्क किया जो आप को अच्छा नहीं लगा. आप उस से झगड़ा करने लगे. मार-पीट हुई और आपने उसे धायल कर दिया या मार दिया. आप ने क्या हासिल किया?

आप ने कुछ लोगों के भरमाने पर बाज़ार में बम रख दिया. उस विस्फोट में बहुत से बच्चे, जवान और बूढ़े मारे गए. आप ने क्या हासिल किया?

आप के छात्र ने होम वर्क नहीं किया. आप को बहुत गुस्सा आया. आपने उसे थप्पड़ मारे जिस से उस के कान का परदा फट गया. आप ने क्या हासिल किया?

आप पुलिस में हैं. आप ने एक चोर पकड़ा. थाने में ला कर आपने उसे इतना मारा कि वह मर गया. आप ने क्या हासिल किया?

बस में कुछ गुंडों ने एक लड़की के साथ बदसलूकी की. वह मदद के लिए चिल्लाती रही पर आप देखते रहे. आप ने क्या हासिल किया?

आप डाक्टर हैं. आप ने गर्भ में बच्चे के सेक्स की जांच की और पाया कि वह कन्या है. उस के माता-पिता के कहने पर आप ने गर्भ में ही उस की हत्या कर दी. आप ने क्या हासिल किया?

आप नेता हैं. आपने अपनी नाजायज मांगे मनवाने के लिए रास्ता रोक दिया. एक बीमार आदमी अस्पताल नहीं पहुँच पाया और मर गया. आप ने क्या हासिल किया?

आप जूनियर डाक्टर हैं. आप ने एक जरा सी बात पर हड़ताल कर दी. कुछ मरीज समय से इलाज न होने के कारण मर गए. आप ने क्या हासिल किया?

उन्होंने स्वामी जी को मारा. आप ने उन का चर्च जला दिया. कुछ निर्दोष लोगों को मार दिया. आप ने क्या हासिल किया?

आप ने कुछ ग़रीबों की मजबूरी का नाजायज फायदा उठा कर उन्हें उन का धर्म बदलने पर मजबूर किया. आप ने क्या हासिल किया?

एक हिंदू लड़की आप के बेटे से प्यार करती थी और उस से शादी करना चाहती थी. आप ने उसे मजबूर किया कि वह अपना धर्म बदल ले, नहीं तो शादी नहीं होगी.उस ने धर्म बदल लिया. आप ने क्या हासिल किया?

आप की मर्जी का दहेज़ न मिलने पर आप ने अपनी बहू को मार डाला. आप ने क्या हासिल किया?

आप ने अपने पति और सास-स्वसुर के ख़िलाफ़ झूटी शिकायत कर के उन्हें गिरफ्तार करवा दिया. आप ने क्या हासिल किया?

आप ने अपने जरा से फायदे के लिए अपने सहकर्मी की बॉस से झूटी शिकायत करके उस की प्रोमोशन रुकवा दी. आप ने क्या हासिल किया?

और भी बहुत से सवाल हैं. फ़िर कभी पूछेंगे.

Saturday 4 October 2008

बंद करो धर्म के नाम पर यह हिंसा

आतंकवादी अपने धर्म के नाम पर हिंसा करते हैं. कुछ लोग अपने धर्म के नाम पर दूसरों का धर्म परिवर्तन करके हिंसा करते हैं. कुछ लोग धर्म परिवर्तन का विरोध करने के लिए अपने धर्म के नाम पर हिंसा करते हें. हिंसा कोई भी करे, किसी भी कारण से हिंसा करे, ग़लत है, एक अमानवीय काम है, ईश्वर के प्रति एक अपराध है. किसी का उद्देश्य, उसके अनुसार, कितना ही पवित्र क्यों न हो, किसी इंसान को मार डालने का औचित्य नहीं बन सकता. हर इंसान को उस के ईश्वर ने यह जिंदगी दी है. आप को यह अधिकार किस ने दिया कि आप उस से उसकी जिंदगी छीन लें? कैसी अजीब बात है? एक दूसरा इंसान आप के धर्म का नहीं है, क्या इस लिए आप उसे मार डालेंगे?

अगर मुसलमान शब्द का अर्थ 'अल्लाह में मुकम्मल ईमान' है, तो केवल कुछ लोग ही मुसलमान क्यों हुए? जो भी कोई अल्लाह, खुदा, ईश्वर में मुकम्मल ईमान रखता है, मुसलमान कहलायेगा. मैं अपने ईश्वर में पूरा विश्वास रखता हूँ, इस नाते मैं भी मुसलमान हूँ. अपने को मुसलमान कहने वाले अपने तरीके से अपने अल्लाह की इबादत करते हैं, मैं अपने तरीके से, ईसाई अपने तरीके से अपने खुदा की इबादत करते हैं, इसी तरह सिख अपने तरीके से वाहे गुरु की इबादत करते हैं. यह सब अगर अपने-अपने ईश्वर में पूरा विश्वास रखते हैं तो यह सब मुसलमान हुए. आप में और इन में कोई फर्क नहीं है. अगर आप एक सच्चे मुसलमान हैं तो इंसान-इंसान में फर्क करना बंद कीजिए. अगर आपका खुदा यह फर्क नहीं करता तो आप कौन होते हैं यह फर्क करने वाले?

कोई गरीब है, किसी को मदद की जरूरत है, क्या उस की इस मजबूरी का नाजायज फायदा उठा कर आप उस का धर्म परिवर्तन करा देंगे? क्या इंसानियत के नाते किसी की मदद करना आपके धर्म में नहीं सिखाया जाता? क्या आप की इंसानियत सिर्फ़ आपके अपने धर्म के लोगों तक ही सीमित है? यह भरती के दफ्तर क्यों खोल रखे हैं आपने? क्या आपके खुदा ने आपको अपना भरती एजेन्ट बनाकर यहाँ भेजा है? क्या इस जमीन पर कोई चुनाव होने वाला है जिसमें आपका और दूसरों के खुदा हिस्सा लेंगे और आप उन के लिए वोट बेंक तैयार कर रहे हैं? कुछ लोग कहते हैं कि केवल हमारा अल्लाह है और कोई नहीं. कुछ लोग कहते हैं कि हमारा खुदा सब से अच्छा है, हमारा धर्म सब से अच्छा है. यानी आपका अल्लाह और उनका खुदा कोई चीज हो गए जिसे आप लोग मार्केट कर रहे हैं.

आप अपने धर्म के मानने वालों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं, उन्हें इंसान नहीं समझते, और जब वह मजबूर होकर अपना धर्म बदल लेते हैं तो धर्म के व्यापारियों के विरुद्ध आप हिंसा करते हैं. जो इन गरीब और असहाय लोगों को धर्म बदल कर मिलता है वह सब आप ही इन्हें क्यों नहीं दे देते? अगर ऐसा हो जाए तो कोई भी धर्म का व्यापारी इन के साथ धर्म का सौदा नहीं कर सकता. ईश्वर की नजर में सब बराबर हैं. वह तो केवल प्रेम का सम्बन्ध मानता है. आप किसी से नफरत कैसे कर सकते हैं? आप कैसे किसी को मार सकते हैं? आप दूसरों के धार्मिक स्थानों पर हमला कैसे कर सकते हैं? आपका ईश्वर आपको इस की इजाजत नहीं देता. वह तो उन्हें भी प्रेम करता है जो उसे गालियाँ देते हैं. क्या आपको नहीं लगता कि इस तरह हिंसा करके आप अपने ईश्वर के प्रति अपराध कर रहे हैं? सोचिये, कल जब आप उसके सामने जायेंगे तो क्या जवाब देंगे उसे? क्या इंसानों के खून से रंगी हथेलियाँ लेकर उस के सामने जायेंगे आप?

क्या आप जिस हवा में साँस लेते हैं वह आप के ईश्वर ने भेजी है? अगर यह सच है तो दूसरे धर्म वाले उस हवा में साँस कैसे ले सकते हैं? आप के ईश्वर का भेजा हुआ पानी दूसरे धर्म वाले कैसे पी सकते हैं? इसी तरह आप के ईश्वर की भेजी हुई धूप भी केवल आप की है, दूसरे उसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं? आपने अपने-अपने ईश्वर तो बाँट लिए, अब उसके द्वारा भेजी गई हवा, पानी और धूप को बाँट सकते हैं क्या आप? अगर बाँट सकते हैं तो बाँट लीजिये. जब ईश्वर और इंसानियत का बंटवारा होना ही है तो मुकम्मल बंटवारा क्यों न हो. धूप, हवा,पानी के रंग अलग कर लीजिये ताकि पहचानने में आसानी हो. खून का रंग भी अगर बदल सकते हैं तो बदल लीजिये.

अपने-अपने धर्म का मजाक उड़ाना बंद कीजिए. अपने-अपने ईश्वर का मजाक उड़ाना बंद कीजिए. आप ख़ुद अपने धर्म और ईश्वर का मजाक उड़ाते हैं और दूसरों पर लांछन लगाते हैं और यह बहाना बनाकर उन के ख़िलाफ़ हिंसा करते हैं. जरा अपने ईश्वर का नाम लेकर अपने मन के अन्दर झांकिए, आप को लगेगा कि आप ख़ुद अपने धर्म के सब से बड़े दुश्मन हैं. हिंसा करनी है तो आप ख़ुद अपने ख़िलाफ़ करिए. यही सच्चा जिहाद है. यही सब से अच्छी प्रार्थना है. यही सबसे अच्छा कन्फेशन है. यही सब से अच्छी अरदास है.

बंद कर दीजिये धर्म के नाम पर यह हिंसा करना.

मान गए आपको शीला जी

एक टीवी चेनल पर एक बंधू कह रहे थे कि दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला जी जब भी मुहँ खोलती हें कुछ ऐसा कह देती हें जो उचित नहीं होता। वह ऐसा शीला जी के उस बयान के सम्बन्ध में कह रहे थे जो उन्होंने सोम्या विश्वनाथन के कत्ल के सिलसिले में दिया था। आज उस बयान पर एक अखबार ने छापा है। आप भी गौर फरमाएं।
सम्पादकीय में जो कहा गया है मैं उस से सहमत हूँ। क्या आप भी सहमत हें? यह एक शर्मनाक बयान है। इस की जितनी निंदा की जाए कम है।

Thursday 2 October 2008

देखिये तस्वीर क्या कहती है!!!

आज ईद है।आज कल मां के नवरात्रे चल रहे हें। सब तरफ़ भक्ति और प्रेम का रस है। आज ही अहिंसा के पुजारी बापू का जन्म दिन है। आइये हम सब एक वादा करें। मानव मात्र से प्रेम करेंगे। हर मानव में ईश्वर का ही रूप देखेंगे।

प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से