दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Sunday 12 October 2008

राष्ट्रिय एकता परिषद्, जोड़ या तोड़???

नाम से तो यह लगता है कि यह परिषद् राष्ट्रीय एकता के लिए काम करती है, पर हकीकत में यह एक राजनीतिक अखाड़ा है जिस में अलग-अलग पार्टियों के पहलवान एक दूसरे पर गालियों का प्रहार करते हैं और अपने-अपने वोट बेंक को यह दिखाते हैं कि देखो 'वोट जी' हम आपके लिए किस तरह युद्ध कर रहे हैं, मेहरबानी करके हमें ही वोट देना. कल सोमवार को इस परिषद् की मीटिंग होगी, पर गाली-गलौज का एजेंडा पहले ही तय हो गया है. कांग्रेस को शायद लगा कि उस के पास गालीबाजों की कमी है तो उस ने एक चैम्पियन गालीबाज को इस परिषद् में मनोनीत कर दिया. अब देखियेगा इस गालीबाज का कमाल.

इस परिषद् को काम तो जोड़ने का करना चाहिए पर यह काम करती है तोड़ने का. आतंकवाद, मजहबी दंगे, और ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिन पर इस परिषद् को बैठकर, ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए और इस समस्याओं का हल तलाशना चाहिए. पर यह सारे पहलवान करंगे आग में घी डालने का काम. शुरुआत करेंगे मनोनीत प्रधान मंत्री जी. सामने का मोर्चा संभालेंगे विपक्ष के नेता. बाकी सारे पहलवान अपनी-अपनी तरफ़ से आग में आहुतियाँ देंगे. एक दूसरे पर इल्जाम लगायेंगे. दूसरों को 'नफरत के सौदागर' और ख़ुद को 'मोहब्बत का मसीहा' साबित करेंगे. पुलिस और सुरक्षा एजेंसिओं को खूब गालियाँ देंगे. अगर नफरत नापने का कोई यंत्र होता तो बैठक से पहले और बैठक के बाद में नफरत कई गुना ज्यादा हो गई है यह साबित होता.

मजेदार बात यह है कि इन सबको और जनता को भी यह पता है कि किस पहलवान ने क्या दांव लगाना है, किस ने किस पर क्या इल्जाम लगाना है, किसने किस को क्या गाली देनी है. सब के भाषण पहले से तैयार हैं, हर हालत में इन्होनें अपने-अपने भाषण सुना देने है. मुकाबला होगा कौन कितना ज्यादा चिल्लाता है. 'एकता' की अर्थी जलाएंगे और 'विभाजन' को और मजबूत करेंगे यह लोग अपने भाषणों से. बेचारे असहाय 'वोट जी' को लगेगा कि इस परिषद् का नाम 'राष्ट्रिय एकता परिषद्' से बदल कर 'राष्ट्रिय एकता-विध्वंस परिषद्' रख देना चाहिए.

4 comments:

श्रीकांत पाराशर said...

Poori tarah sahi likha hai aapne. aap agar anumati denge to ham aapke vicharon ko kabhi kabhi apne dainik akhbar ke pathkon tak pahunchana chahenge.agar chahen to meri mail par suchit karen. agar pata denge to akhbar bhi bhijwaya jayega.

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी बहुत ही सही बात लिखी है आप ने, लेकिन क्या जनता अभ भी इन के बहकावे मै आ जायेगी?? कहते है जन्ता जागरुक हो गई है...ओर अब तो लिव-इन-रिलेशनशिप जेसी बाते भी करने लगी है,इतने अधुनिक लोग केसे इन नेताओ की चिकनी चुपडी बातो मै आ जायेगे???
वेसे मै तो पुराने जमाने का आदमी हु, ओर आप की बात से सहमत हुं.
धन्यवाद

Suresh Chandra Gupta said...

राज जी, यही तो अफ़सोस है. जनता जागरुक जरूर हो गई है पर ग़लत रास्ते पर चल पड़ी है. लिव-इन-रिलेशनशिप और गे अधिकारों की बात करने लगी है पर अभी तक इन राज नेताओं की चालों को नहीं समझ पाई है. या अगर समझ भी गई है तो इन चालों से बच नहीं पा रही है, या उसे इन राज नेताओं के साथ ही अपना स्वार्थ सिद्ध होता नजर आ रहा है. आज आप महंगाई की बात करो तो लोग ख़ुद ही सरकार की तरफ़ से सफाई देने लगते हैं. अपराध की बात करो तो एक दूसरे की गलतियाँ निकालने लगते हैं. लगभग हर आदमी किसी न किसी पार्टी या नेता से जुड़ा हुआ है. नेता मस्ती करता है और यह बेबकूफ आपस में सर-फुटौवल कर लेते हैं.

COMMON MAN said...

aapne bilkul theek likha hai, kintu janta ki aankhen band hain