दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Saturday 18 October 2008

कभी पोप से मिला तो पूछूंगा

बेटा - पिता जी कुछ लोग अपने धर्म को बड़ा और दूसरे धर्म को छोटा क्यों कहते हैं? 

पिता - पता नहीं बेटा. 
बेटा - कुछ लोग अपने ईश्वर को बड़ा और दूसरों के ईश्वर को छोटा क्यों कहते हैं? 
पिता - पता नहीं बेटा. 
बेटा - क्या जैसे एक आदमी दूसरे से बड़ा होता है, उसी तरह धर्म और ईश्वर भी एक दूसरे से बड़े होते हैं? 
पिता - पता नहीं बेटा.
बेटा - पिता जी आप को बाकई नहीं पता या आप बताना नहीं चाहते?
पिता - बेटा ईश्वर एक है, वह बड़ा या छोटा हो ही नहीं सकता. जो लोग ईश्वर में भेद-भाव करते हैं वह ईश्वर को समझ ही नहीं पाये. ईश्वर की नजर में सब इंसान एक है. इस लिए, कोई इंसान भी दूसरे से बड़ा या छोटा नहीं हो सकता. 
बेटा - शायद उन का धर्म यही सिखाता हो. 
पिता - पता नहीं बेटा. 
बेटा - पिता जी फ़िर यही. 
पिता - बेटा, धर्म इंसान ने बनाये हैं. शायद कुछ लोगों ने ख़ुद को दूसरों से बड़ा साबित करने के लिए, अपने धर्म को दूसरे धर्मों से बड़ा कह दिया. और फ़िर अपने धर्म को बड़ा साबित करने के लिए अपना ईश्वर भी अलग कर लिया और उस ईश्वर को भी बड़ा कहना शुरू कर दिया. 
बेटा - अजीब बात है न यह?
पिता - हाँ बेटा, अजीब बात तो है. एक बात बताओ, तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो?
बेटा - कल मैं अपने एक दोस्त पीटर के घर गया था, उसके पिता जी ने मुझ से कहा, 'तुम्हारे धर्म के लोग ईसाइयों को मार रहे हैं'. 
पिता - क्या तुमने उन से पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं? 
बेटा - पूछा था. उन्होंने कहा कि उन का धर्म हमारे धर्म से बड़ा है. उन का ईश्वर भी हमारे ईश्वर से बड़ा है. हमारे धर्म के कुछ लोग उन के धर्म में जा कर बड़ा बनना चाहते हैं, पर हमारे धर्म के कुछ और लोग यह पसंद नहीं करते और उन के धर्म के लोगों को मारते हैं. 
पिता - फ़िर तुम ने क्या कहा?
बेटा - मैंने उन्हें वही कहा जो आपने मुझे हमारे धर्म के बारे मैं बताया है. मगर उन्होंने यह बात नहीं मानी और हमारे धर्म की हँसी उड़ाने लगे. हमारे देवी-देवताओं की भी हँसी उड़ाने लगे. फ़िर मैं वहां से चला आया. मुझे बड़ा अजीब लगा इस लिए मैंने फ़िर आपसे यह सब पूछा. 
पिता - तुमने उन के धर्म की हसीं तो नहीं उड़ाई.  
बेटा - नहीं पिता जी. 
पिता - यह तुमने बहुत अच्छा किया. जो लोग ईसाइओं को मार रहे हैं अच्छा नहीं कर रहे, पर शायद वह अपने धर्म की हँसी उड़ाना बर्दाश्त नहीं कर सके.
बेटा - क्या ईश्वर उन से नाराज होगा? 
पिता - हाँ बेटा, जरूर नाराज होगा. वह कभी पसंद नहीं करेगा कि कोई इंसान दूसरे इंसान को मारे. 
बेटा - मैं समझ गया पिता जी. एक बात और बताइये. भारत की एक ईसाई नन को पोप ने संत बनाया. सब कह रहे हैं कि इस से भारत का सम्मान बढ़ा. पोप ने ईसाइयों को मारने वालों की निंदा की, पर उन ईसायिओं को कुछ नहीं कहा जो हमारे धर्म  का मजाक उड़ाते हैं. 
पिता - इस का जवाब तो पोप ही देंगे बेटा. 
बेटा - ठीक हे पिता जी. मैं कभी उन से मिलूंगा तो पूछूंगा. 

4 comments:

युग-विमर्श said...

स्वकल्पित कथाएँ रोचक तो हो सकती हैं, यथार्थ नहीं.ऐसी कथाएं सभी धर्मों के सम्बन्ध में लिखी जा सकती हैं और कहीं अधिक चुभती हुई.

Nitish Raj said...

बेटा, धर्म इंसान ने बनाये हैं. शायद कुछ लोगों ने ख़ुद को दूसरों से बड़ा साबित करने के लिए, अपने धर्म को दूसरे धर्मों से बड़ा कह दिया. ये जवाब उनमें से है जो कि हम खुद चाहते हैं कि गर कोई पूछे तो बता दें।

हिमवंत said...

सटीक. पित्ता-पुत्र संवाद के माध्यम से आपने अच्छी अभिव्यक्ति दी है. पोप से मै भी पुछना चाहता हुं की "लोभ-लालच-कोर्पोरेट कार्यशैली" के बल पर लोगो का धर्म परिवर्तन कर हमारे दिलों मे क्यो जहर घोल रहे है। उनकी करतुतो से भारत हीं नही, पाकिस्तान, नेपाल और अफ्गानिस्तान भी पिडीत है।

sumansourabh said...

बहुत सुंदर