दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Saturday 4 October 2008

बंद करो धर्म के नाम पर यह हिंसा

आतंकवादी अपने धर्म के नाम पर हिंसा करते हैं. कुछ लोग अपने धर्म के नाम पर दूसरों का धर्म परिवर्तन करके हिंसा करते हैं. कुछ लोग धर्म परिवर्तन का विरोध करने के लिए अपने धर्म के नाम पर हिंसा करते हें. हिंसा कोई भी करे, किसी भी कारण से हिंसा करे, ग़लत है, एक अमानवीय काम है, ईश्वर के प्रति एक अपराध है. किसी का उद्देश्य, उसके अनुसार, कितना ही पवित्र क्यों न हो, किसी इंसान को मार डालने का औचित्य नहीं बन सकता. हर इंसान को उस के ईश्वर ने यह जिंदगी दी है. आप को यह अधिकार किस ने दिया कि आप उस से उसकी जिंदगी छीन लें? कैसी अजीब बात है? एक दूसरा इंसान आप के धर्म का नहीं है, क्या इस लिए आप उसे मार डालेंगे?

अगर मुसलमान शब्द का अर्थ 'अल्लाह में मुकम्मल ईमान' है, तो केवल कुछ लोग ही मुसलमान क्यों हुए? जो भी कोई अल्लाह, खुदा, ईश्वर में मुकम्मल ईमान रखता है, मुसलमान कहलायेगा. मैं अपने ईश्वर में पूरा विश्वास रखता हूँ, इस नाते मैं भी मुसलमान हूँ. अपने को मुसलमान कहने वाले अपने तरीके से अपने अल्लाह की इबादत करते हैं, मैं अपने तरीके से, ईसाई अपने तरीके से अपने खुदा की इबादत करते हैं, इसी तरह सिख अपने तरीके से वाहे गुरु की इबादत करते हैं. यह सब अगर अपने-अपने ईश्वर में पूरा विश्वास रखते हैं तो यह सब मुसलमान हुए. आप में और इन में कोई फर्क नहीं है. अगर आप एक सच्चे मुसलमान हैं तो इंसान-इंसान में फर्क करना बंद कीजिए. अगर आपका खुदा यह फर्क नहीं करता तो आप कौन होते हैं यह फर्क करने वाले?

कोई गरीब है, किसी को मदद की जरूरत है, क्या उस की इस मजबूरी का नाजायज फायदा उठा कर आप उस का धर्म परिवर्तन करा देंगे? क्या इंसानियत के नाते किसी की मदद करना आपके धर्म में नहीं सिखाया जाता? क्या आप की इंसानियत सिर्फ़ आपके अपने धर्म के लोगों तक ही सीमित है? यह भरती के दफ्तर क्यों खोल रखे हैं आपने? क्या आपके खुदा ने आपको अपना भरती एजेन्ट बनाकर यहाँ भेजा है? क्या इस जमीन पर कोई चुनाव होने वाला है जिसमें आपका और दूसरों के खुदा हिस्सा लेंगे और आप उन के लिए वोट बेंक तैयार कर रहे हैं? कुछ लोग कहते हैं कि केवल हमारा अल्लाह है और कोई नहीं. कुछ लोग कहते हैं कि हमारा खुदा सब से अच्छा है, हमारा धर्म सब से अच्छा है. यानी आपका अल्लाह और उनका खुदा कोई चीज हो गए जिसे आप लोग मार्केट कर रहे हैं.

आप अपने धर्म के मानने वालों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं, उन्हें इंसान नहीं समझते, और जब वह मजबूर होकर अपना धर्म बदल लेते हैं तो धर्म के व्यापारियों के विरुद्ध आप हिंसा करते हैं. जो इन गरीब और असहाय लोगों को धर्म बदल कर मिलता है वह सब आप ही इन्हें क्यों नहीं दे देते? अगर ऐसा हो जाए तो कोई भी धर्म का व्यापारी इन के साथ धर्म का सौदा नहीं कर सकता. ईश्वर की नजर में सब बराबर हैं. वह तो केवल प्रेम का सम्बन्ध मानता है. आप किसी से नफरत कैसे कर सकते हैं? आप कैसे किसी को मार सकते हैं? आप दूसरों के धार्मिक स्थानों पर हमला कैसे कर सकते हैं? आपका ईश्वर आपको इस की इजाजत नहीं देता. वह तो उन्हें भी प्रेम करता है जो उसे गालियाँ देते हैं. क्या आपको नहीं लगता कि इस तरह हिंसा करके आप अपने ईश्वर के प्रति अपराध कर रहे हैं? सोचिये, कल जब आप उसके सामने जायेंगे तो क्या जवाब देंगे उसे? क्या इंसानों के खून से रंगी हथेलियाँ लेकर उस के सामने जायेंगे आप?

क्या आप जिस हवा में साँस लेते हैं वह आप के ईश्वर ने भेजी है? अगर यह सच है तो दूसरे धर्म वाले उस हवा में साँस कैसे ले सकते हैं? आप के ईश्वर का भेजा हुआ पानी दूसरे धर्म वाले कैसे पी सकते हैं? इसी तरह आप के ईश्वर की भेजी हुई धूप भी केवल आप की है, दूसरे उसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं? आपने अपने-अपने ईश्वर तो बाँट लिए, अब उसके द्वारा भेजी गई हवा, पानी और धूप को बाँट सकते हैं क्या आप? अगर बाँट सकते हैं तो बाँट लीजिये. जब ईश्वर और इंसानियत का बंटवारा होना ही है तो मुकम्मल बंटवारा क्यों न हो. धूप, हवा,पानी के रंग अलग कर लीजिये ताकि पहचानने में आसानी हो. खून का रंग भी अगर बदल सकते हैं तो बदल लीजिये.

अपने-अपने धर्म का मजाक उड़ाना बंद कीजिए. अपने-अपने ईश्वर का मजाक उड़ाना बंद कीजिए. आप ख़ुद अपने धर्म और ईश्वर का मजाक उड़ाते हैं और दूसरों पर लांछन लगाते हैं और यह बहाना बनाकर उन के ख़िलाफ़ हिंसा करते हैं. जरा अपने ईश्वर का नाम लेकर अपने मन के अन्दर झांकिए, आप को लगेगा कि आप ख़ुद अपने धर्म के सब से बड़े दुश्मन हैं. हिंसा करनी है तो आप ख़ुद अपने ख़िलाफ़ करिए. यही सच्चा जिहाद है. यही सब से अच्छी प्रार्थना है. यही सबसे अच्छा कन्फेशन है. यही सब से अच्छी अरदास है.

बंद कर दीजिये धर्म के नाम पर यह हिंसा करना.

6 comments:

Nitish Raj said...

सुरेश जी आपकी ये लाइनें बहुत पसंद आईं-
अगर मुसलमान शब्द का अर्थ 'अल्लाह में मुकम्मल ईमान' है, तो केवल कुछ लोग ही मुसलमान क्यों हुए? जो भी कोई अल्लाह, खुदा, ईश्वर में मुकम्मल ईमान रखता है, मुसलमान कहलायेगा. मैं अपने ईश्वर में पूरा विश्वास रखता हूँ, इस नाते मैं भी मुसलमान हूँ।
बहुत ही बढ़िया विचार, दिल से लिखे हुए दिल तक के लिए, अगर हर कोई ये सोचने लगे तो शायद जिस आतंकवाद से हमें लड़ना पड़ रहा है वो खत्म हो जाए।

http://nitishraj30.blogspot.com

दिनेशराय द्विवेदी/Dineshrai Dwivedi said...

धर्म व्यक्तिगत आस्था का प्रश्न है। इसे सामाजिक और सामुहिक बनाने से ही सारे झगड़े खड़े होते हैं।

हिमवंत said...

जब से धर्म के नाम पर लोग संगठीत हुए। जब लोगो ने एक आदमी को उसका सन्देश देने वाला माना और कहा की उसकी शरणागती से ही मुक्ति होगी। जब धर्म और बाइबल का प्रयोग उपनिवेश(गुलाम) बनाने के लिए हुआ। जब हिसा के बल पर मजहब कबुल कराए गए। उसी क्षण यह अव्यवस्था समाज मे छा गई।

हम सब ईश्वर के पुत्र हैं, अंश है । हम सब उस परम तत्व मे समाहित हो सकते है। कोई ग्रंथ नही, कोई शरणागती नही, हमारी स्वानुभुति ही हमे उसका साक्षात्कार करा सकती है। क्या फरक पडता है भिन्न पुज पद्धति से। हमे वापस जाना होगा वैदिक युग मे। हमने सल्टा लिए थे सारे झगडे। मार्ग लिखा है उपनिषदो में। उस मार्ग प चलना होगा। एक ही सत्य को हम भिन्न भिन्न ढंग से देखते है।

निरन्तर said...

badhiya abhivyakti dhanyawad.

dr. ashok priyaranjan said...

dharm key naam per hinsa rokna bahut jaroori hai.

Udan Tashtari said...

धर्म के नाम पर यह हिंसा करना-बिल्कुल गलत बात है. अच्छी अपील!