दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Wednesday 15 October 2008

एकता की तो ......!!!

एक-एक करके पहलवान उठते गए और एकता की ऐसी-तेसी करते गए. कुछ उठे नहीं तो अपने साथ लाये पर्चे बाँट दिए जिन में पहले से ही एकता की ऐसी-तेसी कर रखी थी. कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट छापी थी:
राष्ट्रिय एकता परिषद्, जोड़ या तोड़???
http://kavya-kunj.blogspot.com/2008/10/blog-post_12.html 
राष्ट्रिय एकता परिषद् की मीटिंग में वही हुआ जो मैंने कहा था. एकता की ऐसी-तेसी कर दी सबने.

अब जरा सोचिये, यह लोग राष्ट्र के हित में ख़ुद एक नहीं हो सकते, जनता को क्या एकता के सूत्र में बांधेंगे? जनता का कितना पैसा फूंक दिया इन्होनें इस मीटिंग में पर नतीजा, एक विशाल जीरो. सच पूछिए तो जीरो भी नहीं, बल्कि उस से कहीं नीचे. क्या सिर्फ़ एक-दूसरे को गालियाँ देने के लिए बुलाई गई थी यह मीटिंग? अगर ऐसा था तो गालियाँ देना तो इन का रोज का काम है, उस के लिए सबको एक जगह इकट्ठे करने की क्या जरूरत थी? इतनी गालियाँ रोज देते हैं यह लोग कि मीडिया को इन गालिओं को रिपोर्ट करने के लिए ओवरटाइम करना पड़ता है. 

सबने बस अपनी कहानी सुनाई, दूसरे की किसी ने नहीं सुनी. क्या कभी ऐसा होता है कि केवल एक पक्ष की ही गलती होती है? क्या कभी केवल एक पक्ष का ही नुक्सान होता है? अगर मसले को सुलझाना है तो दोनों पक्षों को आत्म-मंथन करना होगा. अपनी गलती महसूस करनी होगी. दूसरे पक्ष को विश्वास दिलाना होगा. पर यहाँ तो सरकारें भी एक पक्षीय हो गई हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि राष्ट्रीय एकता परिषद् की मीटिंग में एकता की बात तो किसी ने की ही नहीं. केवल वोटों की राजनीति की बातें. मीटिंग में कुछ ऐसे भी थे जो एक्टिव राजनीतिबाज नहीं हैं पर यह तो मंजे हुए राजनीतिबाजों से भी आगे निकल गए. 

बचपन में हम लड़ पड़ते थे तो समझदार बुजुर्ग समझोता करवाते थे. हम सब अपनी गलती मानते थे और दुबारा वह गलती न करने का वादा करते थे. दूसरे पक्ष को अपनी संजीदगी का विश्वास दिलाते थे. पर अब तो लगता है कि इस देश में कोई समझदार बुजुर्ग रहा ही नहीं. कुछ लोग नासमझी कर रहे हैं. उन्हें समझाने की जगह यह लोग ख़ुद उनसे बड़ी नासमझी कर रहे हैं. नासमझी क्या कहें, अपनी गोटी फिट कर रहे हैं. अल्पसंख्यकों के नेता चर्च और मस्जिद में भड़काऊ भाषण दे रहे हैं.  अब मामला सुलझेगा तो कैसे? एक ही तरीका है. आम आदमी जो इन झगड़ों का शिकार है उसे ही अपने बचाव के लिए दूसरे पक्ष के आम आदमी से मिल जुल कर झगड़े निपटाने होंगे. कितना भी आपस में झगड़े कर लें, आम आदमी ही आम आदमी के काम आता है. 

6 comments:

COMMON MAN said...

ye bharat gazab ka

नटखट बच्चा said...

अब अमर सिंह जैसे लोग होगे तो आप क्या उम्मीद करेगे ?.

Deepak Bhanre said...

बैठक मैं खाने पीने और सुख सुबिधाओं के बात पर तो ये नेता तो एक थे बस देश और जनहित के मुद्दे पर अनेक थे . यही तो एकता मैं अनेकता है .

श्रीकांत पाराशर said...

Samjhota samjhdar log karwate hain, is baithak men aapko samjhdar koun lage? jo hain bhi ve samjhdari apne ghar ki khunti par tang kar jate hain.

राज भाटिय़ा said...

कानुन होना चहिये जो भी नेता संसद मै, या आम जगह पर गालियां देता पकडा गया , तो एक गाली का एक लाख रुपया जुरमाना, भाईया फ़िर देखो केसे गालिया देतए है???

नारदमुनि said...

sir jee koun si baithak me kaam hota hai, inka samay to aise hee tamama hota hai. ye kewal rights kee bat karte hain duty kee nahin. aapke nikat aakar bahut good best laga.