दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Monday 30 June 2008

लगता है इस बार चुनाव खूब कूड़ेदार होगा

किटी पार्टी में एक गर्मागर्म बहस चल रही थी, अगर परिवार के सब सदस्य घर की जिम्मेदारियों आपस में बराबर बाँट लें और उनका ईमानदारी से निर्वाह करें तो कोई समस्या न रहे.

आने वाले चुनाव में अध्यक्ष पद की उम्मीदवार निर्मला ने अपनी आवाज़ ऊंची करते हुए कहा, "बातें तो बहुत लोग करते हैं पर असल में काम कौन करता है? आप मेरे परिवार को लीजिये, हमने घर की सारी जिम्मेदारियां आपस में बाँट रखी हैं और पूरी ईमानदारी से उन्हें निवाहते हैं. यहाँ तक की कूड़ा फैंकने तक की जिम्मेदारी भी सबमें बंटी हुई है. हम लोग प्लास्टिक की थेलिओं में कूड़ा इकठ्ठा करते हैं और जो भी सदस्य घर से बाहर जाता है कूड़े की थेलिया अपने साथ ले जाता है और सड़क पर जहाँ मौका मिला वहां फैंक देता है."

कुछ महिलाओं ने कहा,'वाह' और कुछ ने कहा 'क्या?'.

निर्मला अपनी धुन में बोल रही थीं, "आप सब जानती हैं में एक टीचर हूँ और स्कूल की बस मुझे लेने आती है. सुबह सबसे पहले में घर से निकलती हूँ. कूड़े की थेलिया साथ लेकर निकलती हूँ और जहाँ बस खड़ी होती है वहीँ सड़क पर कूड़ा फैंक देती हूँ. मेरे पति सरकार में बड़े अफसर है, दफ्तर की कार उन्हें लेने आती है. वह कूड़े की थेलिया अपने साथ ले जाते हैं और जहाँ मौका मिला, कार रुकवा कर कूड़ा सड़क पर फैंक देते हैं."

"दफ्तर नहीं ले जाते", उर्मिला बड़बड़ाईं, वोह भी अध्यक्ष पद की उम्मीदवार हैं.

निर्मला का प्रवचन चालू था, "उसके बाद मेरा बेटा और बेटी अपने अपने कालेज जाते समय अपनी कूड़े की थेलिआं साथ ले जाते हैं और सड़क पर फैंक देते हैं. एक दिन तो कमाल हो गया. में जब सड़क पर कूड़ा फैंक रही थी तब मेरे क्लास का एक बच्चा, जो उसी बस से जाता है, कूड़े की थेलिया लेकर आया और मेरे कूड़े के पास फैंक दी. उस दिन मुझे कितनी खुशी और गर्व हुआ बता नहीं सकती".

शर्मिला, जिन्हें सब निर्मला की चमची कहते हैं, बोलीं, "हाँ यह बात तो सही है, जब बच्चे आप द्बारा स्थापित आदर्श अपनाते हैं तो खुशी और गर्व तो होता ही है".

निर्मला ने और उत्साह से अपनी बात कही, "में तो सोच रही हूँ की क्लास में एनाउंस कर दूँ कि जो बच्चा घर का कूड़ा सड़क पर फैंकेगा उसे में पाँच नंबर बोनस दूँगी इम्तहान में. भई टीचर्स की तो ड्यूटी बनती है बच्चों को अच्छी बाँतें सिखाने की".

उर्मिला फ़िर बड़बड़ाईं, "मुझे ताज्जुब है कि आप को अभी तक आदर्श टीचर का एवार्ड क्यों नहीं मिला?".

निर्मला ने उर्मिला को उपेक्षा से देखा और अपनी बात आगे बढ़ाई, "एक दिन मेरा बेटा बता रहा था कि जब वह कूड़ा सड़क पर फैंक रहा था तो उसकी जीऍफ़ ने उससे कहा,'डार्लिंग तुम बड़े कूल हो'. अब वह भी कूड़ा अपने साथ लाती है मेरे बेटे के साथ सड़क पर फैंकने के लिए. एक दिन मैंने उससे पुछा, 'इतना प्यार करता है तू उससे', उसने कहा, 'हां माम, हमने तय किया है, 'जियेंगे तो साथ, मरेंगे तो साथ, कूड़ा फेंकेंगे तो साथ', और मेरी बेटी ने तो साफ़ एलान कर दिया है, शादी करूंगी तो केवल ऐसे परिवार में जो घर का कूड़ा हमारी तरह सड़क पर फैंकते हैं".

महिलाओं की प्रतिक्रिया से ऐसा लग रहा था कि निर्मला चुनाव जरूर जीतेगी. उर्मिला को अपना दिल सिंक होता हुआ महसूस हुआ. साफ़ था की इस चुनाव का मुद्दा सड़क पर कूड़ा फैंकना बनेगा. जो जितना कूड़ा सड़क पर फैंकेगा उसे उतने ज्यादा वोट मिलेंगे. उर्मिला ने निश्चय किया कि वह घर पहुँचते ही कूड़ा सड़क पर फैंकने का काम शुरू करेगी. और वह अपना ही नहीं पड़ोसियों का कूड़ा भी इकठ्ठा करके सड़क पर फेंकेगी. "मैं भी देखती हूँ कि यह कैसे चुनाव जीतती है. कूड़े का अम्बार लगा दूँगी सड़क पर. कूड़ा ही कूड़ा कर दूँगी शहर में. अगर जरूरत पड़ी तो पास के शहरों का कूड़ा भी इंपोर्ट करूंगी", उर्मिला बड़बड़ाते हुए उठीं और घर की और चल दीं. उनके चेहरे पर एक अजीब चमक थी, महिलायें उन्हें चकित सी देख रही थीं और सोच रही थीं, लगता है इस बार चुनाव खूब कूड़ेदार होगा.

1 comment:

संजय बेंगाणी said...

बड़ी कूड़ेदारी हो गई :)