दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Friday 9 January 2009

आतंक ही आतंक

लोग उन्हें गुरूजी कहते हैं,
पर काम उनके 'भाई' जैसे हैं,
कुर्सी से बहुत प्यार हैं उन्हें,
पर कुर्सी बार-बार दगा दे जाती है,
पहले अदालत ने छीनी थी कुर्सी,
अब छीन ली जनता ने. 

बचपन में पढ़ा था,
आम बोओगे तो आम मिलेंगे,
बबूल बोओगे तो बबूल,
पर हकीकत कुछ और निकली,
बोया था हमने प्रजातंत्र,
पर उग आया कंटीला राजतंत्र. 

उन्होंने कर दी हड़ताल, 
गर्व से दिया नारा,
'जाम करेंगे देश का चक्का',
हम तुम्हारे साथ हैं बोले तेलकर्मी,
आतंक के वह साठ घंटे,
अभी भूल नहीं पाया था देश,
यह नया आतंक शुरू हो गया.

उम्र क्या होती है?
अनुभव क्या होता है?
कुर्सी पर बैठते ही,
सब कुछ आ जाता है,
उनके पिता जी चालीस के थे,
वह भी चालीस के लपेटे मैं हैं,
सही उम्र है प्रधानमंत्री बनने की.

3 comments:

कहत कबीरा...सुन भई साधो said...

achhi kavita hai.

COMMON MAN said...

लोकतन्त्र में पूरा विश्वास है, लेकिन गद्दी पुत्तर को ही मिलेगी.

राज भाटिय़ा said...

मुर्ख है जनता जो बिना सोचॆ इन के साथ चलती है, ओर फ़िर पांच साल सिसक सिसक के रोती है...