दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Wednesday 16 July 2008

रिश्वत लो कानून तुम्हारे साथ है

दिल्ली में इस साल अब तक ६० लोग ब्लू लाइन बसों के नीचे आकर जान गवां चुके हैं. सरकारी बाबुओं का कहना है कि यह पूरे सिस्टम की समस्या है, सजा देने से हल नहीं होगी. लगता है इन बाबुओं ने अखबार में वह ख़बर पढ़ ली थी जिसमें अदालत ने कहा था कि नाबालिक लड़कियों के बलात्कारियों को सजा नहीं देनी चाहिए बल्कि सुधारा जाना चाहिए.
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गुजरात में मेहसाना में स्त्री-पुरूष का अनुपात इतना गड़बड़ा गया है कि समलेंगिक पुरुषों की संख्या काफी तेजी से बढ़ रही हे. एहमदाबाद के समलेंगिक पुरुषों की मेहसाना में मांग बहुत बढ़ गई है. मेहसाना के धनी पुरूष इन को अपने यहाँ बुलाते हैं और खाने पीने की पार्टियाँ करते हैं. एक समलेंगिक के अनुसार उसे हर महीने में लगभग १० काल आती हैं. उस के ग्राहक उसे एहमदाबाद से पिक अप करते हैं और रास्ते में किसी गेस्ट हॉउस में टिक जाते हैं. इस समलेंगिक के अनुसार, एहमदाबाद में उस जैसे दर्ज़न समलेंगिक और भी हैं जो मेहसाना के ग्राहकों को एन्टरटेन करते हैं.
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केन्द्र में सरकार बचाने के लिए रिश्वत का बाज़ार गर्म हो रहा है. राजनितिक पार्टियां तरह तरह की रिश्वत मांग रही हैं. कुछ अकेले एमपी भी अपना रिश्वत का रेट बता रहे हैं. कानून इस काम में उनकी मदद कर रहा है. दस साल पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा केस में सुपीम कोर्ट ने जो फ़ैसला दिया था उसके अनुसार एमपी को रिश्वत लेने का संवैधानिक अधिकार है. बस शर्त यह है कि उसे, जैसे वोट डालने के लिए रिश्वत दी जा रही है, वह वोट उसे डालना होगा. उस समय भी कांग्रेस की सरकार थी और प्रधान मंत्री नरसिम्हाराव थे. आज भी कांग्रेस की सरकार है और प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह हैं.
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केन्द्रीय सूचना आयोग ने कहा है कि सूचना कानून के अंतर्गत राष्ट्रपति के घर के फोन नंबर, इ-मेल और मोबाइल नंबर जनता को नहीं बताये जा सकते. यह फ़ैसला एक आम नागरिक के पेटिशन पर आया जो उसने सूचना अधिकारी द्बारा यह सूचना न देने के ख़िलाफ़ दायर किया था. आयोग के अनुसार यह सूचना व्यक्तिगत सूचना के अंतर्गत आती है. सब जानते हैं कि राष्ट्रपति को यह सुविधाएं जनता के पैसे से उपलब्द्ध कराई जाती हैं. वह व्यक्तिगत कैसे हो गई? आम आदमी अपने पैसे से मोबाइल नंबर लेता है और बैंक इत्यादि उसे रात दिन फोन करके परेशान करते रहते हैं. पर उस के पैसे से राष्ट्रपति को दिए गए फोन का नंबर उसे नहीं बताया जा सकता.
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बिल्लियाँ वही करती हैं जो वह चाहती हैं.
वह आपकी बात मुश्किल से सुनती हैं.
वह न जाने कब क्या कर बैंठे.
जब आप खेलना चाहते हैं वह अकेले रहना चाहती हैं.
जब आप अकेले होना चाहते हैं वह खेलना चाहती हैं.
वह मूडी होती हैं.
वह अपने बाल हर जगह गिराती फिरती हैं.
क्या आपको यह सब पढ़ कर किसी और की याद आती है?

2 comments:

अनुराग said...

सारे लेखो को एक बार में पढ़ गया आज सतायार्थ्मित्र जी ने भी कुछ ऐसी ही बात अपने ब्लॉग में ब्यान की है ,..अब इमानदारी की परिभाषा बदल गई है .....

राकेश जैन said...

sach kaha aapne !!