दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Sunday, 22 February, 2009

खुशी चाहिए, अपने अन्दर झाँकों

एक कहावत पढ़ी थी बचपन में,
'कस्तूरी कुंडली बसे, मृग ढूंढे वन माहीं',
इसका अर्थ भी पढ़ा था, भावार्थ भी,
पर कितना समझ पाये?
आज भी तलाश रहे हैं हम,
खुशी यहाँ-वहां, इधर-उधर,
पर नहीं झांकते मन के अन्दर,
छुपा है जहाँ,
खुशी का असीमित भण्डार. 

3 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

khushi hamare man ewm vicharon mai hi chipi hai

shubhi said...

सच है कि हमने कभी अपने आत्म से संबंध नहीं बनाया। दरअसल हमारे लिए अपना साथ ही सबसे बुरा होता है लेकिन अगर हम स्वयं को सुधारें, अपने को दिव्यता से भरे अथवा कलुषता हटाकर दिव्यता प्राप्त करे तो हम भी ईश्वर के आशीर्वाद को प्राप्त कर सुखी हो सकते हैं।

COMMON MAN said...

आप ने फिर हमेशा की तरह खरी बात कह दी.