आज भ्रष्टाचार हमारे समाज और देश के लिए एक चुनौती बन गया है. पिछले कुछ दशकों में यह असाधारण रूप से बढ़ा है और हमारे जीवन के हर पहलू को आत्मसात करता जा रहा है. भष्टाचार की कमाई मानवीय संवेदनाओं को खत्म कर रही है. लोग हिंसक हो रहे हैं. जरा सी बात पर लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं. लालच इस कदर बढ़ गया है कि लोग माता-पिता, भाई-बहन का खून बहाने से भी नहीं हिचकिचाते. अब तो लोग यह कहने लगे हैं कि भ्रष्टाचार हमारे समाज से कभी दूर नहीं होगा.
इस बारे में हमें सोचना होगा. किसी असाधारण समस्या को सुलझाने के उपाय भी असाधारण होनें चाहियें. अक्सर यह असाधारण उपाय बहुत सरल होते हैं. कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर हम इस असाधारण उपाय को अपने जीवन में लागू करें तो भ्रष्टाचार की समस्या काफ़ी हद तक ख़त्म की जा सकती है.
समझने के लिए हम एक परिवार को लेते हैं, जिसमे माता, पिता, बेटा और बेटी हैं. पिता काम करते हैं और भयंकर भ्रष्टाचारी हैं. अगर मां, बेटा और बेटी यह तय करलें कि हम अपने परिवार से भ्रष्टाचार समाप्त करेंगे तो क्या करना होगा? गृहणी अपने पति भ्रष्टेश्वर से कहें कि मैं आज से भ्रष्टाचार की कमाई को हाथ नहीं लगाऊंगी. भ्रष्टाचार की कमाई से खरीदी गई किसी बस्तु का अपने घर में प्रयोग नहीं करूंगी. ऐसा ही बेटा और बेटी भी अपने पिता से कहें. श्रीमान भ्रष्टेश्वर अपनी भ्रष्टाचार की कमाई को केवल अपने ऊपर खर्च करें. उन की जो ईमानदारी की कमाई है उसे ही वह इस्तेमाल करें.
उपाय असाधारण है पर बहुत सरल है, बस इसके लिए एक मजबूत इच्छाशक्ति चाहिए. ऐशो-आराम की जो आदत हो चुकी है, उसके कारण काफ़ी परेशानी होगी. पर उस की परवाह किए बिना अपने चुने रास्ते पर चलना है.
आइये हम अपने परिवेश में भ्रष्टाचार समाप्त करने का आगाज करें.
हर व्यक्ति कवि है. अक्सर यह कवि कानों में फुसफुसाता है. कुछ सुनते हैं, कुछ नहीं सुनते. जो सुनते हैं वह शब्द दे देते हैं इस फुसफुसाहट को. एक और पुष्प खिल जाता है काव्य कुञ्ज में.
दैनिक प्रार्थना
हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो
दैनिक प्रार्थना
है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Tuesday, 10 June 2008
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