व्यक्ति दलित होता है जन्म से या कर्म से?
इतिहास बताता है यह सवाल हर युग मैं पूछा गया,
आज भी पूछा जा रहा है,
सवाल भी वही है और जवाब भी वही है,
बस बदल गए हैं पूछने और जवाब देने वाले.
पहले समाज का एक वर्ग,
साबित करने को अपनी प्रभुसत्ता,
दूसरे वर्ग को दलित कहता,
जन्म को जाति का आधार बताता,
ख़ुद को ऊंचा कह कर उन पर जुल्म करता,
धर्म और शाश्त्रों की दुहाई देता,
वर्ण व्यवस्था का ग़लत मतलब निकालता,
कुछ समाज सुधारक इसका विरोध करते,
कर्म को जति का आधार बताते,
पर उनकी आवाज हमेशा कमजोर रहती.
अब दलित कहा जाने वाला वर्ग,
जन्म को जाति का आधार बताता है,
ऊंचा वर्ग कर्म की बात करता है,
दलित होना फायदे की बात हो गई है,
दलित राष्ट्रपति हो कर भी दलित रहता है,
दलित मंत्री के बच्चे आरक्षण पर पलते हैं,
जिन्होनें बदल लिया था अपना धर्म,
वह भी दलित रह गए ऐसा कहते हैं,
दलित मैं भी नए वर्ग बन गए हैं,
'मुझे दलित मानो' इस पर आन्दोलन होता है.
मंत्री का बेटा कम नंबर लाता है,
पर पा जाता है स्कूल मैं दाखिला और नौकरी,
ब्राह्मण स्कूल मास्टर का बेटा,
ज्यादा नंबर लाकर भी बाहर रह जाता है.
समस्या वही है उंच-नीच की,
जो पहले था ऊंचा अब नीचा है.
हर व्यक्ति कवि है. अक्सर यह कवि कानों में फुसफुसाता है. कुछ सुनते हैं, कुछ नहीं सुनते. जो सुनते हैं वह शब्द दे देते हैं इस फुसफुसाहट को. एक और पुष्प खिल जाता है काव्य कुञ्ज में.
दैनिक प्रार्थना
हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो
दैनिक प्रार्थना
है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
Sunday, 17 February 2008
कानून सब के लिए बराबर है !!!

मकान तोड़ दिया उनका नगर निगम ने,
कवर कर दिया था उन्होंने बरांडा,
पड़ोसी प्रदेश की मुख्यमंत्री ने,
ढांचा ही बदल दिया सरकारी मकान का,
काफी कुछ नया बना दिया,
पर उनसे किसी ने पूछा तक नहीं,
जब अखबार मैं छपी ख़बर,
तब सरकार ने कहा हमें पता नहीं,
हमसे कोई इजाजत नहीं ली किसी ने.
अपने मकान मैं छोटा सा बदलाव,
और इतनी बड़ी सजा,
सरकारी मकान मैं तोड़ फोड़,
पर कोई सजा नहीं,
फ़िर भी यह दावा,
'कानून सब के लिए बराबर है'.
दो बेटियॉ भारत की
दो बेटियॉ भारत की,
एक एक छोर की,
दूसरी दूसरे छोर की,
एक महान,
दूसरी सबके लिए अनजान,
एक को मिलती है टॉप सिक्योरिटी,
दूसरी को जीरो सिक्योरिटी,
पहली के बारे मैं क्या कहें?
दूसरी की कहानी सुनिए.
गरीब माँ करती है काम,
सुबह से शाम,
तब जुटा पाती है दो वक्त की रोटी,
कैसी पढ़ाई, कैसी लिखाई,
तन ढकने को पूरे कपड़े नहीं,
नोचती हैं गन्दी निगाहें,
माँ रहती है परेशान,
डर लगता है बेटी अकेली है झोपड़ी मैं,
कुछ अनहोना न हो जाए,
और एक दिन हो जाता है,
वही जिसका डर था.
घुस आते हैं झोपड़ी मैं वहशी दरिंदे,
करते हैं वलात्कार,
मार डालते हैं पीट पीट कर,
कोई नहीं सुनता उसका चीत्कार,
कोई नहीं आता बचाने को,
ख़बर छपती है अखबार मैं,
एक दिन बस एक दिन.
फ़िर दूसरी ख़बर,
एक और दूसरी बेटी की.
देश की प्रथम नागरिक महिला,
देश की कर्णधार महिला,
प्रदेश की मुखिया महिला,
और ढेर सारे कानून,
पुलिस की लम्बी कतार,
सब व्यर्थ, सब बेकार.
शास्त्र कहता है,
'जहाँ होता है नारी का सम्मान,
वहाँ करते हैं देवता निवास',
मनाया होगा कंचक एक दिन,
की होगी पूजा इन बेटियोँ की,
माँ, बहन, पत्नी ने,
इन वहशी दरिंदों की,
कहाँ पहुंचे हैं हम?
कहाँ पहुंचेंगे हम?
एक एक छोर की,
दूसरी दूसरे छोर की,
एक महान,
दूसरी सबके लिए अनजान,
एक को मिलती है टॉप सिक्योरिटी,
दूसरी को जीरो सिक्योरिटी,
पहली के बारे मैं क्या कहें?
दूसरी की कहानी सुनिए.
गरीब माँ करती है काम,
सुबह से शाम,
तब जुटा पाती है दो वक्त की रोटी,
कैसी पढ़ाई, कैसी लिखाई,
तन ढकने को पूरे कपड़े नहीं,
नोचती हैं गन्दी निगाहें,
माँ रहती है परेशान,
डर लगता है बेटी अकेली है झोपड़ी मैं,
कुछ अनहोना न हो जाए,
और एक दिन हो जाता है,
वही जिसका डर था.
घुस आते हैं झोपड़ी मैं वहशी दरिंदे,
करते हैं वलात्कार,
मार डालते हैं पीट पीट कर,
कोई नहीं सुनता उसका चीत्कार,
कोई नहीं आता बचाने को,
ख़बर छपती है अखबार मैं,
एक दिन बस एक दिन.
फ़िर दूसरी ख़बर,
एक और दूसरी बेटी की.
देश की प्रथम नागरिक महिला,
देश की कर्णधार महिला,
प्रदेश की मुखिया महिला,
और ढेर सारे कानून,
पुलिस की लम्बी कतार,
सब व्यर्थ, सब बेकार.
शास्त्र कहता है,
'जहाँ होता है नारी का सम्मान,
वहाँ करते हैं देवता निवास',
मनाया होगा कंचक एक दिन,
की होगी पूजा इन बेटियोँ की,
माँ, बहन, पत्नी ने,
इन वहशी दरिंदों की,
कहाँ पहुंचे हैं हम?
कहाँ पहुंचेंगे हम?
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Saturday, 16 February 2008
एक और नया कातिल दिल्ली मैं
दिल्ली है दिल हिन्दुस्तान का,
यह कहते थे हम बड़े गर्व से,
एक शायर ने भी कहा था,
'जीना तेरी गली मैं, मरना तेरी गली मैं'
पर अब काफ़ी कुछ बदल गया है,
दिल मैं नहीं रही अब मोहब्बत,
मोहब्बत बदल गई है नफरत मैं,
गलियों मैं घूम रहें है कातिल.
अब दिल्ली मैं नहीं है कोई सुरक्षित,
न दिन मैं और न रात मैं,
न गलियों मैं और न घर मैं,
कब कौन किसे मार देगा,
कब कुचल देगी बस किस को,
कब पुलिस हवालात मैं मर जाएगा कौन,
कोई नहीं जानता.
एक और नया कातिल आया है दिल्ली मैं,
किलर बस कारीडार,
चड़ चुके हैं भेंट इसे कई नागरिक,
कल ही हुआ शिकार एक और नागरिक,
सरकार और सरकारी अधिकारी,
सत्ता के नशे मैं चूर,
जनता के पैसे से ऐयाशी मैं मगरूर,
हैं इस से अनजान,
हमारा भारत देश है महान.
यह कहते थे हम बड़े गर्व से,
एक शायर ने भी कहा था,
'जीना तेरी गली मैं, मरना तेरी गली मैं'
पर अब काफ़ी कुछ बदल गया है,
दिल मैं नहीं रही अब मोहब्बत,
मोहब्बत बदल गई है नफरत मैं,
गलियों मैं घूम रहें है कातिल.
अब दिल्ली मैं नहीं है कोई सुरक्षित,
न दिन मैं और न रात मैं,
न गलियों मैं और न घर मैं,
कब कौन किसे मार देगा,
कब कुचल देगी बस किस को,
कब पुलिस हवालात मैं मर जाएगा कौन,
कोई नहीं जानता.
एक और नया कातिल आया है दिल्ली मैं,
किलर बस कारीडार,
चड़ चुके हैं भेंट इसे कई नागरिक,
कल ही हुआ शिकार एक और नागरिक,
सरकार और सरकारी अधिकारी,
सत्ता के नशे मैं चूर,
जनता के पैसे से ऐयाशी मैं मगरूर,
हैं इस से अनजान,
हमारा भारत देश है महान.
Thursday, 7 February 2008
नकारात्मक राजनीति
उन्होंने साबित कर दिया अपने को,
नकारात्मक राजनीति का शिरमौर,
नफरत फैलाकर लोगों के बीच,
देसी परदेसी का मचाकर शोर.
'माटी के पूतों' की हित रक्षा मैं,
उन्होंने किया हिंसक आन्दोलन,
नष्ट की राष्ट्र संपत्ति,
पिटाई की बाहर वालों की,
और मार दिया,
एक माटी के पूत को.
नकारात्मक राजनीति का शिरमौर,
नफरत फैलाकर लोगों के बीच,
देसी परदेसी का मचाकर शोर.
'माटी के पूतों' की हित रक्षा मैं,
उन्होंने किया हिंसक आन्दोलन,
नष्ट की राष्ट्र संपत्ति,
पिटाई की बाहर वालों की,
और मार दिया,
एक माटी के पूत को.
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उच्च पदों पर आसीन लोग

उन्होंने भाषण देना था सो दे दिया,
उनका काम सिर्फ़ भाषण देना है,
आखिरकार वह राज्यपाल हैं.
पर भाषण मैं ऐसा कुछ कह दिया,
जो न कहते तब अच्छा रहता,
न कहने से कुछ नहीं बिगड़ता,
पर कहने से सब बिगड़ गया.
उत्तर भारत के लोग कानून तोड़ते हैं,
कानून तोड़ने मैं गर्व अनुभव करते हैं,
कानून तोड़ने पर उन्हें आपत्ति है,
पर वह ख़ुद समाज को तोड़ते हैं,
देश को तोड़ते हैं,
लोगों को बांटते हैं.
नफरत पैदा करते हैं.
उच्च पदों पर आसीन यह लोग,
अपनी जबान पर लगाम क्यों नहीं कसते?
क्यों इन पर कोई कार्यवाही नहीं होती?
स्कोर कार्ड ब्लू लाइन का
पिछले कुछ दिनों से,
महसूस कर रहा हूँ मैं,
ख़बरों मैं कुछ बदलाब आया है,
पहले जब ख़बर छपती थी,
नागरिकों पर ब्लू लाइन गुजर जाने की,
कितने मार दिए अब तक भी छपता था.
पर अब ख़बर तो छपती है,
नंबर नहीं छपते.
मैंने मीडिया से पूछा,
ऐसा क्यों है?
उन्होंने कहा, क्या करोगे जान कर?
जब छपती थी तब क्या उखाड़ लिया था,
ब्लू लाइन का?
शीला वहीं है,
उनका मंत्री वहीं है,
बस भी वहीं है,
बस का मालिक और चालक भी वहीं है,
बस नहीं है तो वह जो कुचला गया.
महसूस कर रहा हूँ मैं,
ख़बरों मैं कुछ बदलाब आया है,
पहले जब ख़बर छपती थी,
नागरिकों पर ब्लू लाइन गुजर जाने की,
कितने मार दिए अब तक भी छपता था.
पर अब ख़बर तो छपती है,
नंबर नहीं छपते.
मैंने मीडिया से पूछा,
ऐसा क्यों है?
उन्होंने कहा, क्या करोगे जान कर?
जब छपती थी तब क्या उखाड़ लिया था,
ब्लू लाइन का?
शीला वहीं है,
उनका मंत्री वहीं है,
बस भी वहीं है,
बस का मालिक और चालक भी वहीं है,
बस नहीं है तो वह जो कुचला गया.
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आम आदमी का बजट
लोकसभा के चुनाव समीप आ गए हैं,
इस से याद आया उन्हें,
रहता है इस देश मैं एक 'आम आदमी'
वित्त मंत्री गए पार्टी के दफ्तर,
मिले कार्यकर्ताओं से,
आखिरी बजट कैसा हो?
'बजट हो आम आदमी' का,
सबकी यही राय थी.
उसे हर हालत मैं करना है खुश,
जिताना है आम आदमी ने हमें,
एक बार जीत जायें,
फ़िर करना अपनी मनमानी,
खूब लगाना टैक्स,
करा देना आम आदमी को याद उसकी नानी,
पर अभी तो वह ही हमारा माई वाप है.
इस से याद आया उन्हें,
रहता है इस देश मैं एक 'आम आदमी'
वित्त मंत्री गए पार्टी के दफ्तर,
मिले कार्यकर्ताओं से,
आखिरी बजट कैसा हो?
'बजट हो आम आदमी' का,
सबकी यही राय थी.
उसे हर हालत मैं करना है खुश,
जिताना है आम आदमी ने हमें,
एक बार जीत जायें,
फ़िर करना अपनी मनमानी,
खूब लगाना टैक्स,
करा देना आम आदमी को याद उसकी नानी,
पर अभी तो वह ही हमारा माई वाप है.
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