दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Tuesday, 25 January 2011

फांसी पर लटका गणतंत्र !!!

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं दूं,
या शोक प्रकट करूं?
राजतन्त्र और परिवारतंत्र,
धकेल रहा है गणतंत्र को,
एक गहरी, अँधेरी खाई में,
छटपटा रहा है गणतंत्र,
सांस रुक गई है उस की,
भ्रष्टाचार का पोषण,
ईमानदारी का शोषण,
हिंसा का तांडव,
अहिंसा सर छुपाये डरी-डरी,
चंद वोटों के लिए,
नफरत फैलाते राक्षस,
पुलिस की छत्रछाया में,
नारी को अपमानित करते लम्पट,
टूटते परिवार, सामजिक मर्यादाएं,
प्रदूषित होते मानवीय सम्बन्ध,
हे मेरे देशवासियों,
तुम ही मार्ग दर्शन करो,
किस बात की वधाई दूं,
इस २६ जनवरी को?

Wednesday, 7 January 2009

तू पागल है क्या?

हमारे मोहल्ले का मेडिकल सेंटर,
लगा है वहां एक बोर्ड,
लिखा है जिस पर,
यहाँ नहीं होता,
गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण, 
नीचे कोने में लिखा है,
कंडीशंस एप्लाई. 

लोग उसे पागल कहते हैं,
कल उसका भाई पकड़ा गया,
अपहरण और बलात्कार के अपराध में,
वह गई जेल में उस से मिलने,
'भाई तुम ने यह क्या किया,
मैं तो थी घर में मौजूद,
तुम्हारा काम भी हो जाता,
और जेल भी नहीं होती'
भाई गुस्से से चिल्लाया,
'तू पागल है क्या?'
'नहीं मैं एक औरत हूँ,
बिल्कुल उस लड़की की तरह,
जैसे वह लड़की है बहन,
किसी भाई की, मेरी तरह'.


Sunday, 17 February 2008

दो बेटियॉ भारत की

दो बेटियॉ भारत की,
एक एक छोर की,
दूसरी दूसरे छोर की,
एक महान,
दूसरी सबके लिए अनजान,
एक को मिलती है टॉप सिक्योरिटी,
दूसरी को जीरो सिक्योरिटी,
पहली के बारे मैं क्या कहें?
दूसरी की कहानी सुनिए.

गरीब माँ करती है काम,
सुबह से शाम,
तब जुटा पाती है दो वक्त की रोटी,
कैसी पढ़ाई, कैसी लिखाई,
तन ढकने को पूरे कपड़े नहीं,
नोचती हैं गन्दी निगाहें,
माँ रहती है परेशान,
डर लगता है बेटी अकेली है झोपड़ी मैं,
कुछ अनहोना न हो जाए,
और एक दिन हो जाता है,
वही जिसका डर था.

घुस आते हैं झोपड़ी मैं वहशी दरिंदे,
करते हैं वलात्कार,
मार डालते हैं पीट पीट कर,
कोई नहीं सुनता उसका चीत्कार,
कोई नहीं आता बचाने को,
ख़बर छपती है अखबार मैं,
एक दिन बस एक दिन.
फ़िर दूसरी ख़बर,
एक और दूसरी बेटी की.

देश की प्रथम नागरिक महिला,
देश की कर्णधार महिला,
प्रदेश की मुखिया महिला,
और ढेर सारे कानून,
पुलिस की लम्बी कतार,
सब व्यर्थ, सब बेकार.

शास्त्र कहता है,
'जहाँ होता है नारी का सम्मान,
वहाँ करते हैं देवता निवास',
मनाया होगा कंचक एक दिन,
की होगी पूजा इन बेटियोँ की,
माँ, बहन, पत्नी ने,
इन वहशी दरिंदों की,
कहाँ पहुंचे हैं हम?
कहाँ पहुंचेंगे हम?