दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Thursday, 13 March 2008

प्रेम, प्यार, लव, मोहब्बत


प्रेम रूप है एक ईश्वर का
प्रेम प्रभु की पूजा है,
पाना है यदि ईश्वर को तब
मार्ग नहीं कोई दूजा है.

प्रेम मार्ग पर चले चलो तुम
सब जीवों से प्रेम करो तुम,
नफरत की आंधी आए तब
प्रेम मार्ग से नहीं डिगो तुम,
उधर छोर पर प्रभु खड़े हैं
जल्दी जल्दी कदम बढ़ाओ,
जीवन का उद्देश्य यही है
प्रभु से एक रूप हो जाओ.


'मानहु एक प्रेम का नाता'
कहा राम ने था शबरी से,
झूठे बेर प्रेम से खाए
ख़ुद चल कर उसके घर आए,
तुम भी प्रेम करो शबरी सा
मानो एक प्रेम का नाता,
जीवन प्रेम-प्रेम हो जाए
घर मैं आए जगत-विधाता.

Wednesday, 30 January 2008

मानहु एक भगति कर नाता

कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,
मानहु एक भगति कर नाता.


शबरी की कहानी रामायण के अरण्य काण्ड मैं आती है. वह भीलराज की अकेली पुत्री थी. जाति प्रथा के आधार पर वह एक निम्न जाति मैं पैदा हुई थी. विवाह मैं उनके होने वाले पति ने अनेक जानवरों को मारने के लिए मंगवाया. इससे दुखी होकर उन्होंने विवाह से इनकार कर दिया. फिर वह अपने पिता का घर त्यागकर जंगल मैं चली गई और वहाँ ऋषि मतंग के आश्रम मैं शरण ली. ऋषि मतंग ने उन्हें अपनी शिष्या स्वीकार कर लिया. इसका भारी विरोध हुआ. दूसरे ऋषि इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि किसी निम्न जाति की स्त्री को कोई ऋषि अपनी शिष्या बनाये. ऋषि मतंग ने इस विरोध की परवाह नहीं की. ऋषि समाज ने उनका वहिष्कार कर दिया और ऋषि मतंग ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया.

ऋषि मतंग जब परम धाम को जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा मैं अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखें. उन्होंने कहा कि परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं. उनके लिए कोई इंसान उच्च या निम्न जाति का नहीं है. उनके लिए सब समान हैं. फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन प्रभु राम उनके द्वार पर आयेंगे.

ऋषि मतंग के स्वर्गवास के बाद शबरी ईश्वर भजन मैं लगी रही और प्रभु राम के आने की प्रतीक्षा करती रहीं. लोग उन्हें भला बुरा कहते, उनकी हँसी उड़ाते पर वह परवाह नहीं करती. उनकी आंखें बस प्रभु राम का ही रास्ता देखती रहतीं. और एक दिन प्रभु राम उनके दरवाजे पर आ गए.

शबरी धन्य हो गयीं. उनका ध्यान और विश्वास उनके इष्टदेव को उनके द्वार तक खींच लाया. भगवान् भक्त के वश मैं हैं यह उन्होंने साबित कर दिखाया. उन्होंने प्रभु राम को अपने झूठे फल खिलाये और दयामय प्रभु ने उन्हें स्वाद लेकर खाया. फ़िर वह प्रभु के आदेशानुसार प्रभुधाम को चली गयीं.

शबरी की कहानी से क्या शिक्षा मिलती है? आइये इस पर विचार करें. कोई जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता. व्यक्ति के कर्म उसे ऊंचा या नीचा बनाते हैं. ब्राहमण परिवार मैं जन्मे ऋषि ईश्वर का दर्शन तक न कर सके पर निम्न जाति मैं जन्मीं शबरी के घर ईश्वर ख़ुद चलकर आए और झूठे फल खाए. हम किस परिवार मैं जन्म लेंगे इस पर हमारा कोई अधिकार नहीं हैं पर हम क्या कर्म करें इस पर हमारा पूरा अधिकार है. जिस काम पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं हैं वह हमारी जाति का कारण कैसे हो सकता है. व्यक्ति की जाति उसके कर्म से ही तय होती है, ऐसा भगवान् ख़ुद कहते हैं.

प्रभु राम ने शबरी को भामिनी कह कर संबोधित किया. भामिनी शब्द एक अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है. प्रभु राम ने कहा की हे भामिनी सुनो मैं केवल प्रेम के रिश्ते को मानता हूँ. तुम कौन हो, तुम किस परिवार मैं पैदा हुईं, तुम्हारी जाति क्या है, यह सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता. तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम ही मुझे तम्हारे द्वार पर लेकर आया है.

जो लोग स्त्रियों को अपशब्द कहते हैं, जाति को आधार बनाकर दूसरों के साथ ग़लत व्यवहार करते हैं, उन पर अत्याचार करते हैं, वह प्रभु राम के अपराधी हैं. यदि हम यह चाहते हैं कि प्रभु राम हमसे प्रसन्न हों तब हमें सब मनुष्यों के साथ प्रेम का रिश्ता बनाना होगा. हर इंसान मैं हमें प्रभु राम का रूप दिखाई देना चाहिए.

यात्रा नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता

जितनी उसकी व्यथा मौन हैं उतना मेरा प्रेम मुखर है

जितनी उसकी व्यथा मौन हैं उतना मेरा प्रेम मुखर है

प्रथम मिलन की मीठी यादें अब तक भूल नहीं पाया मैं
ऐसा क्या घट गया बीच मैं की हो गया पराया अब मैं
जितना दूर गई वह मुझसे उतना मन खिंच रहा उधर है

कैसे मैं विश्वास दिलाऊं प्रेम बांटने से बढ़ता है
मन का मौन मुखर हो उठता, दर्द बताने से घटता है
अन्दर अन्दर घुमड़ घुमड़ कर वह सब खोया जो बाहर है

जीवन एक अनवूझ पहेली वूझ वूझ कर हार गए सब
मृत्यु खड़ी हो जाए आकर द्वार किसी के न जाने कब?
जितने बिता प्रेम मैं पाए उतने क्षण हो गए अमर हैं

जितनी उसकी व्यथा मौन हैं उतना मेरा प्रेम मुखर है