आज एक फ़िल्म देखी, "Crazy 4". चार पागलों की कहानी है. देख कर मन में एक सवाल उठा, वास्तव में पागल कौन है, वह जो पागलखाने के अन्दर हैं या वह जो पागलखाने के बाहर हैं? अगर आप यह फ़िल्म देखेंगे तब आप भी इसी सवाल से रूबरू होंगे. कहानी के अंत में एक पागल कहता है अपने डाक्टर से, 'हमें वापस पागलखाने ले चलिए, हम इस समाज के लायक नहीं है'. डाक्टर कहती है, 'नहीं, यह समाज तुम्हारे लायक नहीं है. यहाँ हर आदमी अपने लिए जीता है और दूसरों को मारता है'. कितनी सही बात है यह.
फ़िल्म की बात करें तो यह एक अच्छी फ़िल्म है. और भी अच्छी हो जाती अगर राखी सावंत और शाहरुख़ के आईटम नंबर फ़िल्म से निकाल दिए जाते. उनका कहानी से कुछ लेना देना नहीं. राखी ने एक भद्दा नाच प्रस्तुत किया. बच्चों के साथ फ़िल्म देख रहे थे. वह कुछ मिनट बहुत शर्मिंदगी में बीते.
कहानी की प्रश्ठभूमि में राजनीतिबाजों की छत्र छाया में पलता आतंक है. एक राजनीतिबाज अपनी निजी स्वार्थसिद्धि के लिए अपनी पत्नी का अपहरण करवाता है. पर उस के रास्ते में यह चार पागल आ जाते हैं. घटनाक्रम ऐसे चलता है कि राजनीतिबाज और उसे मदद करने वाला एक भ्रष्ट पुलिस अफसर गिरफ्तार हो जाते हैं. छोटी सी कहानी है पर उसमें पागलखाने से बाहर रहने वाले नंगे हो जाते हैं.
हर व्यक्ति कवि है. अक्सर यह कवि कानों में फुसफुसाता है. कुछ सुनते हैं, कुछ नहीं सुनते. जो सुनते हैं वह शब्द दे देते हैं इस फुसफुसाहट को. एक और पुष्प खिल जाता है काव्य कुञ्ज में.
दैनिक प्रार्थना
हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो
दैनिक प्रार्थना
है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Saturday, 3 May 2008
Sunday, 2 March 2008
जनता का तंत्र या जनता पर तंत्र???

स्पीकर महोदय ने कहा,
जनता के प्रतिनिधि कर रहे हैं ओवरटाईम,
मिटाने को जनता का तंत्र भारत मैं,
कुछ अजीब लगी मुझे यह बात,
कहाँ देखा उन्होंने जनता का तंत्र?
कहते हैं पहले गुलाम था भारत,
चलता था विदेशी राजा का तंत्र,
अब कहते हैं आजाद है भारत,
क्योंकि चलता है देश मैं जनता का तंत्र,
सब जानते हैं यह एक किताबी बात है,
ग़लत है कहना 'जनता का तंत्र',
सही है कहना 'जनता पर तंत्र',
पहले था विदेशी राजा का तंत्र,
अब है देसी राजा का तंत्र,
या कहें,
देसी बनी विदेशी रानी का तंत्र,
जनता पहले भी जनता थी,
जनता आज वही जनता है,
पिटने को, मरने को,
भूख से, गोली से,
विजली और पानी का संकट,
कमर तोड़ वढ़ती महंगाई,
घर और वाहर नहीं सुरक्षित,
जुल्म पुलिस का, महंगा न्याय,
सब जनता के लिए समर्पित.
स्पीकर महोदय ने कुछ कहना था,
स्पीकर महोदय ने कुछ कह दिया,
अखबारों ने छाप दिया,
टी वी ने दिखा दिया,
बात ख़त्म हो गई.
मेरी कविता भी ख़त्म हो गई.
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चुनाव का मौसम

आखिरी बजट के साथ,
फ़िर आ गया चुनाव का मौसम,
फ़िर नजर आयेंगे नेता,
फ़िर आ गया वादों का मौसम,
आम आदमी के खास बनने का मौसम,
सड़कों के गड्ढे भरने का मौसम,
अकड़ी गर्दन झुकने का मौसम,
हाथ जोड़ कर मिलने का मौसम,
पुराने वादे भुलाने का मौसम,
नए वादे करने का मौसम,
अच्छे काम भुनाने का मौसम,
बुरे काम नकारने का मौसम,
दूसरों पर इल्जाम लगाने का मौसम,
गुंडों को जेल से छुड़ाने का मौसम,
पार्टी मैं भरती कराने का मौसम,
मन्दिर के चक्कर लगाने का मौसम,
ज्योतिषी के घर आने जाने का मौसम,
हर चुनाव क्षेत्र को कुरुक्षेत्र बनाने का मौसम,
पाण्डवों के हार जाने का मौसम,
कौरवों के जीत जाने का मौसम,
जिस जनता के कपड़े उतारे थे सबने,
उस जनता को कपड़े पहनाने का मौसम,
पार्टी के दफ्तर मैं बोली लगेगी,
किसी भी तरह टिकट पाने का मौसम,
चलो आओ हम भी लड़ें अब चुनाव,
यह है खूब खाने कमाने का मौसम.
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