दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Thursday, 20 January 2011

अधिकार और जवाबदेही

ऐसा क्यों होता है?
जिस के अधिकार जितने ज्यादा,
उतनी ही कम जवाबदेही,
प्रधानमंत्री अधिकार का मूर्तरूप हैं,
पर जवाबदेही में निराकार हैं,
कीमतें कम नहीं कर पाए,
कह दिया मैं ज्योतिषी नहीं हूँ,
बात ख़त्म हो गई,
आतंक समाप्त नहीं कर पाए,
कह दिया कुछ समस्याएं हैं,
बात ख़त्म हो गई,
भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है कि,
आम आदमी की जिंदगी नर्क हो गई है,
प्रधानमंत्री चाहते हैं,
लोग उन्हें सीजर की पत्नी मान लें.

Wednesday, 10 December 2008

आतंकवाद को जिहाद का नाम देना ग़लत है

विश्व में बहुत से आतंकवादी अपनी अमानवीय कार्यवाहियों को जिहाद का नाम देते हैं. उसे इस्लाम से जोड़ कर यह साबित करते हैं कि जो कुछ वह कर रहे हैं वह इस्लाम का तकाजा है. इस्लाम के बहुत से धार्मिक नेता इस का विरोध करते हैं. उनका कहना है कि इस्लाम इस तरह के कामों की इजाजत नहीं देता. मगर कहीं न कहीं, लोग इन आतंकिओं की बात का समर्थन कर देते हैं, उन्हें जिहादी मान कर, उन्हें जिहादी कह कर. 

जो कत्लेआम यह आतंकी कर रहे हैं वह जिहाद नहीं है. जिहाद तो इंसान अपने अन्दर छिपी बुराई के ख़िलाफ़ करता है. जिहाद एक तरह की तपस्या है, प्रायश्चित है. वह किसी के ख़िलाफ़ नहीं होता. वह सिर्फ़ बुराई के ख़िलाफ़ होता है. हम जब सच बोलते हैं, झूट के ख़िलाफ़ जिहाद करते हैं. हम जब प्रेम करते हैं, नफरत के ख़िलाफ़ जिहाद करते हैं. अहिंसा हिंसा के ख़िलाफ़ जिहाद है. ईमानदारी बेईमानी के ख़िलाफ़ जिहाद है. 

Saturday, 3 May 2008

पागल कौन है?

आज एक फ़िल्म देखी, "Crazy 4". चार पागलों की कहानी है. देख कर मन में एक सवाल उठा, वास्तव में पागल कौन है, वह जो पागलखाने के अन्दर हैं या वह जो पागलखाने के बाहर हैं? अगर आप यह फ़िल्म देखेंगे तब आप भी इसी सवाल से रूबरू होंगे. कहानी के अंत में एक पागल कहता है अपने डाक्टर से, 'हमें वापस पागलखाने ले चलिए, हम इस समाज के लायक नहीं है'. डाक्टर कहती है, 'नहीं, यह समाज तुम्हारे लायक नहीं है. यहाँ हर आदमी अपने लिए जीता है और दूसरों को मारता है'. कितनी सही बात है यह.

फ़िल्म की बात करें तो यह एक अच्छी फ़िल्म है. और भी अच्छी हो जाती अगर राखी सावंत और शाहरुख़ के आईटम नंबर फ़िल्म से निकाल दिए जाते. उनका कहानी से कुछ लेना देना नहीं. राखी ने एक भद्दा नाच प्रस्तुत किया. बच्चों के साथ फ़िल्म देख रहे थे. वह कुछ मिनट बहुत शर्मिंदगी में बीते.

कहानी की प्रश्ठभूमि में राजनीतिबाजों की छत्र छाया में पलता आतंक है. एक राजनीतिबाज अपनी निजी स्वार्थसिद्धि के लिए अपनी पत्नी का अपहरण करवाता है. पर उस के रास्ते में यह चार पागल आ जाते हैं. घटनाक्रम ऐसे चलता है कि राजनीतिबाज और उसे मदद करने वाला एक भ्रष्ट पुलिस अफसर गिरफ्तार हो जाते हैं. छोटी सी कहानी है पर उसमें पागलखाने से बाहर रहने वाले नंगे हो जाते हैं.

Friday, 1 February 2008

मैं और वह

उन्होंने कहा,
हम चुनाव लड़ रहे हैं,
मैंने कहा,
चुनाव कोई लड़ाई नहीं है,
चुनाव एक प्रक्रिया है,
जन प्रतिनिधि चुनने की.

उन्होंने कहा,
प्रदेश मैं हमारा शासन है,
मैंने कहा,
प्रदेश को शासन की नहीं,
प्रबंध की जरूरत है.

उन्होंने कहा,
अरे आप हमें पहचाने नहीं!
मैंने कहा,
लगता है आपको कहीं देखा है,
भाई हम वोट मांगने आए थे आपसे,
और अब किसलिए आयें हैं मैंने पूछा,
फ़िर से वोट मांगने,
पाँच वर्ष हो गए हैं न.

उन्होंने कहा,
हमारी सरकार आम आदमी की सरकार है,
मैंने कहा,
बहुत अच्छी बात है,
पर क्या आप जानते या पहचानते हैं,
आम आदमी को?

उन्होंने कहा,
हम धर्म-निर्पेक्क्ष हैं,
मैंने कहा,
बहुत अच्छी बात है,
पर कथनी को करनी भी बनाइये.

उन्होंने कहा,
देश को खतरा है नक्सलवादियों से,
मैंने कहा,
और धर्म पर आतंक मचाने वाले?
अरे वह तो अपने हैं.