आज सुबह जब दर्पण में मैं ख़ुद को देख रहा था,
दर्पण बोला, 'हेलो अजनबी',
चौंक गया मैं,
जीवन की संध्या बेला में,
यह कैसा अद्भुत संबोधन?
सोचा बहुत याद न आया,
मैं हूँ कौन कहाँ से आया?
पहला परिचय हुआ पिता से,
दादा दादी, भइया बहना,
परिचय घर के बाहर निकला,
उन का नाती, उन का बेटा,
बीत गया यह सारा जीवन,
इनका उनका कहते कहते,
जीवन की संघ्या बेला में,
दर्पण ने यह प्रश्न उठाया,
क्या अपना परिचय बतलाऊँ,
कैसे आज तुम्हें समझाऊँ,
भूल गई माँ, मुझको मुझसे नहीं मिलाया.
हर व्यक्ति कवि है. अक्सर यह कवि कानों में फुसफुसाता है. कुछ सुनते हैं, कुछ नहीं सुनते. जो सुनते हैं वह शब्द दे देते हैं इस फुसफुसाहट को. एक और पुष्प खिल जाता है काव्य कुञ्ज में.
दैनिक प्रार्थना
हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो
दैनिक प्रार्थना
है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
Saturday, 19 April 2008
सरबजीत की रिहाई
भारत सरकार ने फ़िर एक बार सरबजीत को माफ़ी देने के लिए पाकिस्तान सरकार से अपील की है. पाकिस्तान में अब एक नई सरकार है. सरबजीत को माफ़ी देने से पाकिस्तान की नई सरकार की भारत में और विश्व में साख बढ़ेगी कम नहीं होगी. भारत के साथ सबंध और अच्छे करने का यह एक अच्छा मौका है नई सरकार के सामने. इसे गंवाना नहीं चाहिए.भारत की जनता हर पल ईश्वर से यही प्रार्थना कर रही है कि सरबजीत को रिहा कर दिया जाए. सरबजीत के परिवार को पाकिस्तान जाने के लिए वीसा मिल गया है. यह एक आशापूर्ण कदम है. जब सरबजीत की बेटियां, पत्नी और बहन पाकिस्तान सरकार से सीधे प्रार्थना करेंगी तब यह उम्मीद की जा सकती है कि नतीजा आशाजनक निकलेगा. चुनाव के बाद पाकिस्तान में बहुत कुछ बदल गया होगा. नए माहौल में नई पाकिस्तान सरकार को सरबजीत के हक में फ़ैसला करना अब शायद उतना मुश्किल नहीं होगा.
सरबजीत अपने परिवार से जल्दी ही मिल पायेगा. ईश्वर से यही प्रार्थना है कि यह मुलाकात आखिरी न हो. वह अपने परिवार के साथ भारत अपने घर आ सके और आगे का जीवन अपने परिवार के साथ सुख के साथ बिताये.
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अशान्तिपूर्ण प्रदर्शन और भारतीय प्रजातंत्र
अशान्तिपूर्ण प्रदर्शन क्या भारतीय प्रजातंत्र की पहचान बन चुके है?भारतीय प्रजातंत्र में आम जनता के शांतिपूर्ण आग्रह का कोई असर होना बहुत पहले ही समाप्त हो चुका है. पर क्या अब महान और अत्यन्त शक्तिशाली राजनीतिबाजों को भी अपनी बात में असर लाने के लिए अशान्तिपूर्ण आग्रह ही करना होगा. राहुल गाँधी ने अपनी बात कहने के लिए अशान्तिपूर्ण आग्रह का सहारा लिया. वह अपने साथ लगभग १५० लोगों की भीढ़ लेकर झाँसी के डिप्टी कमिश्नर के घर में घुस गए और दो घंटे तक किसी को कोई काम नहीं करने दिया. यह आक्रामक तरीका उन्होंने क्यों अपनाया यह वह और उनकी पार्टी बेहतर जानते हैं, पर मेरी राय में उन्होंने अपनी बात कहने के लिए एक आदर्श स्थापित करने का मौका गवां दिया. यह एक अत्यन्त निराशाजनक बात है. एक व्यक्ति जिसे भारत के प्रधानमंत्री के रूप में विज्ञापित किया जा रहा है उस का इस तरह उत्तेजित भीढ़ को लेकर एक सरकारी अधिकारी के घर में जबरन घुस जाना एक शर्म की बात है.
कुछ कहूं में आप से राहुल जी? में एक वरिष्ट नागरिक हूँ. पंडित नेहरू से मनमोहन सिंह तक बहुत से प्रधानमंत्री देखे हैं मेने. भाई आप नए नेता बन रहे है, कुछ तो नई बात कीजिये. इस गुंडई राजनीति में कुछ तो शालीनता लाइए. आप के परिवार को हमेशा महान होने की संज्ञा दी जाती है, कुछ तो महानता दिखाइए. आप को इस तरह की हरकतें करना शोभा नहीं देता. जो लोग आप के कार्यक्रम निधारित करते हैं और उन का रूप तय करते हैं, उन को समझाइए. उनसे कहिये की आप अपनी बात पूरी शालीनता से कहेंगे. आप के सामने अभी पूरी जिन्दगी पड़ी है. प्रधानमंत्री की कुर्सी कहीं भागी नहीं जा रही.
यदि आपने अपनी कार्य प्रणाली नहीं बदली तो वह दिन दूर नहीं जब आप का आग्रह हिंसापूर्ण हो जायेगा और न जाने कितने जान माल का नुकसान होगा. आपका कोई प्रदर्शन सफल रहा या असफल रहा यह अगर इसी बात से जाना जाता है कि प्रदर्शन के दौरान कितनी हिंसा हुई, कितने ज्यादा जान माल का नुकसान हुआ तो फ़िर आप में और सड़कछाप राजनीतिबाजों में क्या फर्क रहेगा.
Thursday, 17 April 2008
प्रजातंत्र के अवांछित चेहरे
देश के बाहर प्रेसिडेंट प्रतिभा पाटिल ने लगभग खाली ब्राजील सेनेट को संबोधित किया. देश के अन्दर महंगाई पर हुई चर्चा में दोनों लोक सभा और राज्य सभा लगभग खाली रहीं. उधर ब्राजील सरकार और भारतीय दूतावास के अधिकारी सफाई देने की कोशिश कर रहे हैं. इधर भारत की जनता के प्रतिनिधि जनता को शर्मिंदा कर सीना ताने घूम रहे हैं. उधर पाटिल लातिन अमेरिकन देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए १२ दिन की यात्रा पर हैं. इधर महंगाई से परेशान जनता इस उम्मीद में है कि सरकार कुछ करेगी पर जिन लोगों को उसने लोक सभा में भेजा है वह तो जनता को सिर्फ़ शर्मिंदा ही कर पा रहे हैं.पुलिस जनता के जान और माल की रक्षा के लिए है. दिल्ली पुलिस न तो जान की रक्षा कर पा रही है और न ही माल की. आम जनता को ख़ुद पुलिस से डर लगता है. निरीह नागरिकों पर पुलिस के अत्याचार के किस्से रोज अखबारों में छपते हैं. यह समझ ही नहीं आता की पुलिस का यह महकमा बनाया क्यों गया है. रोज पुलिस को नए अधिकार दिए जाते हैं ताकि पुलिस और मुस्तेदी से आम जनता पर अत्याचार कर सके. कोई पुलिसवाला आदि किसी जेबकतरे को पकड़ लेता है तो पुलिस कमिश्नर उसे ईनाम देता है. अगर पुलिस की लापरवाही से किसी नागरिक की जान चली जाती है तो उसे कुछ नहीं कहा जाता. आज के अखबार में एक ख़बर छपी है, अगर कोई नागरिक पुलिसवाले से बहस करेगा तो उस पर तगड़ा जुर्माना किया जाएगा. आखिरकार भारत की पुलिस किसी वी आई पी से कम तो नहीं है.
सरकार रेल चलाती है. सरकार विजली और पानी बेचती है, शहर की साफ सफ़ाई की जिम्मेदारी सरकार की है. पुलिस की बात तो हम ऊपर कर ही चुके हैं. इन और अनेक सरकारी महकमों से जनता संतुष्ट नहीं है. पर कोई कुछ न कह सकता है, न कुछ कर सकता है. सरकार जैसे मर्जी काम करेगी, जब मन चाहेगा सरकार कीमतें बढ़ा देगी और निरीह जनता को यह अन्याय स्वीकार करना होगा. नागरिक पानी मानेंगे तो सरकार लाठी चलवा देगी. विजली मानेंगे तो गोली चलवा देगी. आम आदमी की सरकार का हर काम आम आदमी के ख़िलाफ़ है. फ़िर भी भारत एक मजबूत प्रजातंत्र है. बैसे एक तरह से देखा जाए तो यह सही है - प्रजा के ख़िलाफ़ तंत्र बाकई बहुत मजबूत है.
और भी बहुत से अवांछित चेहरे होंगे प्रजातंत्र के. कुछ आप भी तो दिखाइए.
मक्खनी सतह पर दलित नेता
वह नेता हैं दलितों के,
जब से नेता बने संघर्षरत हैं,
दलितों के उत्थान के लिए,
ऊंची जाति, नीची जाति,
नीची जाति में ऊंची-नीची जाति,
हर दलित बन गया एक अलग जाति,
यह महान योगदान है उनका,
भारतीय समाज को, राष्ट्र को.
वह ख़ुद भी दलित हैं,
शुरुआत उन्होंने ख़ुद से की,
खूब उत्थान किया अपना,
अब भी कर रहे हैं, करते रहेंगे,
'मक्खनी सतह' का नाम मिला उन्हें,
मक्खन खाया और चिल्लाया,
दलितों को यह दो, दलितों को वह दो,
पर अपनी जेब से उन्होंने,
किसी दलित को कुछ नहीं दिया.
एक ऐसे दलित नेता भी हैं,
जिन्होनें दलितों से ही उपहार लेकर,
अपनी तिजौरी मैं भर लिया,
जिस दलित के सर पर छत नहीं,
उस ने नेताजी को महल उपहार में दिया,
वाह रे भारत के दलित,
और वाह रे दलितों के नेता.
जब से नेता बने संघर्षरत हैं,
दलितों के उत्थान के लिए,
ऊंची जाति, नीची जाति,
नीची जाति में ऊंची-नीची जाति,
हर दलित बन गया एक अलग जाति,
यह महान योगदान है उनका,
भारतीय समाज को, राष्ट्र को.
वह ख़ुद भी दलित हैं,
शुरुआत उन्होंने ख़ुद से की,
खूब उत्थान किया अपना,
अब भी कर रहे हैं, करते रहेंगे,
'मक्खनी सतह' का नाम मिला उन्हें,
मक्खन खाया और चिल्लाया,
दलितों को यह दो, दलितों को वह दो,
पर अपनी जेब से उन्होंने,
किसी दलित को कुछ नहीं दिया.
एक ऐसे दलित नेता भी हैं,
जिन्होनें दलितों से ही उपहार लेकर,
अपनी तिजौरी मैं भर लिया,
जिस दलित के सर पर छत नहीं,
उस ने नेताजी को महल उपहार में दिया,
वाह रे भारत के दलित,
और वाह रे दलितों के नेता.
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क्या उन्हें दिखाई नहीं देता या .....
आज के अखबार मैं मुख्य प्रष्ठ पर न्यूज डाईज़ेसट मैं सात ख़बरों का सारांश है. इन सातों में से पाँच खबरें लूट-मार से संबंधित हैं. अखबार के अन्दर भी लूट-मार वाली और बहुत सी खबरें हैं. पूरे अखबार मैं तलाश करने पर भी कोई ऐसी ख़बर नहीं मिली जिसमें किसी अच्छी घटना का जिक्र हो. क्या अखबारवालों को अच्छी घटनाएं दिखाई नहीं देती या अच्छी घटनाएं घट्नी बंद हो गई हैं?
हम समाज में रहते हैं और समाज में अच्छा बुरा सब घटता है. हमारे आसपास ही अक्सर कुछ अच्छा घट जाया करता है. जो अच्छा हमें दिखाई देता है वह अखबारवालों को भी दिखाई देता होगा. तब वह उसे छापते क्यों नहीं? क्या अच्छी घटनाओं की कोई न्यूज वेल्यू नहीं है? क्या अखबार सिर्फ़ न्यूज वेल्यू के लिए हैं? या जनता अच्छी ख़बरों के बारे में जानना नहीं चाहती. यह जो कुछ भी हो रहा है वह अच्छा नहीं हो रहा है. बचपन में हमें सिखाया गया था की साहित्य समाज का दर्पण होता है. पर अब पता चला की इस दर्पण में केवल लूट-मार की घटनाएं ही दिखाई देती हैं.
मीडिया प्रजातंत्र का एक शक्तिशाली अंग है. अगर मीडिया कमजोर होगा या वह समाज के नकारात्मक रूप को ही दिखायेगा तब इस से समाज और जनता का नुकसान ही होगा.
हम समाज में रहते हैं और समाज में अच्छा बुरा सब घटता है. हमारे आसपास ही अक्सर कुछ अच्छा घट जाया करता है. जो अच्छा हमें दिखाई देता है वह अखबारवालों को भी दिखाई देता होगा. तब वह उसे छापते क्यों नहीं? क्या अच्छी घटनाओं की कोई न्यूज वेल्यू नहीं है? क्या अखबार सिर्फ़ न्यूज वेल्यू के लिए हैं? या जनता अच्छी ख़बरों के बारे में जानना नहीं चाहती. यह जो कुछ भी हो रहा है वह अच्छा नहीं हो रहा है. बचपन में हमें सिखाया गया था की साहित्य समाज का दर्पण होता है. पर अब पता चला की इस दर्पण में केवल लूट-मार की घटनाएं ही दिखाई देती हैं.
मीडिया प्रजातंत्र का एक शक्तिशाली अंग है. अगर मीडिया कमजोर होगा या वह समाज के नकारात्मक रूप को ही दिखायेगा तब इस से समाज और जनता का नुकसान ही होगा.
Wednesday, 16 April 2008
स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो
यह पंक्ति आर्य समाज हवन के बाद यज्ञ देव की आरती मैं से ली गई है. आज के समाज मैं जहाँ निजी स्वार्थ ने प्रेम का गला घोंट दिया है, यह पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण हो गई है. मनुष्य स्वभाव से थोड़ा बहुत स्वार्थी होता है. पर उसे निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरों का नुकसान नहीं करना चाहिए. निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए लोग कुछ भी ग़लत काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं. स्वार्थ पूरा न होने पर उनके मन मैं विरोधावास पैदा होता है. वह दूसरों को उस के लिए जिम्मेदार ठहराने लगते हैं. मन में बढ़ती नफरत हिंसा को जन्म देती है. आज भारतीय समाज इस हिंसा से टूट रहा है. भाई भाई का, बेटा बाप का, पड़ोसी पड़ोसी का, मित्र मित्र का, पति पत्नी का शत्रु बन गए हैं.
स्वार्थ अपने आप में बुरा नहीं हटा. स्वार्थ वही बुरा होता है जिससे किसी दूसरे का बुरा होता हो. अपना स्वार्थ पूरा हो जाने पर यदि मनुष्य उस का लाभ दूसरों को भी मिल जाने देता है तब वह स्वार्थ एक पुन्य बन जाता है. उदाहरण के तौर पर हम राजा भागीरथ का नाम ले सकते हैं. राजा भागीरथ ने गंगा जी को प्रथ्वी पर लाने के लिए कठिन तपस्या की. इसमें उनका अपना निजी स्वार्थ था - उन के पूर्वजों की मुक्ति. जब उन की स्वार्थसिद्धि हो गई और गंगा जी वापस स्वर्ग को जाने लगीं तब उन्होंने राजा से कहा - राजन मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ. जो चाहो वर मांग लो. राजा भागीरथ ने कहा - माँ आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की. ऐसी ही कृपा आप सब प्राणियों पर करती रहो. माँ ने कहा इस के लिए तो मुझे प्रथ्वी पर ही रुकना होगा. आज भी गंगा जी प्रथ्वी पर निवास करती हैं और करोड़ों लोगों पर कृपा करती हैं. आज भी राजा भागीरथ इस महान कार्य के लिय याद किए जाते हैं. कोई उनकी निजी स्वार्थसिद्धि की बात नहीं करता.
इस पंक्ति में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं की वह हमारे निजी और संकुचित स्वार्थ भाव को मिटाकर उसे दूसरों के लिए कल्याणकारी बनाएं. जब हम दूसरों के कल्याण के लिए सोचेंगे या कार्य करेंगे तब हमारा प्रेम और गहरा और विस्तृत होता जाएगा. समाज मैं सब प्रेम से मिल कर रहेंगे. हिंसा समाप्त हो जायेगी. स्वर्ग प्रथ्वी पर उतर आएगा. आइये प्रभु से प्रार्थना करें - स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो.
स्वार्थ अपने आप में बुरा नहीं हटा. स्वार्थ वही बुरा होता है जिससे किसी दूसरे का बुरा होता हो. अपना स्वार्थ पूरा हो जाने पर यदि मनुष्य उस का लाभ दूसरों को भी मिल जाने देता है तब वह स्वार्थ एक पुन्य बन जाता है. उदाहरण के तौर पर हम राजा भागीरथ का नाम ले सकते हैं. राजा भागीरथ ने गंगा जी को प्रथ्वी पर लाने के लिए कठिन तपस्या की. इसमें उनका अपना निजी स्वार्थ था - उन के पूर्वजों की मुक्ति. जब उन की स्वार्थसिद्धि हो गई और गंगा जी वापस स्वर्ग को जाने लगीं तब उन्होंने राजा से कहा - राजन मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ. जो चाहो वर मांग लो. राजा भागीरथ ने कहा - माँ आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की. ऐसी ही कृपा आप सब प्राणियों पर करती रहो. माँ ने कहा इस के लिए तो मुझे प्रथ्वी पर ही रुकना होगा. आज भी गंगा जी प्रथ्वी पर निवास करती हैं और करोड़ों लोगों पर कृपा करती हैं. आज भी राजा भागीरथ इस महान कार्य के लिय याद किए जाते हैं. कोई उनकी निजी स्वार्थसिद्धि की बात नहीं करता.
इस पंक्ति में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं की वह हमारे निजी और संकुचित स्वार्थ भाव को मिटाकर उसे दूसरों के लिए कल्याणकारी बनाएं. जब हम दूसरों के कल्याण के लिए सोचेंगे या कार्य करेंगे तब हमारा प्रेम और गहरा और विस्तृत होता जाएगा. समाज मैं सब प्रेम से मिल कर रहेंगे. हिंसा समाप्त हो जायेगी. स्वर्ग प्रथ्वी पर उतर आएगा. आइये प्रभु से प्रार्थना करें - स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो.
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क्या वह यह भी नहीं जानते?
उन्होंने पूंछा,क्या रामसेतु पूजा की जगह है?
मेरे मन मैं सवाल उठा,
क्या वह यह भी नहीं जानते?
राम से ज़ुड़ी हर जगह,
पूजा की जगह है.
क्या वह यह भी नहीं जानते?
राम से बड़ा है,
राम का नाम,
जिसे उल्टा जप कर,
बाल्मीकि हो गए थे राम.
क्या वह यह भी नहीं जानते?
बंदर और भालुओं ने,
बना दिया पुल समुन्द्र पर,
लिख कर पत्थरों पर राम का नाम,
उतर गए सब सागर पार,
करते जय जय जय श्री राम.
क्या वह यह भी नहीं जानते?
राम की अपनी एक मर्यादा है,
ऐसे सवाल उठा कर,
वह भंग करते हैं उनकी मर्यादा,
इस धर्म निरपेक्ष समाज में,
एक राम ही हैं धर्म निरपेक्ष,
क्या वह यह भी नहीं जानते?
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