दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
Showing posts with label people representatives. Show all posts
Showing posts with label people representatives. Show all posts

Friday, 12 December 2008

देश को शासक नहीं ट्रस्टी चाहिए

भारत में प्रजातंत्र है - प्रजा का तंत्र, प्रजा द्वारा, प्रजा के लिए. प्रजा अपने प्रतिनिधियों द्वारा इस तंत्र का प्रबंधन करती है. यह दुःख और निराशा की बात है कि यह प्रतिनिधि शासकों जैसा व्यवहार करते हैं. प्रजातंत्र में शासक और शासन की बात करना ग़लत है. ऐसा सोचना और व्यवहार करना उस से भी ज्यादा ग़लत है. हर राजनितिक पार्टी ऐसा अनुचित व्यवहार कर रही है. मीडिया भी यही कहता  है कि इस राज्य में इस पार्टी का शासन है और उस राज्य में उस पार्टी का. क्या जनता ने इन्हें शासन करने के लिए चुना था, या जनता के प्रतिनिधि बन कर राज्य का प्रबंधन करने के लिए? 

ब्रिटिश राज की गुलामी से मुक्त होने के बाद, भारत एक प्रजातान्त्रिक गणतंत्र बना. आज ६० वर्षों से अधिक बीत पाए पर प्रजातंत्र जैसी कोई बात नजर नहीं आती. प्रजा के प्रतिनिधियों में प्रजा के प्रति कोई बफदारी की भावना नहीं है. प्रजातंत्र के प्रति कोई बफदारी की भावना नहीं है. जिस राज्य के प्रबंधन की जिम्मेदारी इन प्रतिनिधियों को दी गई थी, उस राज्य को यह लोग लूट रहे हैं, खोखला कर रहे हैं. इनका हर सोच, हर काम, उनके अपने किए है. इनके व्यवहार में केवल भ्रष्टाचार और अनेतिकता ही दिखाई देते हैं. 

आज इस देश को शासक नहीं ट्रस्टी चाहियें. भरत जैसे ट्रस्टी. राम पिता की आज्ञा से बन गए थे. सारी अयोध्या उन्हें मनाने के लिए बन में गई पर वह आने के लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने यही कहा कि उनके वापस आने तक भरत अयोध्या का राज कार्य संभालें. उस समय अयोध्या में राजतन्त्र था. भरत राज्य करते, इस में कुछ भी अनुचित नहीं होता. पर भरत राजतन्त्र में भी इसके लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने स्वयं को राम के प्रतिनिधि के रूप में ही स्वीकार किया, और राम के वापस आने तक अयोध्या का प्रबंधन एक ट्रस्टी के रूप में किया. जैसे राम बन में रहे बैसे ही भरत नंदीग्राम में झोपड़ी बना कर रहे. 

राजतन्त्र में एक राजा वनवासी की तरह रहा. पर आज प्रजातांत्रिक भारत में प्रजा के प्रतिनिधि राजा की तरह रहते हैं. प्रजा की उन्हें कोई चिंता नहीं. कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है? कब हमारा देश इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से बाहर आएगा? कभी बाहर आएगा भी या नहीं? हे ईश्वर मेरे देश की रक्षा कर. जनता और जनता के प्रतिनिधियों को सदबुद्धि दे. 

Thursday, 17 April 2008

प्रजातंत्र के अवांछित चेहरे

देश के बाहर प्रेसिडेंट प्रतिभा पाटिल ने लगभग खाली ब्राजील सेनेट को संबोधित किया. देश के अन्दर महंगाई पर हुई चर्चा में दोनों लोक सभा और राज्य सभा लगभग खाली रहीं. उधर ब्राजील सरकार और भारतीय दूतावास के अधिकारी सफाई देने की कोशिश कर रहे हैं. इधर भारत की जनता के प्रतिनिधि जनता को शर्मिंदा कर सीना ताने घूम रहे हैं. उधर पाटिल लातिन अमेरिकन देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए १२ दिन की यात्रा पर हैं. इधर महंगाई से परेशान जनता इस उम्मीद में है कि सरकार कुछ करेगी पर जिन लोगों को उसने लोक सभा में भेजा है वह तो जनता को सिर्फ़ शर्मिंदा ही कर पा रहे हैं.

पुलिस जनता के जान और माल की रक्षा के लिए है. दिल्ली पुलिस न तो जान की रक्षा कर पा रही है और न ही माल की. आम जनता को ख़ुद पुलिस से डर लगता है. निरीह नागरिकों पर पुलिस के अत्याचार के किस्से रोज अखबारों में छपते हैं. यह समझ ही नहीं आता की पुलिस का यह महकमा बनाया क्यों गया है. रोज पुलिस को नए अधिकार दिए जाते हैं ताकि पुलिस और मुस्तेदी से आम जनता पर अत्याचार कर सके. कोई पुलिसवाला आदि किसी जेबकतरे को पकड़ लेता है तो पुलिस कमिश्नर उसे ईनाम देता है. अगर पुलिस की लापरवाही से किसी नागरिक की जान चली जाती है तो उसे कुछ नहीं कहा जाता. आज के अखबार में एक ख़बर छपी है, अगर कोई नागरिक पुलिसवाले से बहस करेगा तो उस पर तगड़ा जुर्माना किया जाएगा. आखिरकार भारत की पुलिस किसी वी आई पी से कम तो नहीं है.

सरकार रेल चलाती है. सरकार विजली और पानी बेचती है, शहर की साफ सफ़ाई की जिम्मेदारी सरकार की है. पुलिस की बात तो हम ऊपर कर ही चुके हैं. इन और अनेक सरकारी महकमों से जनता संतुष्ट नहीं है. पर कोई कुछ न कह सकता है, न कुछ कर सकता है. सरकार जैसे मर्जी काम करेगी, जब मन चाहेगा सरकार कीमतें बढ़ा देगी और निरीह जनता को यह अन्याय स्वीकार करना होगा. नागरिक पानी मानेंगे तो सरकार लाठी चलवा देगी. विजली मानेंगे तो गोली चलवा देगी. आम आदमी की सरकार का हर काम आम आदमी के ख़िलाफ़ है. फ़िर भी भारत एक मजबूत प्रजातंत्र है. बैसे एक तरह से देखा जाए तो यह सही है - प्रजा के ख़िलाफ़ तंत्र बाकई बहुत मजबूत है.

और भी बहुत से अवांछित चेहरे होंगे प्रजातंत्र के. कुछ आप भी तो दिखाइए.