भारत में प्रजातंत्र है - प्रजा का तंत्र, प्रजा द्वारा, प्रजा के लिए. प्रजा अपने प्रतिनिधियों द्वारा इस तंत्र का प्रबंधन करती है. यह दुःख और निराशा की बात है कि यह प्रतिनिधि शासकों जैसा व्यवहार करते हैं. प्रजातंत्र में शासक और शासन की बात करना ग़लत है. ऐसा सोचना और व्यवहार करना उस से भी ज्यादा ग़लत है. हर राजनितिक पार्टी ऐसा अनुचित व्यवहार कर रही है. मीडिया भी यही कहता है कि इस राज्य में इस पार्टी का शासन है और उस राज्य में उस पार्टी का. क्या जनता ने इन्हें शासन करने के लिए चुना था, या जनता के प्रतिनिधि बन कर राज्य का प्रबंधन करने के लिए?
ब्रिटिश राज की गुलामी से मुक्त होने के बाद, भारत एक प्रजातान्त्रिक गणतंत्र बना. आज ६० वर्षों से अधिक बीत पाए पर प्रजातंत्र जैसी कोई बात नजर नहीं आती. प्रजा के प्रतिनिधियों में प्रजा के प्रति कोई बफदारी की भावना नहीं है. प्रजातंत्र के प्रति कोई बफदारी की भावना नहीं है. जिस राज्य के प्रबंधन की जिम्मेदारी इन प्रतिनिधियों को दी गई थी, उस राज्य को यह लोग लूट रहे हैं, खोखला कर रहे हैं. इनका हर सोच, हर काम, उनके अपने किए है. इनके व्यवहार में केवल भ्रष्टाचार और अनेतिकता ही दिखाई देते हैं.
आज इस देश को शासक नहीं ट्रस्टी चाहियें. भरत जैसे ट्रस्टी. राम पिता की आज्ञा से बन गए थे. सारी अयोध्या उन्हें मनाने के लिए बन में गई पर वह आने के लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने यही कहा कि उनके वापस आने तक भरत अयोध्या का राज कार्य संभालें. उस समय अयोध्या में राजतन्त्र था. भरत राज्य करते, इस में कुछ भी अनुचित नहीं होता. पर भरत राजतन्त्र में भी इसके लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने स्वयं को राम के प्रतिनिधि के रूप में ही स्वीकार किया, और राम के वापस आने तक अयोध्या का प्रबंधन एक ट्रस्टी के रूप में किया. जैसे राम बन में रहे बैसे ही भरत नंदीग्राम में झोपड़ी बना कर रहे.
राजतन्त्र में एक राजा वनवासी की तरह रहा. पर आज प्रजातांत्रिक भारत में प्रजा के प्रतिनिधि राजा की तरह रहते हैं. प्रजा की उन्हें कोई चिंता नहीं. कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है? कब हमारा देश इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से बाहर आएगा? कभी बाहर आएगा भी या नहीं? हे ईश्वर मेरे देश की रक्षा कर. जनता और जनता के प्रतिनिधियों को सदबुद्धि दे.
