दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Wednesday, 16 April 2008

चमचागिरी की भर्त्सना या लगे रहो मुन्ना (अर्जुन) भाई

राहुल गाँधी को प्रधान मंत्री बनाने के अर्जुन सिंह के सुझाब को कांग्रेस आलाकमान ने चमचागिरी कहकर उस की भर्त्सना की है. यह भी कहा गया है कि ऊपर कोई जगह खाली नहीं है. जो कुछ हुआ और कहा गया वह कुछ अजीब लगता है. कांग्रेस हमेशा से चमचों की पार्टी रही है. मनमोहन जी की मंत्री परिषद् में ऐसे अनेक निकम्मे चेहरे हैं जो केवल परिवार की चमचागिरी के कारण वहाँ हैं. काबलियत यदि देखी जाती तो अब तक वह चेहरे भूतकाल का हिस्सा बन चुके होते. राष्ट्रपति चुनाव में भी इस चमचागिरी का ही बोलबाला रहा. राजनीति का धंधा करने वालों के एक नहीं अनेक चेहरे हैं. किस चेहरे से वह क्या कहते हैं इस का अनुमान लगाना अब मुश्किल नहीं रहा.

सीधी सी बात है. सब कुछ परिवार की छबि चमकाने के लिए हो रहा है. प्रियंका जेल मैं अपने पिता की कातिल से मिलने जाती हैं. कितनी महान हैं वह! मनमोहन जी राहुल से मंत्री बनने के लिए विनम्र प्रार्थना करते हैं और जबाब उनकी माता जी देती हैं. राहुल जी कितने महान हैं! मायावती के चलाये सारे तीर एक ही बार में बेकार कर दिए गए. अर्जुन की भर्त्सना के तीर ने आगे के लिए एक ब्रह्माश्त्र की रचना कर दी. महान परिवार और ज्यादा महान हो गया.

अगले चुनाव में कांग्रेस यदि जीती तब कोई भी प्रधान मंत्री बने, अर्जुन का मंत्री पद पक्का हो गया है. लगे रहो मुन्ना (अर्जुन) भाई. अब ऐसी चमचागिरी के प्रदर्शन और भी होंगें. देखते जाइये.

Monday, 14 April 2008

मनमोहन ने पीठ ठोंकी शीला की

कुछ दिन पहले एक उद्घाटन समारोह में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित की पीठ खूब थपथपाई. उनके अनुसार दिल्ली भारत का सब से साफ-सुथरा, हरा-भरा और अति सुंदर शहर है. इसके लिए उन्होंने धन्यवाद किया शीला दीक्षित का क्योंकि शीला जी ने ऐसा दिल्ली शहर उन्हें रहने के लिए दिया है. मैंने यह ख़बर पढ़ी तो पहले लगा कि यह कोई चुटकुला है. फ़िर सोचा प्रधान मंत्री कभी कभी ऐसी बातें करते तो हैं पर एक सार्वजनिक समारोह मैं एक चुटकुला तो नहीं सुनायेंगे. फ़िर सोचा सही तो है. प्रधान मंत्री जिस दिल्ली में रहते हैं वह तो वास्तव में साफ-सुथरा, हरा-भरा और अति सुंदर शहर है. वह कभी मेरी दिल्ली में तो आए नहीं.

फ़िर सोचा कि हो सकता है पिछले कुछ घंटों में मेरी दिल्ली भी शीला जी की मेहरबानी से हरी-भरी, साफ-सुथरी और अति सुंदर हो गई हो. तुरंत मैं घर से बाहर निकला और मेन रोड पर पहुँचा. कुछ नया नजर नहीं आया. जो है वह आप भी देखिये.






























लेकिन यह तो वास्तव में एक चुटकुला ही हो गया. दिल्ली की मुख्य मंत्री और भारत के प्रधान मंत्री उस दिल्ली को जानते ही नहीं जहाँ मेरे जैसे आम आदमी रहते हैं, और इन की सरकार यह कहती है की वह आम आदमी की सरकार है.

Sunday, 13 April 2008

नकारात्मक मानसिकता

'हिन्दू' शब्द से संबंधित किसी भी विचारधारा की खिलाफत करना एक फैशन हो गया है. अपने आप को महान साबित करने का यह एक आसान तरीका बन गया है. मुसलमान और इसाईओं द्वारा हिन्दू धर्म को बुरा भला कहना उन के धर्म का एक हिस्सा मान कर उन की तारीफ़ की जाती है. जब हिन्दू धर्म के लोग ही हिन्दू धर्म पर आघात करते हैं तब उन्हें तरक्कीशुदा कहा जाता है. किसी ने अगर हिन्दी भाषा और हिन्दू राष्ट्र की बात कर दी तब तो भारत, भारत का संबिधान, भारत की छबि सब खतरे मैं पड़ जाती हैं. सब चिल्लाने लगते हैं. यहाँ तक की सीमापार वफादारी रखने वाले भी राष्ट्रिय अस्मिता की बात करने लगते हैं.

मेरे विचार में यह नकारात्मक मानसिकता का एक रूप है. हिन्दू होना कोई अपराध नहीं है. हिन्दू को राष्ट्रवादी होना कोई अपराध नहीं है. बल्कि राष्ट्रवादी न होना एक अपराध है. दूसरी बात यह है कि कोई राष्ट्र हिन्दू या मुसलमान या सिख या इसाई नहीं होता. यदि कोई हिन्दू राष्ट्र की बात करता है तो उसे हिन्दू राष्ट्रवाद का नाम देना ग़लत है. ऐसा ज्यादातर वह लोग करते हैं जिनकी वफादारी सिर्फ़ सत्ता से है और जो सत्ता के लिए कुछ भी ग़लत कर सकते हैं या वह लोग जिन की वफादारी सीमापार से ज़ुड़ी है. यह भारत का दुर्भाग्य है कि आज ऐसे लोग ही सत्ता में हैं. राष्ट्रवादियों का अपमान करना राष्ट्र का अपमान करना है. यह ऐसा अपराध है जिसे माँ भारती कभी माफ़ नहीं करेगी.

भारत के निर्माण के लिए इस नकारात्मक मानसिकता को बदलना होगा.

Saturday, 12 April 2008

सत्ता का नशा

कीमतें आसमान छू रही हैं,
कमर तोड़ दी है महंगाई ने,
पार्टी हाई कमान घबरा गई है,
विरोधी पक्ष खूंखार हो रहा है,
पर जब उनसे पूंछा गया,
तो नमक छिड़क दिया उन्होंने जख्मों पर,
तरक्की करती अर्थव्यवस्था मैं,
कीमतें तो बढ़ेंगी ही,
और कोई खास तो नहीं बढ़ी हैं कीमतें,
व्यर्थ ही चिल्ला रहे हैं.

लगता है सत्ता का नशा,
सर चढ़ गया है.
कुछ दिन पहले जो तारीफ़ हुई थी,
प्रधान मंत्री के मुखारविंद से,
उसने और सर चढ़ा दिया लगता है,
प्याज पर बदल गई थी सरकार,
यहाँ तो हर चीज पहुँच के बाहर हो गई है,
आम जनता का आक्रोश,
और उन का घमंड,
देखें कौन जीतता है?

भारतीय संविधान और संवेधानिक संस्थाए

भारतीय संविधान मैं जितनी संवेधानिक संस्थाएं हैं उनमें सबसे अधिक अधिकार विधायिका को दिए गए हैं. यह एक बिडम्बना ही है की इस संस्था के सदस्यों के लिए कोई भी शेक्षणिक, चारित्रिक, व्यावहारिक योग्यता का प्रावधान नहीं किया गया. अन्य सभी संस्थाओं के लिए योग्यता की लम्बी लिस्ट बनाईं गई है. इस का कारण शायद यह है कि संविधान की रचना ख़ुद विधायिका ने की. 'अँधा बांटे रेबड़ी अपने अपनों को दे' कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो गई है यहाँ.

केवल एक अनपढ़ ही नहीं, एक अपराधी भी विधायिका का सदस्य बन सकता है. जो स्वयम कानून का सम्मान नहीं करता वह विधायिका का सदस्य बन कर कानून बनाने का अधिकारी हो जाता है. जो आज जेल मैं है वह कल छूटकर मंत्री बन सकता है. जिस कानून को समझने के लिए कई डिग्रियाँ लेनी पड़ती हैं उसे बनाने का अधिकार जिन्हें दिया गया है उन में अंगूठा-टेक भी हो सकते हैं. विधायिका का सदस्य बनते ही आज का अपराधी कल का मान्यवर हो जाता है. कल तक पुलिस जिसकी पिटाई करती थी आज उस के विधायिका का सदस्य बन जाने पर उसे सुरक्षा प्रदान करती है. आज तक जो बस मैं सफर करता था, विधायिका का सदस्य बनते ही कई कारों का मालिक बन जाता है. उसके चारों और पैसा ही पैसा नज़र आता है. मतलब यह कि विधायिका का सदस्य बनते ही व्यक्ति अपने आप मैं एक महान शक्तिशाली शासक बन जाता है, जिसे कोई छू भी नहीं सकता. पर जो किसी को भी कुछ भी कह या कर सकता है. जिस जनता के वोट से उसे यह अधिकार मिलते हैं उस जनता का वह राजा बन जाता है और उस पर निष्कंटक शासन करता है.

विधायिका और दूसरी संवेधानिक संस्थायों के बीच मैं जो खींचतान चल रही है वह अत्यन्त शर्मनाक है. क्या भारतीय संविधान एक अभिशाप बन गया है? क्या इन समस्याओं का कोई निदान नहीं है? चुनाव आयोग और न्यायपालिका कोशिश कर के भी इन पर लगाम नहीं लगा पा रही हैं. बल्कि उन पर ही चोट की जा रही है. भारतीय संविधान ने वोट की ताकत पर जो यह शक्तिशाली और निष्कंटक विधायिका बनाई है वह कहीं भारतीय प्रजातंत्र का ही गला न घोट दे, अब यह डर भी लगने लगा है.

जाति ईश्वर का विधान नहीं है

भारतीय समाज में जति हमेशा से चर्चा का विषय रही है और आगे भी रहेगी. जति क्या है और सामाजिक जीवन मैं उसका क्या महत्त्व है? मैं हमेशा से यह विश्वास करता हूँ कि जाति एक सामाजिक व्यवस्था है, उस का किसी धर्म या परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं है. मनुष्य एक परिवार मैं जन्म लेता है. उस परिवार का एक धर्म होता है. यह धर्म उस मनुष्य की पहचान होती है. यह धर्म उस के साथ इस संसार मैं आता है और उस के साथ इस संसार से जाता है. मनुष्य की और जितनी पहचान हैं वह सब इस संसार मैं आकर उस के साथ जुड़ती हैं. जाति भी मनुष्य की एक ऐसी पहचान है जो ईश्वर ने उसे नहीं दी पर समाज ने उस के साथ जोड़ दी.

जाति मनुष्य के कर्म की और इंगित करती है. उसे जन्म से जोड़ना ग़लत है. हम जाति शब्द की जगह कोई और शब्द भी प्रयोग कर सकते हैं. जाति के नाम पर जो ग़लत बातें हो रही हैं उन के लिए धर्म को दोषी ठहराना ग़लत है. धर्म का जाति से कुछ लेना देना नहीं है. जातिगत व्यवस्था मैं कोई बुराई नहीं है. बुराई है जाति को आधार बनाकर दूसरों से अपने को ऊंचा साबित करना. जाति को धर्म से जोड़ कर समाज को वर्गों मैं विभाजित करना, उन वर्गों को आपस मैं लड़वाना और इस सब को ईश्वर का विधान बताना, यह ग़लत है.

जाति को लोगों ने पहले भी अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए प्रयोग किया है और आज भी कर रहें हैं. समस्या वहीं की वहीं है, सिर्फ़ लोगों के रोल बदल गए हैं. पहले तथाकथित ऊंची जाति वाले जाति के बीच मैं धर्म और भगवान् को लाकर अपनी स्वार्थसिद्धि करते थे, और अब तथाकथित नीची जाति वाले आरक्षण के आधार पर अपनी स्वार्थसिद्धि कर रहे हैं. रोज नए वर्ग बन रहें हैं. आरक्षण पा सकें इस के लिए आन्दोलन हो रहे हैं. दलित राष्ट्रपति बन कर भी दलित ही रहता है. जो पहले जाति को जन्म से ज़ोड़ने के ख़िलाफ़ थे अब वही लोग जाति से जन्म को जोड़ रहे हैं. और जो लोग जाति से जन्म को जोड़ते रहे हैं वह अब जाति से जन्म को जोड़ने के ख़िलाफ़ हैं. इसलिए किस को दोष दिया जाए?

जितने बिता प्रेम में पाए उतने क्षंण हो गए अमर हैं

जितनी उस की व्यथा मौन है,
उतना मेरा प्रेम मुखर है.

प्रथम प्रेम की मीठी यादें,
अब तक भूल नहीं पाया मैं,
ऐसा क्या हो गया बीच में,
कि हो गया पराया अब मैं,
जितना दूर गई वह मुझसे,
उतना मन खींच रहा उधर है.

कैसे मैं विश्वास दिलाऊं,
प्रेम बांटने से बढ़ता है,
मन का मौन मुखर हो उठता,
दर्द बताने से घटता है,
जितना आप छुपाया अन्दर,
उतना खोया जो बाहर है.

जीवन एक अनबूझ पहेली,
बूझ बूझ कर हार गए सब,
मृत्यु खड़ी हो जाए आ कर,
द्वार किसी के न जाने कब?
जितने बिता प्रेम में पाए,
उतने क्षंण हो गए अमर हैं.

Friday, 11 April 2008

ग़लत रास्ते पर एक और कदम

आज ख़बर पढ़ी अखबार मैं,
ओबीसी २७ प्रतिशत,
कोटे के हक़दार बनेंगे,
ऊंचे शिक्षा संस्थानों में,
वह प्रवेश अब पा जायेंगे,
योग्यता के मापदंड,
उन पर लागू नहीं हो पाएंगे.

ग़लत रास्ते पर एक और कदम,
आगे बढ़ गए हम,
कब मानेंगे अपनी गलती,
और रुकेंगे आगे बढ़ना,
वापस आकर फ़िर सोचेंगे,
और खोजेंगे नया रास्ता.

वोटों की राजनीति खेलना,
नए नए वर्गों मैं बाँट कर,
जनता मैं नफरत फैलाना,
जाति का चक्रव्यूह बना कर,
आरक्षण का वाण चलाकर,
जनता को अन्दर ले जा कर.
अभिमन्यु सा मार गिराना,
वोट बना कर इंसानों को,
मत पेटी मैं बंद कराना,
पिछले छह दशकों मैं हमनें,
मात्र यही सीखा है भाई.