दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Sunday, 16 August 2009

राष्ट्रपति ने चाय पिलाई

राष्ट्र ने मनाया स्वतंत्रता दिवस,
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री,
राज्यपाल और मुख्यमंत्री,
सबने औपचारिकता निभाई,
आम आदमी को भाषण सुना कर,
आम आदमी ने भी निभाई,
यह सारे भाषण सुन कर.

भाषण सुनने का और सुनाने का,
सुन सुना कर तुरत भूल जाने का,
अनवरत चल रहा है,
सिलसिला इस राष्ट्रीय बीमारी का,
अजीब सी बीमारी है,
क्या भाषण दिया भूल जाते हैं,
पर भाषण देना नहीं भूलते.

शाम को राष्ट्रपति ने चाय पिलाई,
देश के गणमान्य लोगों को,
हर बार की तरह इस बार भी,
हमें नहीं बुलाया,
इंतज़ार करते करते हो गए हम,
आम आदमी से वारिष्ट आम आदमी,
पर गणमान्य नहीं बन पाए,
कल्लू मवाली गया था चाय पीने,
पिछला लोक सभा चुनाव जीत कर,
बन गया था वह गणमान्य.

Thursday, 21 August 2008

इस देश में सब असंतुष्ट हैं

शायद भारत ही एक ऐसा देश होगा जिस में भारत की प्रथम नागरिक से लेकर लाइन में सबसे पीछे खड़े आम नागरिक तक सब असंतुष्ट हैं. प्रथम नागरिक ने तो अपना असन्तोष प्रकट कर दिया अपने भाषण में जो उन्होंने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर दिया. प्रधान मंत्री ने लाल किले की प्राचीर से अपना असंतोष प्रकट किया. यह लोग दूसरों से कहते हैं कि वह इनका असंतोष दूर करने के लिए काम करें. यह ख़ुद कुछ नहीं करते. यह इतना भी भी नहीं सोचते कि कुछ लोग इन के कामों से असंतुष्ट हो सकते हैं.

अभी पिछले कुछ दिनों में कुछ और लोगों ने भी असंतोष प्रकट करने की परम्परा निभाई. भारत सरकार में रेल मंत्री लालू प्रसाद ने सिमी पर भारत सरकार द्बारा पाबंदी लगाने पर असंतोष प्रकट किया. अब ऐसा कहते हुए इन्होनें यह भी नहीं सोचा कि यह ख़ुद भी इस पाबंदी के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि यह उसी सरकार में मंत्री हैं. अगर पाबंदी ग़लत है तो यह सरकार में क्या कर रहे हैं? शराफत तो यह होती कि यह सरकार से इस्तीफा देते और सिमी में शामिल हो जाते. पर यह तो राजनीतिबाज हैं और राजनीति का शराफत से क्या लेना देना? इन की देखा देखी राम विलास पासवान और मुलायम सिंह ने भी सिमी की पाबंदी पर असंतोष प्रकट कर दिया. सिमी मुसलमानों का संगठन है और यह मुसलमानों के हमदर्द होने का नाटक करते हैं, इस लिए देश को एक तरफ़ करके इन्हें आतंकवाद का साथ देना जरूरी हो गया. इनकी इस हरकत से बहुत से आम नागरिक असंतुष्ट हैं, पर मीडिया उन के असंतोष को नहीं छापेगा.

शबाना आजमी एक अच्छी कलाकार हैं. उनके पति एक अच्छे शायर हैं. भारत के नागरिक उनकी बहुत इज्जत करते हैं, या यह कहिये कि उन्हें सर आंखों पर विठाते हैं. अभी पता लगा कि शबाना जी भी असंतुष्ट हैं और वह भी भारतीय प्रजातंत्र से. इन्हें असंतोष है कि भारतीय प्रजातंत्र मुसलमानों के ख़िलाफ़ है. मुंबई में एक मकान न मिलने पर यह इतनी असंतुष्ट हो गईं कि भारतीय प्रजातंत्र पर ही तोहमत लगा दी. एक असंतुष्ट अजहरुद्दीन थे जिन्होनें यह तोहमत दी थी कि उन्हें मुसलमान होने के कारण मेच फिक्सिंग में फंसाया गया.

अगर व्यक्तिगत असंतुष्टि कि बात की जाय तो लिस्ट बहुत लम्बी है. करात मनमोहन सिंह से असंतुष्ट हैं और सोमनाथ करात से. मायावती केन्द्र सरकार से असंतुष्ट हैं. मुलायम मायावती से असंतुष्ट है. आम नागरिक इन सबसे असंतुष्ट है. दिल्ली वाले शीला दीक्षित से असंतुष्ट हैं. कश्मीरी भारत से असंतुष्ट हैं. भारतीय नागरिक कश्मीरियों के अलगाववादी नेताओं से असंतुष्ट हैं. जम्मू वाले सरकार की मुस्लिमपरस्त नीतिओं से असंतुष्ट हैं. राज ठाकरे यूपी और बिहार वालों से असंतुष्ट हैं. मतलब यह कि असंतुष्ट होना तो एक तरह से राष्ट्रिय कर्तव्य हो गया है. सब अपना राष्ट्रिय कर्तव्य निभा रहे हैं.

में उन ब्लागर्स से असंतुष्ट हूँ जो मेरे ब्लाग पर तो आते हैं पर कमेन्ट पोस्ट नहीं करते. में चोखेरवालिओं की हर समय पुरुषों को कोसने की आदत से असंतुष्ट हूँ तो चोखेरवालियां इस बात पर मुझसे असंतुष्ट हैं कि में उन की हाँ में हाँ नहीं मिलाता. मेरे अपार्टमेंट्स के कुछ लोग इस बात पर मुझसे असंतुष्ट हैं कि में उनके द्वारा फैंके गए कचरे की फोटो खींच कर अपने ब्लाग पर पोस्ट कर देता हूँ. मन्दिर के पुजारी इस बात पर असंतुष्ट हैं कि मन्दिर प्रशासन उन्हें मोबाइल खरीद कर नहीं देता. अगर भारत के नागरिकों कि असंतुष्टि के बारे में विस्तार से लिखा जाय तो कई महाकाव्य बन सकते हैं. फिलहाल तो यह पोस्ट यहीं समाप्त करता हूँ.

Monday, 12 May 2008

दरबाजा दिखाओ इन मंत्रियों को

भारत के प्रथम मनोनीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मंत्री परिषद् में ऐसे अनेक मंत्री हैं जिन्हें वहाँ नहीं होना चाहिए. कांग्रेस पार्टी ने सरकार बनाईं. परिवार के बफादारों को कुर्सी दी गई. जो चुनाव में हार गए थे उन्हें भी मंत्री बना दिया गया. समर्थक दलों ने जो समर्थन दिया उस की कीमत बसूल की उन्होंने. बाहर से एक सरकार पर अन्दर से कई सरकारें.

आइये बात करें स्वास्थ्य मंत्री अम्बुमानी रामादोस की. यह सज्जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ नहीं कर पाये. बस फिल्मों में धूम्रपान और शराब पीने के पीछे पड़े रहे. असली जिन्दगी में क्या हो रहा है उसके बारे में उन्हें कुछ पता नहीं. एक ग्लोबल रिपोर्ट कार्ड के अनुसार भारत में ५३ प्रतिशत से ऊपर बच्चों को प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध नहीं है. प्रति वर्ष दस लाख बच्चे एक वर्ष पूरा होने से पहले ही मर जाते हैं. पर यह सज्जन एम्स के निदेशक के पीछे लगे रहे. अपनी इस व्यक्तिगत दुश्मनी में, समर्थन का दबाब दाल कर इन्होनें सरकार को भी शामिल कर लिया. सरकार ने सदन में बहुमत का ग़लत इस्तेमाल करके एम्स के कानून में ऐसा संशोधन करवा दिया जिस से एम्स के निदेशक को तुरंत नौकरी से निकाला जा सके. इस संशोधन पर राष्ट्रपति के तुरंत हस्ताक्षर करवाए गए और एम्स के निदेशक को तुरंत दरबाजा दिखा दिया गया. न तो इस मंत्री ने और न ही सरकार, सदन, राष्ट्रपति ने इस बात की चिंता की की सुप्रीम कोर्ट ने एम्स के निदेशक की याचिका स्वीकार कर ली है और एक तारीख भी तय कर दी है मुकदमा सुनने के लिए. अब सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को नाजायज करार दे दिया है. एम्स के निदेशक फ़िर अपने पद पर आ गए हैं. एक मंत्री की व्यक्तिगत दुश्मनी ने सरकार, सदन और राष्ट्रपति सबको शर्मिंदा किया है (मैं ऐसा मान रहा हूँ, पता नहीं इनमें से कोई शर्मिंदा हुआ भी है या नहीं).

क्यों नहीं ऐसे मंत्रियों को दरबाजा दिखाया जाता? क्या इन के बिना देश नहीं चल सकता? क्या किया है इन्होने देश और जनता के लिए? एक एम्स था उसे ख़त्म करने में सारी ताकत लगा दी. और जो नए एम्स खोले जाने थे उस प्लानिंग का तो पता नहीं क्या हुआ?