मैं जानता हूँ कि तुम्हारे अन्दर कोई शर्म बाकी नहीं है, पर एक कहावत है, 'चुल्लू भर पानी में डूब मरो', इसलिए मैंने अपनी पोस्ट का शीर्षक यह रख दिया. बुरा मत मानना. तुम भी जानते हो और मैं भी जानता हूँ कि तुम डूब कर मरने वाले नहीं, तुम तो इस देश को डुबाने के लिए अवतरित हुए हो.
६० घंटे तक मुंबई में मौत का तांडव चलता रहा, सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए, विदेशी मेहमान मारे गए, पुलिस के कई अफसर और जवान मारे गए, एनएसजी के दो जांबाज शहीद हो गए. तुमने क्या किया? जनता ने मुंबई को तुम्हारे हवाले किया था. तुम मुख्यमंत्री बने, उपमुख्यमंत्री बने, मेयर बने, जनता के पैसे पर ऐयाशी की, कहाँ थे तुम जब जनता के ऊपर मौत मंडरा रही थी? जब सब शांत हो गया तो तुमने प्रेस को बुलाकर कहा कि मुम्बई जैसे बड़े शहर में ऐसी छोटी घटनाएं हो जाया करती हैं. क्या मैंने ग़लत कहा कि 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '.
तुमने कहा था मुंबई महा-मानुसों का है. बाहर वाले यहाँ क्या कर रहे हैं? तुमने उन पर हमले करवाए. तुम्हारे वीर महा-सैनिकों ने उन्हें ऐसे ही मारा जैसे आतंकवादियों ने इन ६० घंटों में निर्दोषों को मारा. कहाँ थे तुम इस दौरान, और तुम्हारे महा-सैनिक? जब यह बाहर वाले अपनी जान की बाजी लगाकर तुम्हारे मुंबई को और इन निर्दोषों को बचा रहे थे, किस बिल में जा छुपे थे तुम और तुम्हारे वीर महा-सैनिक? तुमने क्यों यह फरमान नहीं जारी किया कि 'कोई बाहर वाला मुंबई और इन्हें बचाने नहीं आएगा क्योंकि यह जिम्मेदारी हमारी है'. कहाँ थे तुम और क्या हुआ तुम्हारी जिम्मेदारी का? क्या मैंने ग़लत कहा कि 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '.
तुम्हारे बारे में क्या कहूं? बस एक बार फ़िर दोहराता हूँ कि है जनता द्वारा हराए गए, पर एक परिवार की बफादारी के बदले में सारे देश पर ग्रह मंत्री के रूप में थोप दिए गए तुम, 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '.
आप तो प्रधानमन्त्री हैं, भले ही एक परिवार द्वारा मनोनीत किए गए. प्रधानमन्त्री तो सारे देश का होता है. परिवार को एहसान का बदला दो पर देश के लिए भी कुछ करो. इस देश के प्रति और इस देश की जनता के प्रति भी आपकी कुछ जिम्मेदारी है. पाँच साल हो गए, अब चलते-चलते तो उसे निभा जाओ. मुंबई में मौत बरस रही थी, आपने देशवासियों को संबोधित किया, पर किसी को भरोसा नहीं दे पाये. यह संबोधन होना या न-होना एक बराबर रहा. क्या प्रधानमन्त्री ऐसा होना चाहिये? आज सर्व-दलीय मीटिंग कर रहे हैं आप. आज तो कुछ कर डालिए, या आपके लिए भी यही कहना होगा - 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '?
सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए, पर आप सब वोट की राजनीति करने में लगे गुए हैं. किसी भी पार्टी के हों पर काम सब के एक जैसे हैं - जनता को, देश को, समाज को एक बस्तु की तरह बेच कर अपनी जेबें भरना. आज जनता गुस्से से जल रही है, कहीं ऐसा न हो कि यह आग बाहर आ जाए. तुम राजनीतिबाज इस देश की जरूरत हो ऐसा साबित करो, कहीं ऐसा न हो कि जनता तुम्हें गैर-जरूरी मान कर कचरे के डब्बे में फैंक दे? कुछ करो वरना 'डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है '.
कौन जिम्मेदार है इस देश की, इस देश की जनता की सुरक्षा के लिए? अपनी जिम्मेदारी समझो, उसे पूरा करो, वरना डूब मरो अगर कुछ शर्म बाकी है .