समय कितनी जल्दी गुजर जाता है. प्यार में तो और भी जल्दी गुजर जाता है. लगता है कल ही की तो बात है. विवाह के पवित्र बन्धन में बंधे थे हम. अपने आप में नारी और पुरूष दोनों अपूर्ण होते हैं. विवाह के माध्यम से दोनों मिलते हैं और एक पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण होता है. जितना प्यार उतनी पूर्णता. मिलन जितना पगता गया प्यार उतना ही प्रगाढ़ होता गया. जीवन के अभाव मिल कर झेले और सुविधाओं का मिल कर उपभोग किया. कोई शिकायत नहीं बस प्यार ही प्यार. नौकरी में थे इस लिए संयुक्त परिवार से अलग रहे पर जड़ें वहीं जमी रही. आज बच्चों के साथ मिल कर हवन किया और ईश्वर से प्रार्थना की कि जो कृपा हम पर अब तक बनी रही है, आगे भी बनी रहे. इतने वर्षों बाद आज मन हो आया कुछ लिखने का.
नारी और पुरूष का पहला कर्तव्य है स्रष्टि चक्र को आगे बढ़ाना. ईश्वर की कृपा से हम ने यह कर्तव्य पूरा किया. दो पुत्र दिए हम ने समाज को. पुत्री की कमी हमेशा महसूस हुई. दोनों पुत्रों के विवाह से वह कमी भी पूरी हो गई. दो पुत्रियां आ गई घर में. फ़िर आईं दो पोतियाँ. मन और घर का हर कोना भर गया. हमारा अपना संयुक्त परिवार है. परस्पर प्यार, सम्मान और मिल जुल कर रहने की भावना यही हमारा धन है. समाज को जो दे सकते थे दिया, और जो दे सकते हैं देते रहेंगे.
आज समाज में जो नफरत और हिंसा फ़ैल रही है उस से मन दुखता है. संयुक्त परिवारों को टूटते देख मन में कसक होती है. इंसान का जरा सी बात पर हिंसक हो उठना और दूसरों के जान-माल की हानि कर देना, अक्सर मन में डर पैदा करता है. मंदिरों में भीढ़ बढ़ रही है पर इंसान ईश्वर से दूर जा रहा है. हमारी पीढ़ी ने बहुत कुछ बहुत तेजी से बदलते देखा है. आज हवन के बाद की प्रार्थना की कुछ पंक्तियाँ हिम्मत बंधा गईं.
स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो,
भावना मिट जाए मन से पाप अत्याचार की,
वायु जल सर्वत्र हों शुभ गंध को धारण किए.
हर व्यक्ति कवि है. अक्सर यह कवि कानों में फुसफुसाता है. कुछ सुनते हैं, कुछ नहीं सुनते. जो सुनते हैं वह शब्द दे देते हैं इस फुसफुसाहट को. एक और पुष्प खिल जाता है काव्य कुञ्ज में.
दैनिक प्रार्थना
हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो
दैनिक प्रार्थना
है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
Saturday, 3 May 2008
अढ़तीस साल पहले का वह प्यार भरा दिन
Labels:
complimentary,
eternal love,
god,
hate,
marriage,
men,
violence,
women
Friday, 2 May 2008
बावनखेड़ी नरसंहार
उत्तर प्रदेश में जे पी नगर जिला मुख्यालय से १८ किलोमीटर दूर बसा एक छोटा सा गांव है बावनखेड़ी. अमरोहा से हसनपुर मार्ग वाली सड़क पर 8 किलोमीटर की दूरी पर बसा है यह गाँव. इस गाँव में रहते थे शौकत. आठ सदस्यों के उनके परिवार में थी उन की बेटी शबनम. बहुत प्यार करते थे वह अपनी एकलौती बेटी से. अंग्रेजी में एम् ऐ कराया था उसे. एक रात इस बेटी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने परिवार के सब सदस्यों की गर्दनें काट डाली. पिता से शुरू किया उस ने. बाल पकड़ कर वह गर्दन उठाती और उस का प्रेमी कुल्हाडी से गर्दन काट देता. छोटे भतीजे को उस के प्रेमी ने गला दबाकर मारा. प्रेमी के जाने के बाद बच्चा रोने लगा. शायद गला पूरी तरह दबा नहीं. वहशी बनी शबनम ने ख़ुद ही उस का गला तब तक दबा कर रखा जब तक तड़प तड़प कर वह शांत नहीं हो गया.
एक शिक्षित, शांतिप्रिय और पैसे वाले परिवार की इस बेटी का एक युवक से प्रेम हो गया. न जाने दोनों के बीच क्या तय हुआ कि बेटी वहशी बन गई. प्लान बनाया और जिस दिन घर के सब सदस्य घर पर थे प्लान को अंजाम दे दिया. भरा पूरा, हँसता खेलता घर कब्रिअतान बन गया. एक बेटी ने मारा और दफ़न कर दिया - शौकत, उनकी बीबी हाश्मी, दो जवान बेटे राशिद और अनीस, अंजुम, राबिया तथा मासूम अर्श.
यह कैसा प्यार है? यह प्यार है या वहशीपन? जो बाप 'बाबा' की आवाज सुनते ही दौड़ा चला आता था, उसी के बाल पकड़ कर गर्दन ऊपर उठाना और अपने प्रेमी से कहना 'चल काट गर्दन'. जिस माँ ने ९ महीने अपने पेट के अन्दर रखा उसकी गर्दन काट देना. भगवान् ऐसी बेटी किसी को न दे. गाँव वाले उसे डायन, जहरीली नागिन, बेटी के नाम पर कलंक पुकार रहे हैं. मैं पिछले दिनों अपने गाँव गया था तब इस घटना का पता चला. अन्दर तक दहल गया मैं.
एक शिक्षित, शांतिप्रिय और पैसे वाले परिवार की इस बेटी का एक युवक से प्रेम हो गया. न जाने दोनों के बीच क्या तय हुआ कि बेटी वहशी बन गई. प्लान बनाया और जिस दिन घर के सब सदस्य घर पर थे प्लान को अंजाम दे दिया. भरा पूरा, हँसता खेलता घर कब्रिअतान बन गया. एक बेटी ने मारा और दफ़न कर दिया - शौकत, उनकी बीबी हाश्मी, दो जवान बेटे राशिद और अनीस, अंजुम, राबिया तथा मासूम अर्श.
यह कैसा प्यार है? यह प्यार है या वहशीपन? जो बाप 'बाबा' की आवाज सुनते ही दौड़ा चला आता था, उसी के बाल पकड़ कर गर्दन ऊपर उठाना और अपने प्रेमी से कहना 'चल काट गर्दन'. जिस माँ ने ९ महीने अपने पेट के अन्दर रखा उसकी गर्दन काट देना. भगवान् ऐसी बेटी किसी को न दे. गाँव वाले उसे डायन, जहरीली नागिन, बेटी के नाम पर कलंक पुकार रहे हैं. मैं पिछले दिनों अपने गाँव गया था तब इस घटना का पता चला. अन्दर तक दहल गया मैं.
टिप्पणी मॉडरेशन सक्षम क्यों कर देते हैं कुछ चिठ्ठाकार?
कुछ चिठ्ठाकार टिप्पणी मॉडरेशन को सक्षम कर देते हैं. पता नहीं ऐसा वह क्यों करते हैं? लोग चिठ्ठा पढ़ते हैं, उस पर अपनी टिपण्णी करते हैं. पर उसे चिठ्ठे पर देख नहीं पाते.
एक चिठ्ठे पर तो मैंने यह देखा कि केवल चिठ्ठे के सदस्य ही टिपण्णी कर सकते हैं. मैंने ऐसा एक चिठ्ठा पढ़ा, मुझे अच्छा लगा. मन में कुछ विचार उठे. टिपण्णी लिखी. पर जब उसे सब्मिट करने गया तो कर नहीं पाया. अच्छा नहीं लगा यह. पर क्या कर सकते हैं. जिन्होनें चिठ्ठा लिखा है उनका अधिकार है यह.
अरे करने दीजिये न लोगों को टिप्पणी दिल खोल कर.
एक चिठ्ठे पर तो मैंने यह देखा कि केवल चिठ्ठे के सदस्य ही टिपण्णी कर सकते हैं. मैंने ऐसा एक चिठ्ठा पढ़ा, मुझे अच्छा लगा. मन में कुछ विचार उठे. टिपण्णी लिखी. पर जब उसे सब्मिट करने गया तो कर नहीं पाया. अच्छा नहीं लगा यह. पर क्या कर सकते हैं. जिन्होनें चिठ्ठा लिखा है उनका अधिकार है यह.
अरे करने दीजिये न लोगों को टिप्पणी दिल खोल कर.
Tuesday, 29 April 2008
पादरी होता चर्च में
एक गाँव में रहता था एक पादरी,
सीधा, सरल, म्रदुभाशी, पर किताबी तौर पर अनपढ़,
चर्च ने बनाया एक कानून,
पादरी होंगे कम से कम दसवीं पास,
कानून गाँव में पहुँचा और पादरी की नौकरी चली गई.
रोया, गिड़गिड़ाया, दुहाई दी पर बड़े पादरी नहीं माने,
सारी जिन्दगी गुजार दी अच्छा बनने में,
क्या मिला अच्छा बन कर?
करूँगा अब सारे बुरे काम,
शुरू करूँगा सिगरेट से,
सारा गाँव घूम आया सिगरेट नहीं मिली,
सोचा लोग शहर से लाते होंगे,
मैं ही क्यों न खोल लूँ दुकान गाँव में?
दुकान खोली और व्यापार चल निकला,
पास के गाँव में भी खोल ली दुकान,
बेंक में अकाउंट खुल गया,
नया मेनेजर बेंक में आया,
पादरी को मिलने बुलाया,
आप सिर्फ़ पैसा जमा करते हैं निकालते नहीं,
सुना है शिक्षित भी नहीं है आप,
पर गजब के बिजिनेसमेन हैं आप,
अगर पढ़े लिखे होते तो?
पादरी होता चर्च में.
सीधा, सरल, म्रदुभाशी, पर किताबी तौर पर अनपढ़,
चर्च ने बनाया एक कानून,
पादरी होंगे कम से कम दसवीं पास,
कानून गाँव में पहुँचा और पादरी की नौकरी चली गई.
रोया, गिड़गिड़ाया, दुहाई दी पर बड़े पादरी नहीं माने,
सारी जिन्दगी गुजार दी अच्छा बनने में,
क्या मिला अच्छा बन कर?
करूँगा अब सारे बुरे काम,
शुरू करूँगा सिगरेट से,
सारा गाँव घूम आया सिगरेट नहीं मिली,
सोचा लोग शहर से लाते होंगे,
मैं ही क्यों न खोल लूँ दुकान गाँव में?
दुकान खोली और व्यापार चल निकला,
पास के गाँव में भी खोल ली दुकान,
बेंक में अकाउंट खुल गया,
नया मेनेजर बेंक में आया,
पादरी को मिलने बुलाया,
आप सिर्फ़ पैसा जमा करते हैं निकालते नहीं,
सुना है शिक्षित भी नहीं है आप,
पर गजब के बिजिनेसमेन हैं आप,
अगर पढ़े लिखे होते तो?
पादरी होता चर्च में.
Labels:
businessman,
church,
educated,
paadri,
priest
तीन करोड़ का थप्पड़
क्रिकेट कभी भद्र्लोगों का खेल माना जाता था. अब वह अभद्र्लोगों का खेल हो गया है. पहले गाली-गलौज और अब थप्पड़. लोग इसे कुछ भी कहें, पर इससे एक फायदा हुआ है. इस अनुभव के साथ क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद अब क्रिकेटर्स आसानी से राजनीति में जा सकते हैं. राजनीतिबाज अभद्र और क्रिकेटी अभद्र, खूब मजे से गुजरेगी जब मिल बैठेंगे दो चोटी के अभद्र.
भज्जी ने श्रीशांत को थप्पड़ ज़ड़ दिया. श्रीशांत फूट-फूट कर रोये. टी वी चैनल्स ने फूट-फूट कर रोते श्रीशांत को इतना ज्यादा दिखाया की सारा देश रोने लगा. बी सी सी आई और आई पी एल भी रोने लगे. सब भज्जी को रुलाने की बात करने लगे. फारूख इंजिनियर साहब ने आखिरकार भज्जी को रुला ही दिया. तीन करोड़ का झटका दिया भज्जी को. भज्जी इस अभद्रता के मैदान से महान बन कर निकले. तीन करोड़ का झटका खाने के बाद मुस्कुराये, श्रीशांत से हाथ मिलाया. सब को धन्यवाद कहा, और आशा प्रकट की कि भविष्य में भी उन्हें इस प्रकार का सहयोग मिलता रहेगा. यानी तीन करोड़ के झटके और भी लगाए जाते रहेंगे.
अभी तक तो नेहरू-गाँधी परिवार के लोग ही महान होते थे. सोनिया गाँधी ने पी एम् की कुर्सी ठुकरा दी. राहुल को युवराज कहा जाना पसंद नहीं है. प्रियंका जेल में अपने पिता के कातिल से गले मिलने गईं. अब भज्जी ने भी महानता के रास्ते पर कदम रख दिया है. तीन करोड़ का झटका खाकर मुस्कुराना और इस के लिए सबका धन्यवाद करना एक अब्बल दर्जे की महानता है. मुझे डर है कि भज्जी कहीं राहुल की पारिवारिक महानता के लिए खतरा न बन जायें.
यह तो रही थप्पड़ और महानता की बात. क्रिकेट में रिकार्ड का बहुत महत्त्व है. जरा देखें तो कहीं इस महान अभद्रता के प्रकरण ने कोई रिकार्ड तो नहीं बना दिया? तीन करोड़ का थप्पड़. कहीं यह रिकार्ड तो नहीं बन गया? क्रिकेट के रिकार्दियों को रिसर्च करनी चाहिए. अब तक क्रिकेट के इतिहास में कितने थप्पड़ लगे हैं और सब से महंगा थप्पड़ किस ने किस को और कब मारा? यदि यह पहला थप्पड़ है तब भज्जी इस महान परम्परा की शुरुआत के लिए एक पद्म पुरूस्कार के अधिकारी तो हो ही जाते हैं.
भज्जी ने श्रीशांत को थप्पड़ ज़ड़ दिया. श्रीशांत फूट-फूट कर रोये. टी वी चैनल्स ने फूट-फूट कर रोते श्रीशांत को इतना ज्यादा दिखाया की सारा देश रोने लगा. बी सी सी आई और आई पी एल भी रोने लगे. सब भज्जी को रुलाने की बात करने लगे. फारूख इंजिनियर साहब ने आखिरकार भज्जी को रुला ही दिया. तीन करोड़ का झटका दिया भज्जी को. भज्जी इस अभद्रता के मैदान से महान बन कर निकले. तीन करोड़ का झटका खाने के बाद मुस्कुराये, श्रीशांत से हाथ मिलाया. सब को धन्यवाद कहा, और आशा प्रकट की कि भविष्य में भी उन्हें इस प्रकार का सहयोग मिलता रहेगा. यानी तीन करोड़ के झटके और भी लगाए जाते रहेंगे.
अभी तक तो नेहरू-गाँधी परिवार के लोग ही महान होते थे. सोनिया गाँधी ने पी एम् की कुर्सी ठुकरा दी. राहुल को युवराज कहा जाना पसंद नहीं है. प्रियंका जेल में अपने पिता के कातिल से गले मिलने गईं. अब भज्जी ने भी महानता के रास्ते पर कदम रख दिया है. तीन करोड़ का झटका खाकर मुस्कुराना और इस के लिए सबका धन्यवाद करना एक अब्बल दर्जे की महानता है. मुझे डर है कि भज्जी कहीं राहुल की पारिवारिक महानता के लिए खतरा न बन जायें.
यह तो रही थप्पड़ और महानता की बात. क्रिकेट में रिकार्ड का बहुत महत्त्व है. जरा देखें तो कहीं इस महान अभद्रता के प्रकरण ने कोई रिकार्ड तो नहीं बना दिया? तीन करोड़ का थप्पड़. कहीं यह रिकार्ड तो नहीं बन गया? क्रिकेट के रिकार्दियों को रिसर्च करनी चाहिए. अब तक क्रिकेट के इतिहास में कितने थप्पड़ लगे हैं और सब से महंगा थप्पड़ किस ने किस को और कब मारा? यदि यह पहला थप्पड़ है तब भज्जी इस महान परम्परा की शुरुआत के लिए एक पद्म पुरूस्कार के अधिकारी तो हो ही जाते हैं.
Labels:
bhajji,
criket,
fine,
ipl,
shrishaant,
slap,
three crore
Friday, 25 April 2008
स्वान्तः सुखाय सुरेश गाथा
मेरे कहने की और उनके न सुनने की आदत बहुत पुरानी है.
मैं अपनी आदत से बाज न आया और वह अपनी आदत से बाज न आए.
अब तो आदत से बाज न आने की आदत सी हो गई है.
इंटरनेट के आने से एक और मौका मिला अपनी बात कहने का.
जो मन में आया लिख दिया.
कंप्युटर स्क्रीन पर उसे छपा हुआ देख भी लिया.
अब वह उसे पढ़ें या न पढ़ें उनकी मर्जी,
अपना तो काम हो गया.
स्वान्तः सुखाय सुरेश गाथा.
मैं अपनी आदत से बाज न आया और वह अपनी आदत से बाज न आए.
अब तो आदत से बाज न आने की आदत सी हो गई है.
इंटरनेट के आने से एक और मौका मिला अपनी बात कहने का.
जो मन में आया लिख दिया.
कंप्युटर स्क्रीन पर उसे छपा हुआ देख भी लिया.
अब वह उसे पढ़ें या न पढ़ें उनकी मर्जी,
अपना तो काम हो गया.
स्वान्तः सुखाय सुरेश गाथा.
Labels:
blogging,
writing about self,
writing for pleasure
Thursday, 24 April 2008
सरकार है कहाँ?
कहते हैं दिल्ली में एक सरकार है,
एक क्या कई सरकार हैं,
मनमोहन सिंह की सरकार,
शीला दीक्षित की सरकार,
पर वह सरकार है कहाँ?
क्या आप ने उसे देखा है?
एक मनमोहन सिंह की दिल्ली,
एक आम आदमी की दिल्ली,
एक में विजली पानी नहीं जाते,
एक में विजली पानी नहीं आते,
एक साफ हैं दूसरी गन्दी,
एक हरी भरी है दूसरी बंजर,
एक मैं ट्रेफिक न के बराबर है,
दूसरी में हमेशा जाम लगे रहते हैं,
एक में खतरे की बातें होती हैं,
दूसरी में खतरा ही खतरा है.
दोनों कितनी अलग हैं?
आप किस दिल्ली में रहते हैं?
गर्मियाँ आईं विजली चली गई,
जितनी आती थी अब उतनी भी नहीं,
विजली नहीं तो पानी भी नहीं,
इन्वर्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं,
क्या करें कुछ समझ नहीं आता,
आप के पास हैं कोई समाधान?
दिल्ली में एक नया आतंक फ़ैल गया है,
बी आर टी ने जनता की नींद उड़ा दी है,
तुगलकी सरकार पूरी तरह फेल हो गई है,
पहले तो सारा क्रेडिट ख़ुद ले रही थी,
अब अधिकारियों पर दोष लगा रही है.
लोगों ने ट्रेफिक जाम लगाया,
लोगों ने ट्रेफिक जाम हटाया,
पुलिस चेक पोस्ट पर बैठी रही,
गाड़ियों को रोकती रही,
जेब गरम करती रही.
सरकार कहाँ है, पता नहीं.
महंगाई ने लोगो की कमर तोड़ दी,
पर रोज विज्ञापन छपते हैं अखबारों में,
विज्ञापनों में छपते हैं फोटो,
मनमोहन सिंह के, सोनिया के,
शीला के, उनके मंत्रियों के,
जनता के पैसे से, जनता के दिल पर,
करती है वार, यह सरकार,
इन विज्ञापनों से.
एक क्या कई सरकार हैं,
मनमोहन सिंह की सरकार,
शीला दीक्षित की सरकार,
पर वह सरकार है कहाँ?
क्या आप ने उसे देखा है?
एक मनमोहन सिंह की दिल्ली,
एक आम आदमी की दिल्ली,
एक में विजली पानी नहीं जाते,
एक में विजली पानी नहीं आते,
एक साफ हैं दूसरी गन्दी,
एक हरी भरी है दूसरी बंजर,
एक मैं ट्रेफिक न के बराबर है,
दूसरी में हमेशा जाम लगे रहते हैं,
एक में खतरे की बातें होती हैं,
दूसरी में खतरा ही खतरा है.
दोनों कितनी अलग हैं?
आप किस दिल्ली में रहते हैं?
गर्मियाँ आईं विजली चली गई,
जितनी आती थी अब उतनी भी नहीं,
विजली नहीं तो पानी भी नहीं,
इन्वर्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं,
क्या करें कुछ समझ नहीं आता,
आप के पास हैं कोई समाधान?
दिल्ली में एक नया आतंक फ़ैल गया है,
बी आर टी ने जनता की नींद उड़ा दी है,
तुगलकी सरकार पूरी तरह फेल हो गई है,
पहले तो सारा क्रेडिट ख़ुद ले रही थी,
अब अधिकारियों पर दोष लगा रही है.
लोगों ने ट्रेफिक जाम लगाया,
लोगों ने ट्रेफिक जाम हटाया,
पुलिस चेक पोस्ट पर बैठी रही,
गाड़ियों को रोकती रही,
जेब गरम करती रही.
सरकार कहाँ है, पता नहीं.
महंगाई ने लोगो की कमर तोड़ दी,
पर रोज विज्ञापन छपते हैं अखबारों में,
विज्ञापनों में छपते हैं फोटो,
मनमोहन सिंह के, सोनिया के,
शीला के, उनके मंत्रियों के,
जनता के पैसे से, जनता के दिल पर,
करती है वार, यह सरकार,
इन विज्ञापनों से.
Wednesday, 23 April 2008
सड़कों पर दौड़ते दानव
कभी आप दिल्ली से यू पी में मुरादाबाद तक गए हों तब आप ने इन दानवों को सड़कों पर दौड़ते देखा होगा I वहाँ की स्थानीय भाषा में इन्हें 'जुगाड़ू' कहा जाता है I अच्छा जुगाड़ किया है लोगों ने I चार पहिये, लकड़ी-लोहे का ढांचा, पुराना डीजल इंजन, स्टीयरिंग व्हील और कुछ मोटरगाड़ियों में काम आने वाले कल-पुर्जे, जुगाड़ू तैयार, दौड़ाइए सड़कों पर.


न तो फेक्टरी चाहिए, न मेंयुफेक्चारिंग लाइसेंस, न किसी रजिस्ट्रेशन की जरूरत, न कोई ड्राइविंग लाइसेंस I देश का कानून टूटता है तो टूटने दीजिये I आपको तो बस लोकल पुलिस और प्रशाशन का ख्याल करना है I भारत का कानून भारतीय संबिधान में नहीं लिखा है, वह तो लोकल पुलिस और प्रशाशन की जेब में रहता है. उनकी जेब गरम तो कानून आप के लिए नरम I पैसे दो, कानून खरीदो और अपनी जेब में डाल लो I एक चौक पर एक पुलिस वाला एक जुगाड़ू में बैठ कर एक बस का चालान कर रहा था, बस का ड्राईबर कभी अपनी बस को देखता, कभी जुगारू को और कभी पुलिस वाले को.
यह जुगाड़ू एक मल्टी-पर्पज मोटर वेहिकल है, इस में आप मॉल ढोहिये, जानबर ढोहिये, ख़ुद भी ढो जाइये. कोका कोला कम्पनी इन में कोका कोला ढोती है. मैं गंगा मेले वाले दिन ट्रेफिक जाम में फंस गया. एक भैंस एक जुगारु में सफर कर रही थी. लगभग दस तीर्थ यात्री आए और भैस से बिना पूछे जुगारु में चढ़ गए. भैंस को बुरा लगा पर क्या कर सकती थी. उसने एक ठंडी साँस ली और जुगाली करने लगी.


मैंने एक जुगारु वाले से पूछा, 'कितने में बन जाता है यह'. उसने बताया, करीब अस्सी हजार में. मैंने सोचा
लोग टाटा को बिना मतलब ही क्रेडिट दे रहे हैं सस्ती कार के लिए. टाटा अपनी कार की कीमत एक लाख रूपये बता रहे हैं. यहाँ एक मल्टी-पर्पज मोटर वेहिकल अस्सी हजार में मिल रही है.
मजे की बात यह है की लोकल पब्लिक को इस सब से कोई परेशानी नहीं है. एक-दो लोगों से बात हुई तो उन्होंने कहा की इन सब से बहुत आराम हो गया है. कही भी रुकवा लो, कहीं भी बैठ जाओ, कुछ भी सामान ले जाओ, मैंने कहा और कानून? उन्होंने कहा कानून और हंसने लगे. पुलिस इस देश का कानून है और उसे कोई ऐतज़ार नहीं है. मैंने इस बारे उस इलाके में मशहूर अखबारों को लिखा, फोटो भी भेजी, पर उन्होंने कोई नोटिस नहीं लिया. या हो सकता है उन्होंने कुछ छानबीन भी की हो, और पुलिस वालों की तरह उनकी जेब भी गरम हो गई हो.
यह एक बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है की एक आम भारतीय नागरिक के मन में अब भारतीय कानून के लिए कोई इज्ज़त नहीं रह गई है. केन्द्र / प्रदेश सरकार और कानून बनाने वाली पार्लियामेन्ट का कोई मतलब नहीं है उनके लिए. उनके लिए सरकार, कानून सब कुछ केवल लोकल पुलिस और प्रशासन है. लोग धड़ल्ले से कानून तौड़ते हैं. लोकल पुलिस और प्रशासन दूसरी और देखता है. सब खुश है, किसी को कोई परेशानी नहीं, हम जैसे कुछ चिठ्ठाकार लिखते रहते हैं.


न तो फेक्टरी चाहिए, न मेंयुफेक्चारिंग लाइसेंस, न किसी रजिस्ट्रेशन की जरूरत, न कोई ड्राइविंग लाइसेंस I देश का कानून टूटता है तो टूटने दीजिये I आपको तो बस लोकल पुलिस और प्रशाशन का ख्याल करना है I भारत का कानून भारतीय संबिधान में नहीं लिखा है, वह तो लोकल पुलिस और प्रशाशन की जेब में रहता है. उनकी जेब गरम तो कानून आप के लिए नरम I पैसे दो, कानून खरीदो और अपनी जेब में डाल लो I एक चौक पर एक पुलिस वाला एक जुगाड़ू में बैठ कर एक बस का चालान कर रहा था, बस का ड्राईबर कभी अपनी बस को देखता, कभी जुगारू को और कभी पुलिस वाले को.
यह जुगाड़ू एक मल्टी-पर्पज मोटर वेहिकल है, इस में आप मॉल ढोहिये, जानबर ढोहिये, ख़ुद भी ढो जाइये. कोका कोला कम्पनी इन में कोका कोला ढोती है. मैं गंगा मेले वाले दिन ट्रेफिक जाम में फंस गया. एक भैंस एक जुगारु में सफर कर रही थी. लगभग दस तीर्थ यात्री आए और भैस से बिना पूछे जुगारु में चढ़ गए. भैंस को बुरा लगा पर क्या कर सकती थी. उसने एक ठंडी साँस ली और जुगाली करने लगी.


मैंने एक जुगारु वाले से पूछा, 'कितने में बन जाता है यह'. उसने बताया, करीब अस्सी हजार में. मैंने सोचालोग टाटा को बिना मतलब ही क्रेडिट दे रहे हैं सस्ती कार के लिए. टाटा अपनी कार की कीमत एक लाख रूपये बता रहे हैं. यहाँ एक मल्टी-पर्पज मोटर वेहिकल अस्सी हजार में मिल रही है.
मजे की बात यह है की लोकल पब्लिक को इस सब से कोई परेशानी नहीं है. एक-दो लोगों से बात हुई तो उन्होंने कहा की इन सब से बहुत आराम हो गया है. कही भी रुकवा लो, कहीं भी बैठ जाओ, कुछ भी सामान ले जाओ, मैंने कहा और कानून? उन्होंने कहा कानून और हंसने लगे. पुलिस इस देश का कानून है और उसे कोई ऐतज़ार नहीं है. मैंने इस बारे उस इलाके में मशहूर अखबारों को लिखा, फोटो भी भेजी, पर उन्होंने कोई नोटिस नहीं लिया. या हो सकता है उन्होंने कुछ छानबीन भी की हो, और पुलिस वालों की तरह उनकी जेब भी गरम हो गई हो.
यह एक बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है की एक आम भारतीय नागरिक के मन में अब भारतीय कानून के लिए कोई इज्ज़त नहीं रह गई है. केन्द्र / प्रदेश सरकार और कानून बनाने वाली पार्लियामेन्ट का कोई मतलब नहीं है उनके लिए. उनके लिए सरकार, कानून सब कुछ केवल लोकल पुलिस और प्रशासन है. लोग धड़ल्ले से कानून तौड़ते हैं. लोकल पुलिस और प्रशासन दूसरी और देखता है. सब खुश है, किसी को कोई परेशानी नहीं, हम जैसे कुछ चिठ्ठाकार लिखते रहते हैं.
Subscribe to:
Posts (Atom)