दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Wednesday, 23 April 2008

सड़कों पर दौड़ते दानव

कभी आप दिल्ली से यू पी में मुरादाबाद तक गए हों तब आप ने इन दानवों को सड़कों पर दौड़ते देखा होगा I वहाँ की स्थानीय भाषा में इन्हें 'जुगाड़ू' कहा जाता है I अच्छा जुगाड़ किया है लोगों ने I चार पहिये, लकड़ी-लोहे का ढांचा, पुराना डीजल इंजन, स्टीयरिंग व्हील और कुछ मोटरगाड़ियों में काम आने वाले कल-पुर्जे, जुगाड़ू तैयार, दौड़ाइए सड़कों पर.














न तो फेक्टरी चाहिए, न मेंयुफेक्चारिंग लाइसेंस, न किसी रजिस्ट्रेशन की जरूरत, न कोई ड्राइविंग लाइसेंस I देश का कानून टूटता है तो टूटने दीजिये I आपको तो बस लोकल पुलिस और प्रशाशन का ख्याल करना है I भारत का कानून भारतीय संबिधान में नहीं लिखा है, वह तो लोकल पुलिस और प्रशाशन की जेब में रहता है. उनकी जेब गरम तो कानून आप के लिए नरम I पैसे दो, कानून खरीदो और अपनी जेब में डाल लो I एक चौक पर एक पुलिस वाला एक जुगाड़ू में बैठ कर एक बस का चालान कर रहा था, बस का ड्राईबर कभी अपनी बस को देखता, कभी जुगारू को और कभी पुलिस वाले को.

यह जुगाड़ू एक मल्टी-पर्पज मोटर वेहिकल है, इस में आप मॉल ढोहिये, जानबर ढोहिये, ख़ुद भी ढो जाइये. कोका कोला कम्पनी इन में कोका कोला ढोती है. मैं गंगा मेले वाले दिन ट्रेफिक जाम में फंस गया. एक भैंस एक जुगारु में सफर कर रही थी. लगभग दस तीर्थ यात्री आए और भैस से बिना पूछे जुगारु में चढ़ गए. भैंस को बुरा लगा पर क्या कर सकती थी. उसने एक ठंडी साँस ली और जुगाली करने लगी.







मैंने एक जुगारु वाले से पूछा, 'कितने में बन जाता है यह'. उसने बताया, करीब अस्सी हजार में. मैंने सोचा
लोग टाटा को बिना मतलब ही क्रेडिट दे रहे हैं सस्ती कार के लिए. टाटा अपनी कार की कीमत एक लाख रूपये बता रहे हैं. यहाँ एक मल्टी-पर्पज मोटर वेहिकल अस्सी हजार में मिल रही है.

मजे की बात यह है की लोकल पब्लिक को इस सब से कोई परेशानी नहीं है. एक-दो लोगों से बात हुई तो उन्होंने कहा की इन सब से बहुत आराम हो गया है. कही भी रुकवा लो, कहीं भी बैठ जाओ, कुछ भी सामान ले जाओ, मैंने कहा और कानून? उन्होंने कहा कानून और हंसने लगे. पुलिस इस देश का कानून है और उसे कोई ऐतज़ार नहीं है. मैंने इस बारे उस इलाके में मशहूर अखबारों को लिखा, फोटो भी भेजी, पर उन्होंने कोई नोटिस नहीं लिया. या हो सकता है उन्होंने कुछ छानबीन भी की हो, और पुलिस वालों की तरह उनकी जेब भी गरम हो गई हो.

यह एक बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है की एक आम भारतीय नागरिक के मन में अब भारतीय कानून के लिए कोई इज्ज़त नहीं रह गई है. केन्द्र / प्रदेश सरकार और कानून बनाने वाली पार्लियामेन्ट का कोई मतलब नहीं है उनके लिए. उनके लिए सरकार, कानून सब कुछ केवल लोकल पुलिस और प्रशासन है. लोग धड़ल्ले से कानून तौड़ते हैं. लोकल पुलिस और प्रशासन दूसरी और देखता है. सब खुश है, किसी को कोई परेशानी नहीं, हम जैसे कुछ चिठ्ठाकार लिखते रहते हैं.