मीडिया ने उसे आतंकवादी कहा. उसे 'मानव बम' नाम दिया. लेकिन यह सब हुआ इसलिए कि मीडिया के पास पूरी जानकारी नहीं थी, और न ही मीडिया ने कोई जानकारी इकठ्ठा करने की कोशिश की. बस तुंरत आमिर पर अपना फ़ैसला सुना दिया.
आमिर एक डाक्टर था, लन्दन में रहता था, अपने परिवार से मिलने भारत आता है. एअरपोर्ट पर एक मवाली दिखने वाला एक अफसर उसके सामान की चार बार तलाशी लेता है और कुछ न मिलने पर बहुत निराश होता है. आमिर उस से पूछता है कि अगर उस का नाम अमर होता तो क्या वह इतनी बार उस की भी तलाशी लेता? मवाली अफसर और मवाली नजर आने लगता है.
आमिर एअरपोर्ट से बाहर आता है. फ़िर उसके साथ शुरू होता एक दिल देहला देने वाला चक्कर - कैसे शिक्षित मुसलमान आतंकवादी बनाए जाते हैं? कौम के नाम पर उसे आतंकवादी बनने पर मजबूर किया जाता है. उस के परिवार का अपहरण कर लिया गया है, उसे धमकी दी जाती है कि अगर उस ने उनके कहने के अनुसार काम नहीं किया तो उन्हें मार डाला जायेगा. मां के दिल का सकून, तीन बहनों और एक भाई का प्यारा भाई, आमिर मजबूर हो जाता है उन की बात मानने को.
उसे एक सूटकेस किसी को पहुंचाने का काम सौंपा जाता है. बस में बैठ जाने पर उसे पता चलता है कि सूटकेस मैं बम है. उसे बताया जाता है कि पाँच मिनट में बम फट जायेगा, इस लिए वह तुंरत बस से उतर जाय. वह बस से उतर जाता है, पर बस में से एक बच्चा उसे देख कर मुस्कुराता है और हाथ हिलाता है. आमिर फ़िर बस में चढ़ जाता है, सूटकेस उठाता है और बस से उतर कर खुली जगह की तरफ़ भागता है. उधर कुछ मजदूर सड़क पर गड्ढा खोद रहे हैं. वह चिल्लाता है, 'सूटकेस में बम है, जल्दी से भाग जाओ'. सब दूर भाग जाते हैं. आमिर के हाथों में सूटकेस है, जिसमें बम है, बम फटता है, आमिर मर जाता है.
मीडिया को बस इतना मालूम था. उन्होंने उसे मानव बम कहा. यह भी कहा कि वह बम लेकर बस से उतर गया और खाली जगह की तरफ़ भागा,पर इसका कारण उन के अनुसार यह था कि आमिर आखिरी वक्त पर डर गया. अगर बम बस में फट जाता तो सैकड़ों लोग मारे जाते. आमिर ने अपनी जान दे दी पर आतंकवादियों की नापाक साजिश को कामयाब नहीं होने दिया. उसने अपनी जान दे कर सैकड़ों लोगों की जान बच ली.
क्या आप आमिर को आतंकवादी कहेंगे? मैं तो नहीं कहूँगा. आमिर मेरा हीरो है. मैं उसे सलाम करता हूँ. ऐसे बहुत से आमिर होंगे इस देश में, जिन्हें आतंकवादी बनाने की कोशिशें की जा रही हैं. बहुत से बन भी गए होंगे. पर यह आमिर नहीं बना. आज देश को ऐसे आमिरों की जरूरत है.
नोट - आप सोच रहे होंगे कि यह क्या कहानी लिखी है मैंने. यह कहानी मैंने नहीं लिखी. मैंने इसे देखा टीवी पर. अगर आप भी देखना चाहते हैं तो उस फ़िल्म का नाम है 'आमिर'.