दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Saturday, 5 December 2009

रावण और राम राज्य

वह एक मंजे हुए राजनीतिबाज हैं,
भाषण देना उन की आदत है,
एक सभा में भाषण दे दिया,
देश में राम राज्य लायेंगे.

कल एक जवान लड़के की मौत हो गई,
शमशान भूमि में उस के पिता को रोते देखा,
अचानक नेताजी का भाषण याद आया,
देश में राम राज्य लायेंगे,
यह कैसा राम राज्य होगा?
राम राज्य में पहले पिता जाता था,
यहाँ बेटा चला गया.

रावण के वंशज हैं यह नेता सारे,
जिसने पहले सब बेटों को भेजा,
फिर खुद गया.

Saturday, 3 May 2008

सीता की अग्नि परीक्षा

'नारी' ब्लाग पर विमला तिवारी 'विभोर' की एक कविता पढ़ी, "सीता तुम कृपाण पकड़ो अब". मैं विमला जी के विचारों का सम्मान करता हूँ. पर मैं सीता की अग्नि परीक्षा और बनवास को एक अन्याय के रूप में नहीं देखता. सीता कोई साधारण नारी नहीं थीं. वह एक सम्राट की पत्नी थीं. और वह भी एक ऐसे सम्राट की जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते थे. कोई भी पुरूष, चाहे वह अवतार ही क्यों न हो, अपने आप में पूर्ण नहीं होता. नारी (पत्नी) ही उसे पूर्ण बनाती है. राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया सीता ने. उनके साथ अन्याय हुआ ऐसा कह कर उन्हें छोटा मत बनाइये.

सीता की अग्नि परीक्षा को रामावतार के सन्दर्भ में देखना चाहिए. रामावतार एक निश्चित उद्देश्य को लेकर हुआ था. उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सीता ने अग्नि परीक्षा दी. एक आदर्श राज्य की कल्पना को साकार रूप देने के लिए सीता ने बन गमन किया. रामायण में कई राज्य व्यवस्थाओं के बारे में बताया गया है. दशरथ का राज्य, जनक का राज्य, रावण का राज्य, बाली और फ़िर सुग्रीव का राज्य, भारत का राम के नाम पर राज्य, राम का राज्य. राजतन्त्र में प्रजा के एक व्यक्ति की बात को इतना सम्मान देना केवल राम राज्य में ही सम्भव था. और राम ऐसा बिना सीता के सहयोग के नहीं कर सकते थे. आज के दूषित प्रजातंत्र को अपने दिमाग से बाहर फैंक कर अगर हम राम की अयोध्या चलें तब हम समझ पाएंगे सीता की अग्न परीक्षा और बनवास को.