सबने कहा यह चुनाव है,
मैंने कहा सत्ता का बँटवारा है,
चुनाव तो एक बहाना है,
असली उद्देश्य सत्ता में आना है,
मिल बाँट कर खाना है.
जनता का वोट बेकार नहीं जाएगा,
कोई न कोई तो चुना जाएगा,
जो चुना जाएगा,
पाँच वर्ष तक देश को खायेगा.
सत्ता के गलियारों में,
सत्ता के बंटवारे का भव्य आयोजन,
एक एक करके आयेंगे,
देश को खाने की शपथ खाएँगे.
चुनाव का नाटक ख़त्म,
सत्ता का नाटक शुरू,
कल के वफादार चमचे,
अब बन जायेंगे गुरु.
जनता ने वोट डाला,
अपना कर्तव्य निभाया,
पाँच साल तक भोगेंगे,
अगली बार फिर वोट दे देंगे.
सत्ता का बंटवारा अनवरत चलता रहेगा,
लोग इसे चुनाव कहते रहेंगे.
हर व्यक्ति कवि है. अक्सर यह कवि कानों में फुसफुसाता है. कुछ सुनते हैं, कुछ नहीं सुनते. जो सुनते हैं वह शब्द दे देते हैं इस फुसफुसाहट को. एक और पुष्प खिल जाता है काव्य कुञ्ज में.
दैनिक प्रार्थना
हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो
दैनिक प्रार्थना
है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Friday, 22 May 2009
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