शब्दार्थ की द्रष्टि से अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक - दोनों शब्द सार्थक हैं किंतु राजनीतिक सन्दर्भ में दोनों त्रुटिपूर्ण हैं. राजनीति के छेत्र में इन शब्दों का सदुपयोग कम हुआ है, अधिकांशतः दुरूपयोग हुआ है. उत्तेजना फैलाने और हिंसा भड़काने में ये शब्द बाहक बने हैं.
राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक नागरिकता की द्रष्टि से समान होता है. जब हम अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का प्रयोग करते हैं, तब राष्ट्र को गौण, जातीयता और प्रांतीयता को प्रधान बना देते हैं. मुसलमान इस्लाम के अनुयाई हैं. हिन्दुस्तान में इस्लाम के अनुयाई अल्पसंख्या में हैं और उसे न मानने वाले अधिक संख्या में. इस अल्प्संखयकता और बहुसंख्यकता का आधार धर्म-सम्प्रदाय है, राष्ट्रीयता नहीं. राष्ट्रीयता की द्रष्टि से न कोई अल्पसंख्यक है और न कोई कोई बहुसंख्यक. अल्पसंख्यक को वही अधिकार प्राप्त हैं जो बहुसंख्यक को है, और बहुसंख्यक को वही अधिकार प्राप्त हैं जो अल्पसंख्यक को है. धार्मिक विश्वासके आधार पर जैन और बोद्ध भी अल्पसंख्यक हैं. वैदिक धर्म भी अनेक सम्प्रदायों में विभक्त है. बहुसंख्यक कौन है, यह निष्कर्ष निकालना सरल नहीं है.
राष्ट्रीय मंच पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का प्रयोग न हो, यह राष्ट्र के हित में है.
(लोकतंत्र : नया व्यक्ति नया समाज से साभार)