दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Saturday, 6 December 2008

निर्दोषों की लाशों पर कुर्सी की लड़ाई

आज सारा देश दुखी है, मुंबई में कितने निर्दोष आतंकियों की गोली का निशाना बन गए. उनकी कोई दुश्मनी नहीं थी आतंकियों से, आतंकी उन्हें जानते भी नहीं थे, पर फ़िर भी यह निर्दोष अपनी जान गवां बैठे. दुखी लोग इकट्ठे होकर संवेदना प्रकट कर रहे हैं. 

सारा देश आक्रोश से भरा हुआ है - 'बस बहुत हो गया'. जन आक्रोश से घबराई सरकार ने भी आक्रोशित होने का नाटक शुरू कर दिया. बयानबाजी शुरू हो गई. गलती किस की थी, किसने अपना कर्तव्य पूरा नहीं क्या? लोग अपनी गलती दूसरों पर डालने लगे, क्रिकेट बंद हो गई पर गलती उछालने का खेल चल रहा है. कुछ लोग इस दुखी समय में कुर्सी का खेल खेलते रहे. उन्होंने सोचा, कोई न कोई तो जायेगा, अगर अपना दांव लग गया तो उसकी खाली कुर्सी मेरी हो सकती है. महा सीएम ने अपनी जान लगा दी अपनी कुर्सी बचाने में, पर बची नहीं. हाई कमान समझ नहीं पा रही थी, किसे दें कुर्सी? किसकी बफदारी पर यकीन करें. योग्यता की तलाश नहीं थी. सबसे ज्यादा बफादार की तलाश थी. एक को कुर्सी मिली. दूसरे ने गालियाँ देनी शुरू कर दी. 

यह है इन की श्रद्धांजलि, उनके लिए जो इनकी सरकार की नालायकी की वजह से मारे गए.