जनता, सरकार और आतंकवाद - बराबर की लड़ाई नहीं है
आतंकवादियों के हमलों से भारत का कानून भारतवासियों को कितनी सुरक्षा देता है, काफ़ी समय से इस पर सवाल उठ रहे हैं. हत्या करने के ख़िलाफ़ कानून है, हत्या की जांच करने के लिए पुलिस भी है, अगर कोई आतंकवादी हत्यारा पकड़ा गया तो उस पर मुकदमा चलाने के लिए अदालतें हैं, सरकारी वकील है. पर क्या इन हत्यारों को सजा मिल पाती है? आज तक यह हत्यारे हजारों भारतवासियों की हत्या कर चुके हैं पर किसी हत्यारे को सजा नहीं दी सकी. सजा देने के इस लंबे रास्ते में किसी न किसी सीढ़ी पर इन हत्यारों को सुरक्षा मिल जाती है. कभी पुलिस, कभी वकील, कभी अदालत, कभी सरकार. यह लोग और संस्थायें जनता को तो कोई सुरक्षा नहीं दे पाते पर जनता के हत्यारों को सुरक्षा देने में नहीं हिचकिचाते. अदालत ने अफज़ल को सजा भी दे दी पर भारत सरकार ने इस आतंकवादी हत्यारे को अपनी सुरक्षा प्रदान कर दी. अब वह मजे से सरकारी मेहमान बना हुआ है और जिस जनता की उसने हत्या की थी उस जनता के पैसे पर ऐयाशी कर रहा है.
एक आतंकवादी हत्यारे पर एक आम हत्यारे की तरह मुकदमा चलाया जाता है. पहले निचले कोर्ट में, फ़िर हाई कोर्ट में, फ़िर सुप्रीम कोर्ट में, फ़िर कोर्ट की बेंचों में, फ़िर मर्सी पेटिशन. बहुत लंबा रास्ता है. सारी जिंदगी यह हत्यारा आराम से मेहमान जेलों या जमानत पर गुजार सकता है. कहीं न कहीं इसे मुक़दमे से बाहर निकलने का रास्ता भी मिल जाता है. इस के मुकाबले भारतवासियों को कोई वक्त नहीं लगता मरने में. एक बटन दबा, एक बम फटा, और सैकड़ों भारतवासियों को मौत की सजा मिल गई. आतंकवादियों की अदालत में कोई सुनवाई नहीं, सीधा फ़ैसला होता है. मौत दे दो, और यह भी पता नहीं किसे. कौन मरेगा कोई नहीं जानता. बेचारा मरने वाला भारतवासी और उसके परिवार वाले यह भी नहीं जानते कि उसे किस अपराध की सजा मिली.
क्या मरने वाले का अपराध यह है कि वह भारतवासी है? क्या उसका अपराध यह है कि आज देश में एक नपुंसक सरकार है जिसे अपनी कुर्सी से प्यार है, देश और देशवासियों से नहीं. जो वोट के लिए आतंकवाद विरोधी कानून को रद्दी की टोकरी में दाल देती है और कहती है, 'प्यारे मजे करो, खूब बम चलाओ, हम तुम्हारे साथ है, बस अपने धर्म वालों से कह देना कि हमें वोट दें'.
क्या करें भारतवासी? जिस देश की सरकार आतंकवादियों के साथ हो, क्या करें उस देश के नागरिक? कोई जवाब है किसी के पास?