पिछले दिनों अखबार में एक ख़बर पढ़ी - हज पेनल की पाँच सितारा मांगें. केन्द्रीय हज कमेटी के १०० अधिकारी अपने परिवार के सदस्यों के साथ मुफ्त हज यात्रा पर चले गए हैं या जाने वाले हैं. यह लोग मुफ्त में हज यात्रा कर के पुन्य कमाएंगे, और सरकार को ८ करोड़ का चूना लगेगा. हकीकत में तो यह चूना जनता को लगेगा क्योंकि सरकार के पास तो जनता का ही पैसा है.
हज कमेटी ने रियाध और जेद्दाह में भारतीय मिशनों को पत्र लिख कर मांग की कि इन अधिकारिओं और उनके परिवारों को अलग से पाँच सितारा सुविधाएं मुहैया कराई जाएँ. भारतीय मिशनों ने तुंरत नई दिल्ली सरकार से सलाह मांगी, क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री की और से यह हिदायतें दी गई हैं कि वह खर्च में कटौती करें. सरकार ने क्या सलाह दी, ख़बर में इसका कोई जिक्र नहीं है. जाहिर है हरी झंडी दिखाई गई होगी.
आपने मोहम्मद ओवाईस का नाम तो सुना होगा. यह सज्जन हज कमेटी के सीईओ हैं. इन्होने मांग की कि अधिकारिओं और उनके परिवारों के रूतवे के अनुसार उन्हें अलग से पाँच सितारा रहने की जगह दी जाय जिसमे रसोई और गुसलखाने अलग से हों. अब किनसे अलग रहने की बात हो रही है यहाँ? जाहिर है उन आम मुसलामानों से जो अपने पैसे से हज यात्रा कर रहे हैं. यह अधिकारी इन आम मुसलमानों को सुविधा से यात्रा करवाने के लिए जाते हैं. इस साल इन्होनें पाँच सितारा सुवुधायें मिलें इस की मांग की है. यह एक धर्म-निरपेक्ष राज्य की पहचान है.

अब सवाल यह उठता है कि क्या इस्लाम मुफ्त में (यानि दूसरों के पैसे से) हज करने की इजाजत देता है? मैंने कहीं पढ़ा था कि किराए पर जो सब्सिडी दी जाती है वह भी इस्लाम के अनुसार नहीं है. इस तरह की हज यात्रा से कोई पुन्य नहीं मिलता. लेकिन जहाँ फायदा हो रहा हो वहां ऐसा क्यों सोचा जाय या माना जाय?