दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.
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Thursday, 9 October 2008

आज की कुछ खबरें

कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कहा कि सरकार के पास बजरंग दल पर पाबंदी लगाने के लिए सारे सबूत हैं. पर कल हुई मंत्री-परिषद् की बैठक में सरकार ने यह निर्णय नहीं लिया. क्यों? क्या प्रवक्ता ने झूट बोला, या कांग्रेस असलियत में ईसायिओं और मुसलमानों की हिफाज़त नहीं करना चाहती, या महाराष्ट्र और आसाम में ख़ुद उसकी पोजीसन कच्ची हो रही है, या कोई और कारण है?

वह बहुत मजे से अपनी जिंदगी गुजार रहा था. १९ लाख रुपए सालाना मिलते थे उसे. पर पुलिस ने उसे आतंकवादी होने के इल्जाम में गिरफ्तार किया. उसकी मां ने कहा वह निर्दोष है. इसमें कोई खास बात नहीं क्योंकि हर मां अपने बेटे को निर्दोष कहेगी. पर एक ख़ास बात कही उस की मां ने उस से, जब वह उस से मिलने गई - "तूने जिहाद का मतलब मुझसे क्यों नहीं पुछा? इस्लाम इस बारे में क्या कहता है, यह तुझे मुझ से पूछना था. मैं तुझे सही बात बताती." क्या यह हर गिरफ्तार मुस्लिम नौजवान के साथ नहीं हो रहा है? मैंने अक्सर यह कहा है कि अगर तुम अपने बच्चों को सही बात नहीं सिखाओगे तो कोई और उन्हें ग़लत बात सिखा देगा.

प्रधान मंत्री ने कहा कि ईसायिओं पर हुए हमलों से भारत का नाम सारे विश्व में बदनाम हुआ है, यह एक राष्ट्रिय शर्म की बात है. मैं यह नहीं समझ पाता कि बदनामी और शर्म किसी एक या दूसरे मजहब के साथ क्यों जोड़ दी जाती है? क्या इंसानियत धर्म देख कर जागती है? मरने वाला अगर इस धर्म का था तो बहुत बुरी बात हुई, और अगर वह दूसरे धर्म का था तो कोई बात नहीं. यह कैसा सोच है? जब कश्मीर में पंडितों का कत्लेआम हो रहा था तब यह इंसानियत क्यों नहीं जागी, तब भारत की बदनामी क्यों नहीं हुई, तब यह राष्ट्रिय शर्म की बात क्यों नहीं बनी? दिल्ली और दूसरे शहरों में बम धमाकों में जब लोग मरे तो यह इंसानियत क्यों नहीं जागी, तब भारत की बदनामी क्यों नहीं हुई, तब यह राष्ट्रिय शर्म की बात क्यों नहीं बनी? लेकिन जब दिल्ली में पुलिस मुट्भेड़ में कुछ लोग मारे गए या गिरफ्तार किए गए तब अचानक ही इंसानियत जाग उठी. शर्मा जी की मौत पर इंसानियत तो नहीं जगी, हाँ कुछ लोग हैवानियत की हदें पार कर गए. क्या क्या नहीं इन लोगों ने? क्या क्या इल्जाम नहीं लगाए इन लोगों ने? धर्म के नाम पर हैवानियत का यह नंगा नाच क्या भारत की बदनामी नहीं करता? क्या यह राष्ट्रीय शर्म की बात नहीं है?

भारत में घुसे बंगलादेशी नागरिकों ने भारतीय नागरिकों पर हमला किया. यह तो अजीब ही बात हो गई. जिन्हें इस देश की जमीन से खदेड़ दिया जाना चाहिए था, वह यहाँ बस गए हैं, और ऐसे बसे हैं कि यहाँ के निवासियों पर हमला करने की हिम्मत भी रखते हैं. कुछ दिन पहले दिल्ली के तैमूर नगर इलाके में ऐसे ही गैरकानूनी बंगलादेशी घुसपैठियों ने दिल्ली पुलिस की जम कर पिटाई की.

कामरेड सोमनाथ जी ने विदेश का दौरा रद्द कर दिया क्योंकि वहां की सरकार ने कहा कि उन की तलाशी ली जायेगी. इस से पहले कुछ सरकारों ने भारतीय मंत्रियों की तलाशी ली थी, जॉर्ज फर्नांडिस और प्रणब मुखेर्जी ऐसे कुछ मंत्री हैं. कैसी भारत सरकार है यह? यहाँ कोई बाहर से आता है तो उस की तलाशी तो दूर उस के लिए लाल कालीन विछाया जाता है. क्या इन तलाशियों से भारत की बदनामी नहीं होती?क्या यह राष्ट्रीय शर्म की बात नहीं है? यह बेशर्म सरकारें और यह बेशर्म नेता.