मुंबई में आतंकवादियों ने हमले किए. जब इन हमलों का फैलाव और न्रशंसता सामने आए तो सरकार को लगा कि कुछ करना चाहिए. अब यह सरकार कहने के अलाबा क्या कर सकती है, तो उस ने तय किया कि प्रधानमन्त्री राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित करें. प्रधानमन्त्री ने ऐसा किया भी. लेकिन उनके संबोधन से पहले जनता के मन में जो डर और आशंकाएं थी, शासन के प्रति जो अविश्वास था, उस में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. मेरे एक जानकार ने उनका भाषण सुनने के बाद कमेन्ट किया - 'He does not inspire confidence'.
एक नेता जो जनता के मन में अपने और अपनी सरकार के प्रति विश्वास पैदा नहीं कर सकता, वह देश को आतंकवाद से क्या बचायेगा? जब-तब आतंकी आते रहेंगे और यहाँ-वहां आतंकी हमले करते रहेंगे. इस देश में नागरिक इतनी स्वतंत्रता के साथ इधर-उधर नहीं घूम सकते, जितनी आसानी से आतंकवादी घूमते हैं. सरकार के हर कदम से आतंकवादी संगठनों और आतंकवादियों के मन में इस सरकार के प्रति यह विश्वास और पक्का हो जाता है कि यह सरकार उनके ख़िलाफ़ कभी कोई सख्त कदम नहीं उठाएगी.
सारा देश चाहता है कि आतंकवादियों के ख़िलाफ़ सख्त कार्यवाही की जाय, पर यह सरकार ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती जिस से उसे वोटों का नुक्सान हो. इस सरकार का हर सोच, हर एक्शन इस से प्रभावित है. इस सबके चलते क्या मनमोहन जी कभी यह कह पायेंगे, 'हे मेरे देशवासियों, घबराओ मत, में हूँ न?'
