आज कलम के सिपाही महान कहानी कार मुंशी प्रेमचन्द की जन्म तिथि है. उन्हें शत-शत नमन है.आज याद आई उनकी एक कहानी 'नमक का दारोगा' की. भ्रष्टाचार के दलदल में गले तक डूबे भारतवासियों को जरूरत है उस नायक की जो दबाब के आगे नहीं झुकता और भ्रष्टाचारियों को न्याय के सामने पेश करता है. अदालत उसे ही सजा देती है और दरोगा की पट्टी उतार लेती है. पर वह निराश नहीं होता. घर आता है तो बाप की गालियाँ खाता है. फ़िर आता है वह भ्रष्टाचारी जिसे अदालत ने निर्दोष करार दिया था. बाप उस से अपने बेटे की गलती की माफ़ी मांगने लगता है. पर यहाँ तो चमत्कार होता है मुंशी जी की कलम से. वह धनी व्यक्ति उनके बेटे को अपने व्यापार को सँभालने का न्योता देता है. पिता भोंचक रह जाते हैं. पर बेटा मना कर देता है, कहता है में भ्रष्टाचार का व्यापार नहीं करता. वह धनी व्यक्ति कहता है, मुझे तुम जैसे ईमानदार इंसान की जरूरत है. तुम जैसे चाहो मेरा व्यापार चलाना.
कितने सालों पहले मुंशी जी ने ऐसे नायक की तस्वीर बनाई थी जिसकी भारत को आज सबसे ज्यादा जरूरत है. ईमानदारी का ईनाम, यह मुंशी जी ही सोच सकते थे. कोई भरेगा उनकी इस तस्वीर में रंग?