दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो


दैनिक प्रार्थना

है आद्य्शक्ति, जगत्जन्नी, कल्याणकारिणी, विघ्न्हारिणी माँ,
सब पर कृपा करो, दया करो, कुशल-मंगल करो,
सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, दीर्घायु हों,
सबके मन में संतोष हो, परोपकार की भावना हो,
आपके चरणों में सब की भक्ति बनी रहे,
सबके मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव हो,
सहानुभूति की भावना हो, आदर की भावना हो,
मिल-जुल कर शान्ति पूर्वक एक साथ रहने की भावना हो,
माँ सबके मन में निवास करो.

Monday 30 June 2008

लगता है इस बार चुनाव खूब कूड़ेदार होगा

किटी पार्टी में एक गर्मागर्म बहस चल रही थी, अगर परिवार के सब सदस्य घर की जिम्मेदारियों आपस में बराबर बाँट लें और उनका ईमानदारी से निर्वाह करें तो कोई समस्या न रहे.

आने वाले चुनाव में अध्यक्ष पद की उम्मीदवार निर्मला ने अपनी आवाज़ ऊंची करते हुए कहा, "बातें तो बहुत लोग करते हैं पर असल में काम कौन करता है? आप मेरे परिवार को लीजिये, हमने घर की सारी जिम्मेदारियां आपस में बाँट रखी हैं और पूरी ईमानदारी से उन्हें निवाहते हैं. यहाँ तक की कूड़ा फैंकने तक की जिम्मेदारी भी सबमें बंटी हुई है. हम लोग प्लास्टिक की थेलिओं में कूड़ा इकठ्ठा करते हैं और जो भी सदस्य घर से बाहर जाता है कूड़े की थेलिया अपने साथ ले जाता है और सड़क पर जहाँ मौका मिला वहां फैंक देता है."

कुछ महिलाओं ने कहा,'वाह' और कुछ ने कहा 'क्या?'.

निर्मला अपनी धुन में बोल रही थीं, "आप सब जानती हैं में एक टीचर हूँ और स्कूल की बस मुझे लेने आती है. सुबह सबसे पहले में घर से निकलती हूँ. कूड़े की थेलिया साथ लेकर निकलती हूँ और जहाँ बस खड़ी होती है वहीँ सड़क पर कूड़ा फैंक देती हूँ. मेरे पति सरकार में बड़े अफसर है, दफ्तर की कार उन्हें लेने आती है. वह कूड़े की थेलिया अपने साथ ले जाते हैं और जहाँ मौका मिला, कार रुकवा कर कूड़ा सड़क पर फैंक देते हैं."

"दफ्तर नहीं ले जाते", उर्मिला बड़बड़ाईं, वोह भी अध्यक्ष पद की उम्मीदवार हैं.

निर्मला का प्रवचन चालू था, "उसके बाद मेरा बेटा और बेटी अपने अपने कालेज जाते समय अपनी कूड़े की थेलिआं साथ ले जाते हैं और सड़क पर फैंक देते हैं. एक दिन तो कमाल हो गया. में जब सड़क पर कूड़ा फैंक रही थी तब मेरे क्लास का एक बच्चा, जो उसी बस से जाता है, कूड़े की थेलिया लेकर आया और मेरे कूड़े के पास फैंक दी. उस दिन मुझे कितनी खुशी और गर्व हुआ बता नहीं सकती".

शर्मिला, जिन्हें सब निर्मला की चमची कहते हैं, बोलीं, "हाँ यह बात तो सही है, जब बच्चे आप द्बारा स्थापित आदर्श अपनाते हैं तो खुशी और गर्व तो होता ही है".

निर्मला ने और उत्साह से अपनी बात कही, "में तो सोच रही हूँ की क्लास में एनाउंस कर दूँ कि जो बच्चा घर का कूड़ा सड़क पर फैंकेगा उसे में पाँच नंबर बोनस दूँगी इम्तहान में. भई टीचर्स की तो ड्यूटी बनती है बच्चों को अच्छी बाँतें सिखाने की".

उर्मिला फ़िर बड़बड़ाईं, "मुझे ताज्जुब है कि आप को अभी तक आदर्श टीचर का एवार्ड क्यों नहीं मिला?".

निर्मला ने उर्मिला को उपेक्षा से देखा और अपनी बात आगे बढ़ाई, "एक दिन मेरा बेटा बता रहा था कि जब वह कूड़ा सड़क पर फैंक रहा था तो उसकी जीऍफ़ ने उससे कहा,'डार्लिंग तुम बड़े कूल हो'. अब वह भी कूड़ा अपने साथ लाती है मेरे बेटे के साथ सड़क पर फैंकने के लिए. एक दिन मैंने उससे पुछा, 'इतना प्यार करता है तू उससे', उसने कहा, 'हां माम, हमने तय किया है, 'जियेंगे तो साथ, मरेंगे तो साथ, कूड़ा फेंकेंगे तो साथ', और मेरी बेटी ने तो साफ़ एलान कर दिया है, शादी करूंगी तो केवल ऐसे परिवार में जो घर का कूड़ा हमारी तरह सड़क पर फैंकते हैं".

महिलाओं की प्रतिक्रिया से ऐसा लग रहा था कि निर्मला चुनाव जरूर जीतेगी. उर्मिला को अपना दिल सिंक होता हुआ महसूस हुआ. साफ़ था की इस चुनाव का मुद्दा सड़क पर कूड़ा फैंकना बनेगा. जो जितना कूड़ा सड़क पर फैंकेगा उसे उतने ज्यादा वोट मिलेंगे. उर्मिला ने निश्चय किया कि वह घर पहुँचते ही कूड़ा सड़क पर फैंकने का काम शुरू करेगी. और वह अपना ही नहीं पड़ोसियों का कूड़ा भी इकठ्ठा करके सड़क पर फेंकेगी. "मैं भी देखती हूँ कि यह कैसे चुनाव जीतती है. कूड़े का अम्बार लगा दूँगी सड़क पर. कूड़ा ही कूड़ा कर दूँगी शहर में. अगर जरूरत पड़ी तो पास के शहरों का कूड़ा भी इंपोर्ट करूंगी", उर्मिला बड़बड़ाते हुए उठीं और घर की और चल दीं. उनके चेहरे पर एक अजीब चमक थी, महिलायें उन्हें चकित सी देख रही थीं और सोच रही थीं, लगता है इस बार चुनाव खूब कूड़ेदार होगा.

Saturday 28 June 2008

मैं समय हूँ, मेरी बात सुनो

तुम मुझे खरीद नहीं सकते,
न ही किराए पर ले सकते हो,
क्योंकि मेरी कोई कीमत नहीं है,
मैं अपनी रफ़्तार से चलता हूँ,
किसी के लिए अपनी रफ़्तार नहीं बदलता,
राजा, रंक कोई भी हो,
सबको मेरे साथ चलना है,
नहीं चलोगे तो पिछड़ जाओगे,
मेरी कमी तुम्हें हमेशा रहती है,
पर जितनी मर्ज़ी कोशिश कर लो,
मैं जितना हूँ उतना ही मिलूंगा,
कोई मुझे खींच कर बढ़ा नहीं सकता,
मैं गुजर कर पूरी तरह नष्ट हो जाता हूँ,
फ़िर वापस नहीं आता,
कोई मुझे स्टोर नहीं कर सकता,
न ही मेरी जगह कोई और ले सकता है,
तुम्हारे हर काम को मेरी जरूरत है,
तुम्हारे हर काम में मैं खर्च होता हूँ,
हर काम मुझ पर और मुझ से होता है,
तुम मेरी शक्ति जानते हो,
फ़िर भी मेरी परवाह नहीं करते,
मुफ्त मिलता हूँ न, शायद इसलिए,
कैसे बेबकूफ हो तुम.

Saturday 21 June 2008

कनकलता को न्याय मिलेगा

आप में से जो लोग कनकलता के साथ हुए अन्याय के बारे में जानकारी रखते हैं उनके लिए एक खुशी की ख़बर है. अब यह उमीद हो चली है की कनकलता को न्याय मिलेगा. कनकलता के साथ खड़े हुए सभी साथिओं को वधाई.

Friday 20 June 2008

नेताजी ज्ञान यज्ञ

नेताजी की महिमा अपार है. इस महिमा को एक आम हिन्दुस्तानी ने अच्छी तरह समझा है. आज देश में हर नागरिक नेता है. कहते हैं आदमी चुनाव जीत कर नेता बन जाता है. पर असलियत में चुनाव में जीते ही क्या नेता होते हैं? अरे जिन्होनें कोई चुनाव नहीं जीता वह भी तो नेता होते हैं. ऐसे नेता तो प्रधान मंत्री तक बन जाते हैं. और जो चुनाव में हार जाते हैं क्या वह नेता नहीं रहते? पाटिल और प्रफुल्ल चुनाव हारे पर गृह मंत्री और उड्डयन मंत्री बन कर घर और हवाई जहाज में नेतागिरी कर रहे हैं. अर्जुन बफादारी के नाम पर नेतागिरी कर रहे हैं. हर आदमी नेतागिरी कर रहा है. किसी की दूकान चल जाती है. जिस की नहीं चलती वह दूकान की पटरी पर बैठ कर चालू नेताजी के साए में नेतागिरी कर लेता है.

हिन्दी ब्लाग जगत में ही देखिये कितने नेता है? गिनती करेंगे तो दंग रह जायेंगे. पार्टियां बना रखी हैं सबने. कभी कभी जूतम-पैजार भी हो जाती है. देखी होंगी आप सबने. बात सही है पर विरोध करना है क्योंकि दूसरी पार्टी वाले ने लिखी है.

भारत नेताओं का देश है. जंगली घास की तरह उगते हैं नेता इस देश में. जो पत्थर उठाएंगे, उसके नीचे दो चार नेता धंदे की बात करते नजर आयेंगे. अगर आप से किसी का यह कह कर परिचय कराया जाए कि बहुत पढ़े-लिखे हैं, समझदार हैं, ईमानदार है, परोपकारी हैं, तो क्या कोई असर होगा आप पर? अगर मात्र इतना कह दिया जाए कि इनकी मंत्री जी से जान पहचान है तो आप आधे झुक जायेंगे उन्हें दंडवत करने में. मन ही मन गाली देंगे ख़ुद को कि फोटो खींचने का बंदोवस्त क्यों नहीं कराया.

नेता जी से ज्यादा बड़ा नेता उन का सचिव होता है. नेता जी के ड्राइवर की नेतागिरी के तो क्या कहने. बड़े-बड़े तीसमारखां उन्हें सलाम करते हैं. जो काम नेताजी नहीं करवा पाते वह यह लोग करा लेते हैं. कभी-कभी तो नेताजी ख़ुद इन की मदद लेते हैं. नेताओं में आपस में रंजिश हो सकती है, पर उनके सचिवों और ड्राइवरों में कभी रंजिश नहीं होती. नेताजी हर दरवाजा खुला रखते हैं.

लालू जी इतने सालों से असली नेतागिरी कर रहे हैं पर अब शाहरुख के साथ उस की ऐक्टिंग करना चाहते हैं. उनके आने से ब्लाग जगत में भी प्रजातंत्र आ गया है. उन्हें सेलिब्रिटी ब्लॉगर कहा जा रहा है. लिखता कोई और है पर नेताजी तो लालू हैं, इसलिए ब्लॉगर तो उन्हें ही कहा जायेगा, और क्योंकि वह एक सेलिब्रिटी हैं इस लिए मात्र ब्लॉगर कहना उनकी तौहीन होगी. उनके आने से ब्लाग जगत में चमचागिरी का प्रवेश हो गया है.

नेता पर जितना लिखा जाए उतना कम है. बहुत कठिन विषय है यह. पर एक कोशिश की है मैंने.

Thursday 19 June 2008

या गुंडई तेरा ही आसरा

एक आन्दोलन हुआ. राष्ट्र की संपत्ति नष्ट की गई. रेल की पटरियाँ उखाड़ी गईं. आवागमन ठप्प कर दिया गया. आम आदमियों को जम कर तकलीफ पहुंचाई गई. करीब चालीस आदमी मारे गए. व्यापार को नुक्सान हुआ. फ़िर बातचीत शुरू हुई और समझौता हो गया. सब खुश हो गए. एक दूसरे को धन्यवाद दिए गए, तारीफ़ की गई. गुंडई का मीठा फल मिला. कुछ और ने धमकी दी कि अगर इन्हें मीठा फल दिया गया तो हम भी गुंडई करेंगे. सो समझोते में उन्हें भी मीठा फल दे दिया गया. वह भी खुश हो गए.

गुंडई देवी की जय.

Sunday 15 June 2008

एक नए कूड़ेदान का उदघाटन

कल शनिवार, १४ जून २००८ को मनमोहन जी की सब से हरी-भरी, साफ-सुथरी और सुंदर दिल्ली के पश्चिम विहार, बी जी ३ ब्लाक में एक नए कूड़ेदान का उदघाटन हुआ. यह उदघाटन किसी नेता के कर-कमलों द्वारा नहीं हुआ. बस इस ब्लाक के निवासी एक वरिष्ट नागरिक के मन में आया की सामने सरक पर एक नए कूड़ेदान का उदघाटन कर दिया जाए. बस वह उठे, घर का सारा कूड़ा दो प्लास्टिक की थेलिओं में समेटा और चल पड़े इस महान कार्य को सम्पन्न करने.

उदघाटन समारोह में तीन गायें और एक कौवा थे. मैं पार्क से सैर करके लौट रहा था. मैंने जब इस महान कार्य को देखा तो इस की फोटो खींचने के लिए अपना केमरा निकाला. पर तब तक वह वरिष्ट नागरिक अपना कार्य संपन्न कर अपने घर में घुस चुके थे. फोटो में आए सिर्फ़ मेहमान नाश्ता करते हुए।

आज रविवार की फोटो देखिये. कूड़ेदान खूब तरक्की कर रहा है।

Saturday 14 June 2008

औरत क्यों रोती है?

एक बच्चे ने अपनी माँ से पूछा, "माँ आप रोती क्यों हैं?",
"क्योंकि मैं एक औरत हूँ", माँ ने कहा,
"मैं समझा नहीं", बच्चा बोला,
माँ ने उसे बाहों में समेट कर प्यार किया और बोली, "तुम नहीं समझोगे, पर चिंता मत करो सब ठीक है".

बच्चे ने पिता से पूछा, "माँ बिना बात के क्यों रोती है?",
पिता ने कहा, "सब औरतें बिना बात के रोती हैं",

बच्चा बड़ा हो गया पर यह नहीं समझ पाया कि माँ क्यों रोती है.

परेशान एक दिन उस ने भगवान् से पूछा, "है भगवन, औरतें अक्सर रोती क्यों हैं?",

भगवन ने जवाब दिया, "मैंने जब औरत को बनाया तो सोचा इसे स्पेशल होना चाहिए. मैं पुरूष बना कर गलती कर चुका था. अब उस गलती को ठीक करना था. इसलिए मैंने औरत को वह सब कुछ दिया जो पुरूष को नहीं दिया था. मैंने औरत को एक अंदरूनी ताकत दी जिससे वह मेरी स्रष्टि को आगे बढ़ा सके. और फ़िर मैंने उसे दिया एक आंसू, जिसे वह बहा सके जब जरूरत हो. जब तुम किसी औरत को रोते हुए देखो तब यह सोचना कि यह तुम्हारी कमजोरी है जो उस की आंखों से बाहर आ रही है. औरत कभी अपने लिए नहीं रोती. वह हमेशा तुम्हारे लिए रोती है. और यह वह अंदरूनी ताकत है जो मैंने उसे दी है. औरत के बिना पुरूष अधूरा है, उस की कोई हैसियत नहीं है. वह ख़ुद को पूर्ण और ताकतवर समझता है और यही उस की कमजोरी है."

Friday 13 June 2008

ऐसे बेटे सब नेताओं को दो भगवान

नेताजी की पत्नी ने कहा, "आपका बेटा बिगड़ रहा है. अजीब बातें करता है. कहता है इस देश में सारी समस्याएं नेताओं के कारण हैं, और यदि नेताओं को ख़त्म कर दिया जाए तो समस्याएं ख़त्म हो जायेंगी. यह भी कहता है, पिताजी की भ्रष्टाचार की कमाई को हाथ भी नहीं लगाऊँगा"।

"यह तो चिंता की बात है", नेताजी ने कहा, "लगता है हिरणयकश्यपू के घर में प्रहलाद पैदा हो गया है".

"अरे तो कुछ करो न", पत्नी ने चिंता भरे स्वर में कहा, "क्यों नहीं उसे राजनीति की शिक्षा देते?.

नेताजी ने सर हिलाया, बेटे को बुलाया और पहला पाठ शुरू हुआ.

उन्होंने पूछा, "प्रजातंत्र क्या है".

जवाब मिला, "जनता में भेद करने का तंत्र".

"में समझा नहीं", उन्होंने कहा.

जवाब मिला, "आप समझेंगे भी नहीं. क्योंकि भेद तो आप ही करते हैं".

"तो समझाओ न", उन्होंने कहा गुस्से से.

जवाब मिला, "तो गिनिए".

आम आदमी, वीआईपी, वीवीआईपी

हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध (भारतीय कोई नहीं)

बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक

एससी, एसटी, ओबीसी, ओबीसी में ओबीसी, सूखी लेयर, क्रीमी लेयर

सेकुलर, कम्युनल

आम आदमी का बेटा, नेताजी का बेटा.

"बस बकबास बंद करो", नेताजी चिल्लाए, "इसे बंद करो वरना यह मुझे बाहर कर देगा".

घर का नौकर (एक आम आदमी) यह सब देख रहा था. उसनें मन ही मन भगवान से प्रार्थना की, "ऐसे बेटे सब नेताओं को दो भगवान्".

Thursday 12 June 2008

नारी सशक्तिकरण की परिभाषा

नारी सशक्तिकरण की परिभाषा उन्होंने कुछ इस तरह की:
"हर वह काम करना जो पुरूष करते हैं,
हर वह काम न करना जो पुरूष नहीं करते".

मैंने कहा आप का सोच भी अजीब है. इस पुरूष प्रधान समाज में, नारी सशक्तिकरण भी क्या पुरूष प्रधानता के साये में ही होगा? क्या नारी स्वयं को पुरूष से अलग करके नहीं देख सकती? एक स्वतंत्र व्यक्तित्व जो पुरूष को पूर्णत्व प्रदान करता है, उस से स्वयं की तुलना नहीं करता.

नागरिक जिम्मेदारी, my foot

"अरे भई आपने पार्क की गंदगी साफ करने के लिए नगर निगम को ज्ञापन दिया था, क्या हुआ उसका?", यह कहते हुए उन्होंने कचरे से भरा प्लास्टिक बैग पार्क में फैंक दिया.

मैं उन्हें देखता रहा.

"ऐसे क्या घूर रहे हो?", उन्होंने पूछा.

"सोच रहा हूँ" मैंने कहा, "वह ज्ञापन नगर निगम को नहीं आपको देना था".
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मन्दिर के प्रधान ने मन्दिर मैं भंडारा कराया, सब ने खूब तारीफ़ की. कचरा उन्होंने मन्दिर के पीछे बने पार्क में फिंकवा दिया. मैंने भगवान् की मूर्ति की तरफ़ देखा. एक व्यंग भरी मुस्कान थी भगवान् के चेहरे पर.

लोगों ने मुझसे पूछा, "तुमने तारीफ़ नहीं की?"

मैंने कहा, "जिसका परलोक बिगड़ गया हो उस की तारीफ़ नहीं करते".
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गुरुद्वारे के अन्दर उन्होंने झाड़ू लगाई, पानी से फर्श धोया, वाइपर से गन्दा पानी और कचरा खींच कर उन्होंने दरवाजे के बाहर सड़क पर फैंक दिया. फ़िर उन्होंने अपनी आँखें बंद की और कुछ बुदबुदाये. मुझे लगा जैसे वाहे गुरु से अपने काम का ईनाम मांग रहे हैं. मैंने अपनी सफ़ेद कमीज पर पड़े गंदे पानी के धब्बों को देखा, वाहे गुरु को मन ही मन प्रणाम किया और आगे बढ़ गया. मामला उनके और वाहे गुरु के बीच था.
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वह रोज सुबह पार्क में आते, अच्छी-अच्छी बातें लोगों को बताते. नागरिक जिम्मेदारी उनका प्रिय विषय था. एक दिन वह अपने पोते के साथ आए. वह प्रवचन देने लगे, पोता खेलने लगा. प्रवचन के बीच पोता आकर बोला,'दादा जी मुझे फूल चाहियें".

"तो तोर लो न, इतने फूल लगे हैं", उन्होंने कहा.

कुछ देर बाद फ़िर आया पोता. "दादा जी मुझे सू सू करना है"

"क्यारी में कर दो न",उन्होंने कहा.

"नहीं आप करवाओ", पोता बोला.

"अच्छा चलो".

जब वह अपनी यह नागरिक जिम्मेदारी निभाकर वापस आए तो प्रवचन सुनने वाले गायब थे.

Tuesday 10 June 2008

भ्रष्टाचार मिटाने का सरल उपाय

आज भ्रष्टाचार हमारे समाज और देश के लिए एक चुनौती बन गया है. पिछले कुछ दशकों में यह असाधारण रूप से बढ़ा है और हमारे जीवन के हर पहलू को आत्मसात करता जा रहा है. भष्टाचार की कमाई मानवीय संवेदनाओं को खत्म कर रही है. लोग हिंसक हो रहे हैं. जरा सी बात पर लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं. लालच इस कदर बढ़ गया है कि लोग माता-पिता, भाई-बहन का खून बहाने से भी नहीं हिचकिचाते. अब तो लोग यह कहने लगे हैं कि भ्रष्टाचार हमारे समाज से कभी दूर नहीं होगा.

इस बारे में हमें सोचना होगा. किसी असाधारण समस्या को सुलझाने के उपाय भी असाधारण होनें चाहियें. अक्सर यह असाधारण उपाय बहुत सरल होते हैं. कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर हम इस असाधारण उपाय को अपने जीवन में लागू करें तो भ्रष्टाचार की समस्या काफ़ी हद तक ख़त्म की जा सकती है.

समझने के लिए हम एक परिवार को लेते हैं, जिसमे माता, पिता, बेटा और बेटी हैं. पिता काम करते हैं और भयंकर भ्रष्टाचारी हैं. अगर मां, बेटा और बेटी यह तय करलें कि हम अपने परिवार से भ्रष्टाचार समाप्त करेंगे तो क्या करना होगा? गृहणी अपने पति भ्रष्टेश्वर से कहें कि मैं आज से भ्रष्टाचार की कमाई को हाथ नहीं लगाऊंगी. भ्रष्टाचार की कमाई से खरीदी गई किसी बस्तु का अपने घर में प्रयोग नहीं करूंगी. ऐसा ही बेटा और बेटी भी अपने पिता से कहें. श्रीमान भ्रष्टेश्वर अपनी भ्रष्टाचार की कमाई को केवल अपने ऊपर खर्च करें. उन की जो ईमानदारी की कमाई है उसे ही वह इस्तेमाल करें.

उपाय असाधारण है पर बहुत सरल है, बस इसके लिए एक मजबूत इच्छाशक्ति चाहिए. ऐशो-आराम की जो आदत हो चुकी है, उसके कारण काफ़ी परेशानी होगी. पर उस की परवाह किए बिना अपने चुने रास्ते पर चलना है.

आइये हम अपने परिवेश में भ्रष्टाचार समाप्त करने का आगाज करें.

Friday 6 June 2008

लालू जी की झटका गाड़ी

पिछले दिनों फ़िर से लालू जी की रेल में सफर करने का मौका मिला. इस बार थी, नई दिल्ली - कालका शताब्दी एक्सप्रेस. ट्रेन प्लेटफार्म पर आई. न जाने क्यों लालू जी ने यह कलर स्कीम चुनी है शताब्दी ट्रेंस की. दबा हुआ हल्का नीला रंग जो हर समय भद्दा लगता है. पहला इम्प्रेशन ही ख़राब हो जाता है. खैर चढ़ गए ट्रेन में और बैठ गए अपनी सीट पर. मेरे पास स्वामी रामसुखदास जी की पुस्तक 'ज्ञान के दीप जले' थी, सो उसे पढ़ने लगा. अचानक एक जोर का झटका लगा. ट्रेन चलने की कोशिश कर रही थी. फ़िर झटकों का सिलसिला शुरू हुआ. ऐसा लग रहा था जैसे इंजन और डिब्बों में खींचतान चल रही है. इंजन कह रहा है, 'चलो भाई', और डिब्बे कह रहे हैं, 'रुको भाई'. आखिरकार इंजन की जीत हुई और ट्रेन प्लेटफार्म से खिसकी. लालू जी की झटका गाड़ी सफर शुरू हुआ झटकों के साथ.

ट्रेन पहुँची पानीपत. मेरी सीट बाएँ तरफ़ खिड़की के साथ थी. प्लेटफार्म दूसरी तरफ़ था. बाहर देखा तो रेल की पटरी नजर आई. उसके साथ याद आया लालू जी का वह बजट भाषण जिस में उन्होंने प्लेटफार्मों के बीच रेल पटरियों को साफ करने की बात कही थी. लालू जी ने एक प्रतियोगिता का एलान किया था. जिन रेलवे स्टेशनों के प्लेटफार्म और पटरियाँ साफ पाई जाएँगी उन को ईनाम मिलेगा. बाद के बजटों में उन्होंने इस प्रतियोगिता का कोई जिक्र नहीं किया. न ही कभी यह सुनने में आया कि किसी रेलवे स्टेशन को पुरूस्कार मिला हो. बजट भाषण खत्म तो ताली बजबाने वाले बायदे भी खत्म. लालू जी तो इस के चैम्पियन हैं. या फ़िर रेल अधिकारियों ने इसे सफाई प्रतियोगिता की जगह गंदगी प्रतियोगिता समझ लिया था. गंदगी प्रतियोगिता में तो पानीपत रेलवे स्टेशन को ईनाम मिलना पक्का है.

पानीपत से चल कर जब अम्बाला पहुंचे तब गंदगी प्रतिय्गिता के एक और दावेदार से मिलना हुआ. कुछ देर पहले बगल की पटरी पर शायद कोई ट्रेन खड़ी थी. सभी सवारियों ने वहीं पर मल मूत्र का त्याग किया था. अपना डिब्बा तो ऐ सी था, पर प्लेटफार्म पर मौजूद सवारियों पर क्या गुजर रही होगी इस का अंदाजा लगाने से ही कंपकंपी छूटती है.

अब बात करें झटकों की. पहले इस ट्रेन में झटके तब लगते थे जब यह चलना या रुकना शुरू करती थी. पर अब इस ट्रेन ने तरक्की कर ली है. अब चलते हुए भी इस में झटके लगते हैं. में जब काफ़ी पी रहा था तब एक झटका लगा. बाल-बाल बच गया, बरना मेरे ऊपर गिर जानी थी काफ़ी. यही झटके थे वापसी में.

टॉयलेट हमेशा की तरह गंदे थे. फर्श पर पानी था. लगता है पानी बाहर निकलने का पाइप ब्लाक हो गया था. लिकुइड साबुन सिर्फ़ रंगीन पानी था. लगभग सारी फिटिंग्स टूट चुकी है. दरवाजा बंद करना बच्चो का खेल नहीं है. वापसी में भी गंदगी का यही हाल था.

अब बात करें केटरिंग की. दो बन्दे ७८ यात्रिओं को सर्व करते हैं. पहला यात्री जब नाश्ता करके ऊंघ रहा होता है तब आखिरी यात्री को नाश्ता सर्व हो रहा होता है. पानी ठंडा नहीं. नाश्ता गर्म नहीं. दो एक्लेयर्स को चबाने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ती है. सुख कर पत्थर बन चुके होते हैं वह. मेने वेटर्स से बात की. उन्होनें कहा कि लालू जी हमें पहले से ट्रेन में नहीं चढ़ने देते. जब ट्रेन प्लेटफार्म पर आ जाती तभी हम लोग अपने सामान के साथ डिब्बे में चढ़ते हैं. सामान सजाने में काफ़ी समय लग जाता है. उस ले तुरंत बाद अखबार, पानी इत्यादि सर्व करना शुरू कर देते हैं. इस कम समय में न पानी ठंडा हो पाता है और न ही नाश्ता गर्म हो पाता है.

वापसी में लालू जी कालका से चढ़ने वालों को चाय के साथ नाश्ता कराते हैं, पर चंडीगढ़ से चढ़ने वालों को फ्रूटी और बिस्कुट में ही टाल देते हैं. सूप के साथ जो मक्खन मिला वह पिघला हुआ था. वेटर ने कहा, फ्रिज में रखने पर भी पिघल जाए तो क्या करें. पर खाने के बाद मिली आइसक्रीम पत्थर की तरह सख्त थी. खाना बिल्कुल बेजायका था. दाल और सब्जी में कोई टेस्ट ही नहीं था. जीरा आलू में जीरा नहीं था. अचार में तेल नहीं था, बिल्कुल सूखा अचार. सलाद गर्म था. दही पता नहीं किस दूध से जमाया गया था, कोई टेस्ट नहीं.

लालू जी की झटका गाड़ी में दिल्ली से चंडीगढ़ और फ़िर वापस चंडीगढ़ से दिल्ली पहुँच तो गए पर खूब झटके खाकर.

Monday 2 June 2008

यह बेबकूफी किस ने की ???

"चलिए आपका जहाज खड़ा है, आपको वापस भेज रहे हैं", यह शब्द कहे भारत सरकार के अधिकारियों ने अंसार बर्नी से दिल्ली एअरपोर्ट पर. बर्नी दिल्ली में हो रही आतंकवाद विरोधी गोष्ठी में भाग लेने आए थे. उन को दिल्ली अन्दर नहीं आने दिया गया और दुबई जाने वाले एक जहाज में बिठा दिया गया. सब जानते हैं कि बर्नी पाकिस्तान की सरकार में मानव अधिकार मंत्री रहे हैं. अपने अथक प्रयासों से बर्नी ने ३५ वर्षों से पाकिस्तान की जेल में बंद एक भारतीय नागरिक कश्मीर सिंह को रिहाई दिलाई. आज कश्मीर सिंह अपने देश भारत में अपने परिवार के साथ सुख से जीवन बिता रहा है. अब बर्नी सरबजीत की रिहाई के लिए प्रयास कर रहे हैं. उन का यह भी प्रयास है की भारत और पाकिस्तान की जेलों में जो भी पाकिस्तानी और भारतीय कैद हैं उन्हें रिहा कर दिया जाए.

सब जानते हैं पर भारत का ग्रह मंत्री यह नहीं जानता. बर्नी का स्वागत करने की बजाय उन्हें अपमानित कर के वापस भेज दिया गया. कुछ दिन पहले इसी ग्रह मंत्री ने अफ़ज़ल को पाकिस्तानी नागरिक कह कर उसकी तुलना सरबजीत से की थी. पता नहीं यह व्यक्ति सरबजीत का केस ख़राब करने पर क्यों तुला हुआ है. मेरी पिछली पोस्ट पढ़ें:

इस मंत्री को दरवाजा दिखाओ

बात जब बिगड़ गई तो सरकार ने माफ़ी मांग ली. जांच बिठा दी. संबंधित विभाग और अधिकारी एक दूसरे पर दोष लगाने लगे. बर्नी ने भारत सरकार से टिकट की कीमत और इस अपमान का हर्जाना माँगा है. वह संयुक्त राष्ट्र में शिकायत करने की बात भी कह रहे हैं.

Sunday 1 June 2008

जूली बीमार हैं ........

जूली एक नर्स हैं, जिन्होनें लाईलाज़ बीमारिओं से ग्रस्त बिस्तर पर पड़े बीमारों की जिंदगी भर सेवा की. वह अब ५२ वर्ष की हैं और स्वयं भी एक भयंकर बीमारी से ग्रस्त हो गई हैं. आज मैंने उन के बारे मैं पढ़ा, टाइम्स आफ इंडिया में.

जब कुली फ़िल्म की शूटिंग करते समय विग-बी (अमिताभ बच्चन) बुरी तरह घायल हो गए थे तब इन्हीं जूली ने उनकी सेवा की थी. तब वह सेंट फिलोमिना अस्पताल में ट्रेनी नर्स थीं. वहीं उन्होंने मशहूर ऐक्ट्रेस बी सरोज देवी की भी देखभाल की थी. आज वह स्वयं बीमार हैं. आज उनके परिवार में उन के बेरोजगार पति और एक छोटा बेटा है. उन की सास वाणी विलास अस्पताल से रिटायर्ड नर्स हैं और उन्हीं की पेंशन से खर्चा चलता है. वह कहती हैं, 'मैं फ़िर से चलना चाहती हूँ और किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती'. उन्हें उम्मीद है कि जिन सेलिब्रिटीस और परिवारों की उन्होंने देखभाल की है, वह उनकी इस समय मदद करेंगे और उन्हें फ़िर से अपने पैरों पर खड़े होने मैं सहायता करेंगे.

जूली को ह्युमेनितेरियन अस्पताल में ०८०-२७८२८६१३ पर सम्पर्क किया जा सकता है.